सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ६४ ) उ०—भावनोपचयाच्छुद्धस्यसर्वं प्रकृतिवत् ॥२६ अर्थ—प्राणायामादिकों से योगियों की भावना अर्थात् ध्यान अधिक होता है, इसवास्ते सब पदार्थ सिद्ध हैं, उनमें प्रत्यक्ष कारण देखने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि हम लोगों के समान योगियों के संकल्प झूठे नहीं होते, जैसे—प्रकृति बिना किसी का सहारा लिये महदादिकों को करती है, और उसमें प्रत्यक्ष कारण की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती, इसी प्रकार योगी का ज्ञान भी जानना चाहिये। पूर्वोक्त सूत्रों से यह बात सिद्ध हो गई कि ज्ञान ही मोक्ष का साधन है। अब ज्ञान किस तरह होता है, इस बात को आगे के सूत्रों से प्रत्यक्ष करेंगे। रागोपहतिर्ध्यानम् ॥३०॥ अर्थ—ज्ञान के रोकनेवाले रजोगुण के कार्य जो विषय-वास- नादिक हैं उनका जिनसे नाश हो जाय, उसे ध्यान कहते हैं। यहाँ- पर ध्यान शब्द से धारणा, ध्यान, समाधि, इन तीनों का ग्रहण है; क्योंकि पातञ्जलि में योग के आठ अङ्गों को ही विवेक साक्षात् में हेतु माना है। इनके अवान्तर भेद भी उसी शास्त्र में विशेष मिलेंगे, बाक़ी पाँच साधनों को आचार्य आप ही कहेंगे। अब ध्यान की सिद्धि के लक्षणों को कहते हैं— वृत्तिनिरोधात् तत्सिद्धिः ॥३१॥ जिसका ध्यान किया जावे, उसके अतिरिक्त वृत्तियों के निरोध से अर्थात् सम्प्रज्ञात योग से उसकी सिद्धि जानी जाती है, और ध्यान तबतक ही करना चाहिये जबतक ध्येय (जिस- का ध्यान किया जाता है) के सिवाय दूसरे की तरफ़ को चित्त की वृत्ति न जावे। अब ध्यान के साधनों को कहते हैं— धारणासनस्वकर्मणा तत्सिद्धिः ॥३२॥