सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
( ६४ ) उ०—भावनोपचयाच्छुद्धस्यसर्वं प्रकृतिवत् ॥२६ अर्थ—प्राणायामादिकों से योगियों की भावना अर्थात् ध्यान अधिक होता है, इसवास्ते सब पदार्थ सिद्ध हैं, उनमें प्रत्यक्ष कारण देखने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि हम लोगों के समान योगियों के संकल्प झूठे नहीं होते, जैसे—प्रकृति बिना किसी का सहारा लिये महदादिकों को करती है, और उसमें प्रत्यक्ष कारण की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती, इसी प्रकार योगी का ज्ञान भी जानना चाहिये। पूर्वोक्त सूत्रों से यह बात सिद्ध हो गई कि ज्ञान ही मोक्ष का साधन है। अब ज्ञान किस तरह होता है, इस बात को आगे के सूत्रों से प्रत्यक्ष करेंगे। रागोपहतिर्ध्यानम् ॥३०॥ अर्थ—ज्ञान के रोकनेवाले रजोगुण के कार्य जो विषय-वास- नादिक हैं उनका जिनसे नाश हो जाय, उसे ध्यान कहते हैं। यहाँ- पर ध्यान शब्द से धारणा, ध्यान, समाधि, इन तीनों का ग्रहण है; क्योंकि पातञ्जलि में योग के आठ अङ्गों को ही विवेक साक्षात् में हेतु माना है। इनके अवान्तर भेद भी उसी शास्त्र में विशेष मिलेंगे, बाक़ी पाँच साधनों को आचार्य आप ही कहेंगे। अब ध्यान की सिद्धि के लक्षणों को कहते हैं— वृत्तिनिरोधात् तत्सिद्धिः ॥३१॥ जिसका ध्यान किया जावे, उसके अतिरिक्त वृत्तियों के निरोध से अर्थात् सम्प्रज्ञात योग से उसकी सिद्धि जानी जाती है, और ध्यान तबतक ही करना चाहिये जबतक ध्येय (जिस- का ध्यान किया जाता है) के सिवाय दूसरे की तरफ़ को चित्त की वृत्ति न जावे। अब ध्यान के साधनों को कहते हैं— धारणासनस्वकर्मणा तत्सिद्धिः ॥३२॥
( ६५ ) धारणा, आसन और अपने कर्म से ध्यान की सिद्धि होती है। प्रथम धारणा का लक्षण कहते हैं— निरोधश्छर्दिर्विधारणाभ्याम् ॥३३॥ अर्थ—छर्दि ( वमन ) और विधारण ( त्याग ) अर्थात् प्राण का पूरक, रेचक और कुम्भक से निरोध ( वश में रखने ) को धारणा कहते हैं । यद्यपि आचार्य ने धारणा शब्द का उच्चारण इस सूत्र में नहीं किया है तथापि आगे के दो सूत्रों में आसन और स्वकर्म का लक्षण किया है। इसी परिशेष से धारणा शब्द का अध्याहार इस सूत्र में कर लिया जाता है, जैसे—पाणिनि- मुनि ने भी लाघव के वास्ते “लट्, शेषे च” इत्यादि सूत्र कहे हैं। अब आसन का लक्षण कहते हैं— स्थिरसुखमासनम् ॥३४॥ अर्थ—स्थिर होने पर जो सुख का साधन हो, उसी का नाम आसन, जैसे—स्वस्तिका ( पालकी ) आदि स्थिर होने पर सुख के साधन होते हैं, तो उनको भी आसन कह सकते हैं। किसी विशेष पदार्थ का नाम आसन नहीं है। अथ स्वकर्म का लक्षण कहते हैं— स्वकर्म स्वाश्रमविहितकर्मानुष्ठानम् ॥३५॥ अर्थ—जो कर्म अपने आश्रम के वास्ते शास्त्रों ने प्रतिपादन किये हैं उनके अनुष्ठान को स्वकर्म कहते हैं। यहाँ पर कर्म शब्द से यम, नियम, और प्रत्याहार, इन तीनों को समझना चाहिये ; क्योंकि इनका सब वर्णों के वास्ते समान सम्बन्ध है, और इन यमादिकों को योगशास्त्र में योग का अङ्ग तथा ज्ञान का साधन भी माना है, और भी जो ज्ञान प्राप्ति में उपाय हैं, उनको भी कहेंगे—
( ६६ ) प्र०- यम किसको कहते हैं ? उ०- अहिंसा ( जीव का न मारना ) सत्य, अस्तेय ( चोरी न करना ), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह ( विषयों से बचना ); इनका नाम यम है । प्र०- नियम किसको कहते हैं ? उ०- शुद्धि, सन्तुष्ट रहना, अपने कर्मों का अनुष्ठान करना, वेदादि का पढ़ना, ईश्वरभक्ति; इसको नियम कहते हैं । प्र०- प्रत्याहार किसको कहते हैं ? उ०- जिसमें चित्त इन्द्रियों सहित अपने विषय को त्याग कर ध्यानावस्थित होजाय, उसको प्रत्याहार कहते हैं ॥ वैराग्यादभ्यासाच्च ॥३६॥ अर्थ- सांसारिक पदार्थों के विराग अथवा धारणादि पूर्वोक्त तीन साधनों के अभ्यास से ज्ञान प्राप्त होता है । यहाँ चकार का अर्थ पूर्वार्थ का समुच्चय और आरम्भित जो "ज्ञानान्मुक्तिः" इस विषय के प्रतिपादन की समाप्ति के वास्ते है । इससे आगे "बन्धो विपर्ययात्" इसपर विचार आरम्भ करते हैं— विपर्ययभेदाः पंच ॥३७॥ अर्थ- अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, यह पाँच योगशास्त्रों में कहे हुए बन्ध के हेतु विपर्यय ( मिथ्या ज्ञान ) के अवान्तर भेद हैं । अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्म में नित्य, शुचि, सुख और आत्मबुद्धि करने का नाम अविद्या है। जिसमें आत्मा और अनात्मा की एकता मालूम होवे, जैसे—शरीर के अतिरिक्त और कोई आत्मा नहीं, ऐसी बुद्धि का होना अस्मिता है—राग और द्वेष के तो लक्षण प्रसिद्ध ही हैं । मृत्यु से डरने का नाम अभिनिवेश है, यह पाँचों बातें बद्ध जीव में होती
( ६७ ) हैं, और इनका होना ही बन्धन का हेतु है। अब बुद्धि को बिगाड़नेवाली अशक्तियों के भेद कहते हैं— अशक्तिरष्टाविंशतिधातु ॥३८॥ अर्थ—अशक्ति अट्ठाईस प्रकार की है, वह प्रकार अब कहते हैं। ग्यारह इन्द्रियों के विघात होजाने से ग्यारह प्रकार की, और नौ प्रकार की तुष्टि, तथा आठ प्रकार की सिद्धि से बुद्धि का प्रति- कूल होना—यह सब मिलकर अट्ठाईस प्रकार की बुद्धि अशक्ति बुद्धि में होती है। इन्द्रियों का विघात इस तरह होता है, कि कान से सुनाई न देना, त्वचा में कोढ़ का होजाना, आँखों से अंधा हो जाना इत्यादि ग्यारह इन्द्रियों का विषय होना तथा तुष्टि आदि के जो भेद जिस प्रकार कहे हैं, उनसे बुद्धि का विपरीत होना, अशक्ति का लक्षण है। जब तक बुद्धि में अशक्ति नहीं होती, तब- तक अज्ञान भी नहीं होता। अब तुष्टि के भेद कहते हैं— तुष्टिर्नवधा ॥३६॥ अर्थ—तुष्टि नौ प्रकार की है। इसका भिन्न-भिन्न प्रत्यक्ष आचार्य आगे के सूत्रों में आप ही करेंगे। अतः यहाँ व्याख्या लिखना व्यर्थ है। सिद्धिरष्टधा ॥४०॥ अर्थ—सिद्धि आठ प्रकार की है, इसका प्रत्यक्ष भी आगे लिखेंगे। अब पूर्व कहे हुए विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि और सिद्धि के भेदों की व्याख्या आगे के चार सूत्रों में करेंगे। अवान्तरभेदाः पूर्ववत् ॥४१॥ अर्थ—विपर्यय अर्थात् मिथ्या ज्ञान के अवान्तर भेद जो सामान्य रीति से पूर्वाचार्यों ने किये हैं, उनको उसी तरह समझना
( ६८ ) चाहिये, यहाँ विस्तारभय से नहीं कहे गये। अविद्यादिकों के जितने भेद हैं, उनकी विशेष व्याख्या विस्तारभय के कारण छोड़ दी है। यदि कहे जावें तो कारिकाकार ने अविद्या के बासठ भेद माने हैं, जिसमें आठ-आठ प्रकार का तम और मोह, दश प्रकार का महामोह, अठारह प्रकार का तामिस्र और अठारह ही प्रकार का अन्धता मिश्र—यह सब मिलकर बासठ प्रकार के हुए। यदि इतने प्रकार के भेदों की भिन्न-भिन्न व्याख्या की जावै, तो बड़ा भारी दफ़्तर भरने को चाहिये, लेकिन हमारे विचार से इतने भेद मानना और उनकी व्याख्या करना केवल झगड़ा ही है। एवमितरस्याः ॥४२॥ इसी प्रकार अशक्ति के भेद भी पूर्वाचार्यों के कथना- नुसार समझने चाहियें। आध्यात्मिकादिभेदान्नवधा तुष्टिः ॥४३॥ अर्थ—प्रकृति, उपादान, काल, भाग्य—यह चार प्रकार के भेद होने से आध्यात्मिक तुष्टि कहलाती है, और पाँच प्रकार की बाह्य विषयों से उपराम को प्राप्त होनेवाली तुष्टि है। एवम् आध्यात्मिकादि भेदों के होने से नौ प्रकार से है, कि जो कुछ दीखता है, वह सब प्रकृति का ही परिणाम है, और उसको प्रकृति ही करती है। मैं कूटस्थ हूँ—ऐसी प्रकृति के संबन्ध में बुद्धि होने का नाम प्रकृति तुष्टि है, और जो संन्यासी होकर आश्रम ग्रहण रूपी उपादान से तुष्ट मानते हैं, वह उपादान तुष्टि है। जो संन्यासी होकर भी समाधि आदि अनुष्ठानों से बहुत समय में तुष्टि मानते हैं उसे काल तुष्टि कहते हैं, और उसके बाद धर्ममेघ समाधि में जो तुष्टि होती है, उसे भाग्य- तुष्टि कहते हैं। बाह्य पांच प्रकार की तुष्टि इस तरह है कि माला, चन्दन, वनिता ( स्त्री ) आदि के प्राप्त करने में दुःख उत्पन्न होगा,
·( ६६ ) ऐसा करके उनका त्याग करदेना, यह एक प्रकार की तुष्टि हुई। पैदा किये हुये धन को या तो चोर चुरा ले जायँगे या राजा दण्ड देकर छीन लेगा तो बड़ाभारी दुःख उत्पन्न होगा—ऐसा विचार कर जो त्यागना है, यह दूसरी तुष्टि है। यह धनादिक बड़े परिश्रम से संचय किया गया है, इसकी रक्षा करनी योग्य है। व्यर्थ न खोना चाहिये—ऐसा विचार करके जो विषय-वासना से बचना है, इसको तीसरी तुष्टि कहते हैं, भोग के अभ्यास से काम वृद्धि होती है और विषय के न प्राप्त होने से कामियों को बड़ाभारी कष्ट होता है। ऐसा विचार कर जो भोगों से बचना है, यह चौथी तुष्टि का लक्षण है। हिंसा वा दोषों के देखने से उपराम हो जाना, पाँचवीं तुष्टि का लक्षण है। यह पाँच प्रकार की तुष्टियों की व्याख्या केवल उपलक्षण मात्र की गई है। इनकी अवधि यहीं तक न समझकर इसी प्रकार की और भी तुष्टियाँ इन्हीं पाँच प्रकार की तुष्टियों में परिगणित कर लेनी चाहियें। ऊहादिभिः सिद्धिः ॥४४॥ अर्थ—'ऊह' शब्द, अध्ययन और तीनों प्रकार के दुःखों का नाश होना, मित्र का मिलना, दान करना—इस तरह आठ प्रकार की सिद्धि होती है। बिना किसी के उपदेश के पूर्वजन्म के संस्कारों से-तत्व को अपने आप विचारने का नाम ऊह है। दूसरे से सुनकर वा अपने आप शास्त्र को विचार कर जो ज्ञान उत्पन्न किया जाता है, उसका नाम शब्द है। शिष्य और आचार्य- भाव से शास्त्र पढ़कर ज्ञानवान् होने को अध्ययन कहते हैं। यदि कोई दयावान् अपने स्थान पर ही उपदेश देने आया हो, और उसी उपदेश से ज्ञान होगया हो, इसको सुहृत्प्राप्ति कहते हैं और धन आदि देकर ज्ञान का जो प्राप्त करना है, उसको दान कहते हैं, और पूर्वोक्त आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक, तीन
