सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६३ ) अमृतत्त्वमानशुः” ( कर्म से, सन्तान से, दान से, किसी ने अमृतत्त्व नहीं पाया है ) इत्यादि श्रुतियाँ भी कर्म को मुक्ति का अहेतु कहती हैं । प्र०-यदि कर्म का कुछ भी फल न रहा, तो कर्म का करना ही व्यर्थ है ? उ०—इतरस्यापि नात्यन्तिकम् ॥ २७ ॥ अर्थ-कर्म का विशेष फल नहीं है, किन्तु सामान्य ही फल है । इस सूत्र में 'इतर' शब्द से कर्म का ग्रहण इसलिये होसकता है कि इस प्रकरण में ज्ञान से मुक्ति होती है, कर्म से नहीं । इसी का प्रतिपादन करते चले आते हैं, इसवास्ते ज्ञान के अतिरिक्त कर्म का ही ग्रहण हो सकता है। यदि ऐसा कहा जाय, कि ज्ञान के अतिरिक्त अज्ञान का ग्रहण किया सो भी ठीक नहीं ; क्योंकि इस सूत्र में आचार्य का अपि और नात्यन्तिक शब्द कहना कर्म से न्यून ( कमती ) फल का जतानेवाला है, जब इतर से अज्ञान का ग्रहण किया जाय, तो ऐसा अर्थ होगा, कि अज्ञान का थोड़ा फल है बहुत नहीं, इससे थोड़े फल का अभिलाषी अज्ञान को ही उत्तम समझ सकता है, इस वास्ते ऐसा अनर्थ करना अच्छा नहीं । इससे आचार्य ने कर्म की अपेक्षा ज्ञान को उत्तम माना है । योगी के संकल्प-सिद्ध पदार्थ भी मिथ्या नहीं हैं, इस बात का आगे के सूत्र से और भी प्रत्यक्ष करेंगे । संकल्पितेऽप्येवम् ॥ २८ ॥ अर्थ-योगी के संकल्प किये हुए पदार्थ भी इसी प्रकार सच्चे हैं। प्र०-जबकि योगी के संकल्पित पदार्थों का कोई कारण प्रत्यक्ष नहीं दीखता, तो वह मिथ्या क्यों नहीं ?