सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ६२ ) अर्थ—लिंग शरीर में जो मन आदि हैं, उन से ज्ञान उत्पन्न होता है, और ज्ञान से ही मुक्ति होती है। बन्धोविपर्ययात् ॥ २४ ॥ अर्थ—विपर्यय नाम मिथ्याज्ञान का है, मिथ्याज्ञान से ही सुख-दुःख रूप बन्धन होता है। ज्ञान से मुक्ति और मिथ्या ज्ञान से बंधन होता है, इस विषय को तो कह चुके, अब मुक्ति का विचार किया जाता है— नियतकारणत्वान्न समुच्चयविकल्पौ ॥ २५ ॥ अर्थ—ज्ञान से ही मुक्ति होती है, इस कारण मुक्ति का नियत कारण ज्ञान है, इस वास्ते मुक्ति में ज्ञान और कर्म दोनों हेतु नहीं हो सकते; क्योंकि मुक्ति में इस बात का कोई विकल्प भी नहीं है, क्योंकि कर्म से मुक्ति हुई, या ज्ञान से, क्योंकि इसका तो ज्ञान ही नियत कारण, और इस बात को भी इस सूत्र से प्रत्यक्ष करते हैं। स्वप्नजागराभ्यामिव मायिकामायिकाभ्यां नोभयोर्मुक्तिः पुरुषस्य ॥ २६ ॥ अर्थ—जैसे स्वप्नावस्था और जाग्रतावस्था इन दोनों में पहला तो प्रतिबिम्ब है, दूसरा सच्चा है। यह स्वप्नावस्था और जाग्रतावस्था दोनों आपस में विरुद्ध धर्म वाले हैं, अतः ( इस कारण ) एक वक्त में नहीं रहसकते, इसी तरह ज्ञान और कर्म भी एक वक्त में नहीं रह सकते हैं। बस इसी से सिद्ध हो गया कि विरुद्ध धर्म वाले पदार्थ न तो मिल सकते हैं, और न मुक्ति का हेतु हो सकते हैं, और न इस विषय पर विकल्प करना चाहिये, कि किस से मुक्ति होती है; क्योंकि मुक्ति का नियत कारण ज्ञान है, और “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेने के