सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ६१ ) है, कि देह स्वभाव से चैतन्य नहीं है, किन्तु किसी दूसरे चैतन्य के मेल से चैतन्य-शक्ति को धारण करती है । प्रपंचमरणाद्यभावश्च ॥ २१ ॥ अर्थ—यदि शरीर को स्वभाव से चैतन्य माना जाय, तो यह भी दोष हो सकता है कि प्रपंच, मरण, सुषुप्ति आदि भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ नहीं हो सकेंगी ; क्योंकि जो देह स्वभाव से चैतन्य- है, तो मृत्यु-काल में इसकी चेतन-शक्ति कहाँ को भाग जाती है, और बीसवें सूत्र में जो यह बात कही है कि हरेक भूत के भिन्न- भिन्न करने पर चेतनता नहीं दीखती, अब इस पक्ष को भी पुष्ट करते हैं । मदशक्तिवच्चेत् प्रत्येकपरिदृष्टेसांहत्ये तदुद्भवः॥२२ अर्थ—यदि मदिरा की शक्ति के समान माना जाय, जैसे— अनेक पदार्थों के मिलने से मादकता, शक्ति उत्पन्न हो जाती है, इस ही तरह पाँच भूतों के मिलने से शरीर में चैतन्य- शक्ति उत्पन्न हो जाती है, ऐसा कहना भी योग्य नहीं है, क्योंकि मदिरा में जो मादक शक्ति है, वह शक्ति उन पदार्थों में भी है, जिनसे मदिरा बनी है । यदि यह कहा जाय कि हर एक भूत में थोड़ी चेतनता है, और सब मिलकर बड़ी चेतनता हो जाती है, ऐसा कहना भी असत्य है ; क्योंकि बहुत-सी चैतन्य-शक्तियों की कल्पना करने में गौरव हो जायगा, इस कारण एक ही चैतन्य-शक्ति का मानना योग्य है, और पहिले जो इस बात को कह आये हैं, कि लिंग शरीर की सृष्टि पुरुष के वास्ते है, और लिंग शरीर का स्थूल शरीर में सञ्चार भी पुरुष के वास्ते है, उस का तात्पर्य अब कहते हैं, जो अत्यन्त पुरुषार्थ का हेतु है । ज्ञानान्मुक्तिः ॥ २३ ॥