सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ६० ) उ०—पुरुषार्थं संसृतिर्लिङ्गानां सूपकारवद्राज्ञः॥१६ अर्थ—लिंग शरीर की उत्पत्ति पुरुष के वास्ते है, जैसे— पाकशाला ( भोजन बनाने की जगह ) में रसोइये को अपने स्वामी के वास्ते जाना है, इस ही तरह लिंग शरीर का होना भी पुरुष के वास्ते है। लिंग शरीर का विचार हो चुका। अब स्थूल शरीर का विचार किया जाता है— पाञ्चभौतिको देहः ॥ १७ ॥ अर्थ—यह शरीर पाञ्चभौतिक कहलाता है, अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, इनसे इसकी उत्पत्ति है। चातुर्भौतिकमित्येके ॥ १८ ॥ कोई ऐसा कहते हैं, कि चार ही भूतों से स्थूल शरीर होता है, क्योंकि आकाश तो अवयव रहित है, इस कारण आकाश किसी के साथ विकार को प्राप्त नहीं हो सकता है। एकभौतिकमित्यपरे ॥ १९ ॥ और कोई ऐसा कहते हैं, कि यह स्थूल शरीर एक भौतिक है, अर्थात् शरीर पार्थिव ( पृथिवी का विकार है ) और जो विशेष चार भूत हैं वे केवल नाम-मात्र ही हैं। या इस प्रकार जानना चाहिये, कि एक-एक भूत के सब शरीर हैं। मनुष्यों के शरीर में पृथिवी का अंश ज्यादा है, इस कारण यह शरीर पार्थिव है, और तैजस लोक वासियों में तेज ज्यादा है, इससे उनका शरीर तैजस है। शरीर स्वभाव से चैतन्य नहीं है, इस पक्ष को दूर करते हैं— न सांसिद्धिकं चैतन्यं प्रत्येकादृष्टेः ॥ २० ॥ अर्थ—जब पृथिवी आदि भूतों को भिन्न-भिन्न करते हैं, तब उनमें चेतन-शक्ति नहीं दीखती, अतः इससे सिद्ध होता