( १०० ) प्रकार के दुःखों के विवरण को शास्त्र के आदि में हम वर्णन कर चुके हैं। प्र०-ऊह आदिकों से ही सिद्धि क्यों मानी जाती है ? क्योंकि बहुतेरे मनुष्य मन्त्रों से अणिमादिक आठ सिद्धि मानते हैं, तब क्या उनका सिद्धान्त मिथ्या होसकता है ? उ०-नेतरादितरहानेन विना ॥ ४५ ॥ अर्थ-ऊहादि पञ्चक के विना मन्त्र आदिकों से तत्व की सिद्धि प्राप्त नहीं होती, क्योंकि वह सिद्धि इतर अर्थात् विपर्य्यय ज्ञान के विना भी प्राप्त होती है; अतएव सांसारिकी सिद्धि होने के कारण यह पारमार्थिकी नहीं कहला सकती। बस यहाँ तक समष्टिसर्ग और प्रत्ययसर्ग समाप्त होगया, इस से आगे “व्य- क्तिभेदः कर्मविशेषात्” इस संक्षेप से कहे हुए सूत्र को विशेष रूप से प्रतिपादन करेंगे। दैवादिप्रभेदा ॥४६॥ अर्थ-दैव आदि सृष्टि के प्रभेद हैं, अर्थात् एक दैवी सृष्टि, दूसरी मनुष्यों की सृष्टि है। यहाँ पर दैव और मनुष्यों के कहने से यह न समझना चाहिये, कि देवता जैसे और साधारण मनुष्य मानते हैं, वही हैं, किन्तु विद्वानों का नाम देव है और जो मिथ्या बोलते हैं वे मनुष्य हैं। किन्नर, गन्धर्व, पिशाच आदि यह सब मनुष्यों के ही भेद हैं, जैसा कि श्रुतियाँ कहती हैं। “सत्यं वै देवा अनृतं मनुष्याः, विद्वां ꣳ सो हि देवाः” इत्यादि। और महर्षि कपिलजी को भी यही बात अभीष्ट (मंजूर) है, जैसाकि उन्होंने आगे ५३ वें सूत्र में प्रतिपादन किया है। अब सृष्टि का प्रयोग कहते हैं- आब्रह्मस्तम्भपर्यन्तं तत्कृते सृष्टिरविवेकात् ॥४७
( १०१ ) अर्थ—ब्राह्मणों से लेकर स्थावरादि तक जितनी सृष्टि है, वह सर्व पुरुष के ही वास्ते है, और उसे भी विवेक के होने तक ही सृष्टि रहती है, बाद को मुक्ति होने से छूट जाती है। अब तीन सूत्रों से सृष्टि के विभाग को कहते हैं— ऊर्ध्वं सत्वविशाला ॥४८॥ अर्थ—जो सृष्टि ऊपर है, वह सत्व-प्रधान है। यहाँपर ऊपर कहने से आचार्य का प्रयोजन ज्ञान के मार्ग से उन्नति करने वालों से है, अर्थात् सतोगुणी उन्नति करते हैं, क्योंकि सतो- गुण प्रकाश करता है, इस कारण सतोगुणी अर्थात् ज्ञानी लोग सदा उन्नति करते हैं, इस कारण ऊपर जाते हैं। तमोविशाला मूलतः ॥४९॥ अर्थ—तमोगुणी अन्तःकरण वाले जीव नीच गति अर्थात् पशु-पक्षी और कीड़े आदि की योनियों को प्राप्त होते हैं। मध्ये रजोविशाला ॥५०॥ अर्थ—और बीच में जो शरीर हैं, वे रजोगुण प्रधान हैं। बीच का शरीर सामान्य मनुष्य का जन्म है, और सब शरीर इसकी अपेक्षा ऊँचे हैं, या नीचे। सामान्य मनुष्य रजोगुणी होता है। सत्पुरुष सतोगुणी, पशु आदि तमोगुणी। इस के अन्दर भी भेद हैं। प्र०—प्रकृति तो एक ही है, लेकिन सृष्टि अनेक तरह की क्यों होती है ? उ०—कर्मवैचित्र्यात् प्रधानचेष्टा गर्भदासवत् ॥५१ अर्थ—यह सब प्रधान अर्थात् प्रकृति की चेष्टा कर्मों की विचित्रता से होती है, इस में दृष्टान्त भी है, जैसे—कोई दासी
