भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ८६ ) प्र०—यदि लिङ्ग शरीर मूर्त्त द्रव्य है तो वायु आदि के समान उसका भी आधार आकाश हो सकत है, और जगह कल्पना करने से क्या तात्पर्य्य है ? उ०—मूर्त्तत्वेऽपि न संघातयोगात्तरणिवत् ॥१३ अर्थ—यदि लिङ्ग शरीर मूर्त्तत्व भी है तथापि वह किसी स्थान के बिना नहीं रह सकता, जैसे—बहुत से तेज इकट्ठे होकर बिना पार्थिव (पृथिवी से पैदा होने वाले) द्रव्य के आधार के नहीं रह सकते, इस तरह लिंग शरीर भी बिना किसी आधार के नहीं रह सकता । प्र०—लिंग-शरीर का परिमाण क्या है ? उ०—अणुपरिमाणं तत् कृतिश्रुतेः ॥ १४ ॥ अर्थ—लिंग शरीर अणु परिमाण वाला अर्थात् ढका हुआ है, बहुत अणु नहीं है ; क्योंकि बहुत ही अणु ( सूक्ष्म ) अवयव रहित होता है, और लिंग शरीर अवयव वाला है। कारण यह है, कि लिंग शरीर के कार्य दीखते हैं, इस में युक्ति भी प्रमाण है । तदन्नमयत्वश्रुतेश्च ॥ १५ ॥ अर्थ—वह लिंग शरीर अन्नमय है, इस कारण अनित्य है ; क्योंकि इस विषय में श्रुतियाँ प्रमाण देती हैं । "अन्नमयं हि सौम्य ! मन आपो मयः प्राणः तेजोमयीवाक्” । हे सौम्य ! यह मन अन्नमय है, प्राण जलमय है, वाणी तेजोमयी है । यद्यपि मन आदि कार्य भौतिक नहीं हैं, तथापि दूसरे के मेल से इन में घटना-बढ़ना दीखता है, इस कारण से ही अन्नमय मन को माना है । प्र०—यदि लिंग शरीर अचेतन है, तो उसकी अनेक शरीरों के वास्ते उत्पत्ति क्यों है ?