( १०२ ) अपने स्वामी के वास्ते नाना प्रकार की चेष्टा ( टहल ) करती है, वैसे ही उसका पुत्र भी अपने स्वामी के प्रसन्नतार्थ नाना प्रकार की चेष्टा करने लगता है, अतएव जो जैसा कर्म करेगा उसकी सृष्टि भी वैसा ही कर्म करेगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है । प्र०—ऊर्ध्व की सृष्टि सत्त्वगुण प्रधान है, तो मनुष्य उसी से कृतार्थ हो सकता है, फिर मोक्ष से क्या करना है ? उ०—आवृत्तिस्तत्राप्युत्तरोत्तरयोनियोगाद्धेयः॥५२ अर्थ—उन ऊपर के और नीचे के देशों में भी आवृत्ति योग रहता है, अर्थात् जब वहाँ गये तब सात्विकी वृत्ति रही, और यहाँ रहे तब वही रजोगुण फिर आगया, और वहाँ भी छोटी बड़ी जातियाँ होती हैं, उनमें जन्म होने से ठीक-ठीक सत्व नहीं रहता ; इस वास्ते ऐसा विचार करना सब तरह छोड़ने योग्य है। और भी इस पक्ष को पुष्ट करते हैं । समानं जरामरणादिजं दुःखम् ॥५३॥ किसी शरीर में हों, चाहे देवता हों, चाहे सामान्य मनुष्य अथवा पशु, पक्षी—बुढ़ापे और मृत्यु का दुःख सब में होता है ; इस कारण सब शरीरों की अपेक्षा मुक्त होना ही उत्तम है । प्र०—जिस से यह शरीर उत्पन्न हुआ है, यदि उसी में लय हो जाय, तब क्या मुक्ति नहीं मानी जायगी ? उ०—न कारणलयात् कृतकृत्या मग्नव- दुत्थानात् ॥५४॥ अर्थ—कारण में लय हो जाने से भी कृतकृत्यता नहीं होती, क्योंकि जैसे मनुष्य जब जल में डूबता है, तो कभी तो ऊपर को आता है, और कभी नीचे को बैठ जाता है । इसी तरह जो मनुष्य कारण में लय हो गया है, कभी जन्म को प्राप्त होता
( १०३ ) है, कभी मरण को प्राप्त होता है, और ऐसा कहने से आचार्य का यह तात्पर्य नहीं है कि मुक्त-जीव कभी जन्म को नहीं प्राप्त होता ; क्योंकि प्रथम तो आचार्य जीव को नित्य मानते हैं, जब उसका कारण ही नहीं तो लय किसमें होगा। दूसरे जो डूबे हुये का दृष्टान्त दिया, अशान्ति का पोपक दिया तथा इस में पराधीनता दिखाई ; किन्तु मुक्त-जीवन तो न अशान्त है न पराये अधीन है। तीसरे यहाँ पर सृष्टि का प्रसंग चला आता है, किन्तु जीव का विषय भी नहीं है ; इसलिये अन्तःकरण के सुषुप्ति में प्रकृति में लय होने से तात्पर्य है। प्र०—जबकि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि हैं, तो प्रकृति ही में सृष्टि का कर्तृत्व क्यों माना जाता है ? उ०—अकार्यत्वेऽपि तद्योगः पारवश्यात् ॥५५॥ अर्थ—यद्यपि प्रकृति और पुरुष दोनों अकार्य अर्थात् नित्य हैं तथापि प्रकृति को ही सृष्टि करने का योग है ; क्योंकि जो परवश होगा वही तो कार्य को करेगा। इस विचार से प्रकृति ही में परवशता दीखती है। प्र०—स हि सर्ववित् सर्वकर्त्ता ॥५६॥ अर्थ—यदि प्रकृतिरूपी पदार्थ को सर्वज्ञ और सर्ववित् ( "विद् सत्तायाम्" इस धातु का प्रयोग है ) सर्वशक्तिमान् मान लिया जाय तो क्या हानि है ? उ०—ईदृशेश्वरसिद्धिः सिद्धा ॥ ५७ ॥ अर्थ—इस तरह वेद के प्रमाणों से ईश्वर को सिद्धि सिद्ध है। प्रकृति में सर्वज्ञत्वादि गुण तो किसी सूरत में नहीं हो सकते हैं, सर्वज्ञत्वादि गुण तो ईश्वर ही में हैं। प्र०—प्रकृति ने सृष्टि को क्यों पैदा किया ?
( १०४ ) उ०-प्रधानसृष्टिः परार्थं स्वतोऽप्यभोक्तृत्वा- दुष्ट्रकुङ्कुमवहनवत् ॥ ५८ ॥ अर्थ-प्रधान जो सृष्टि है उसकी सृष्टि दूसरे के वास्ते है ; क्योंकि वह स्वयं भोग नहीं कर सकती । दृष्टान्त-जैसे कि ऊँट केशर को अपने ऊपर लादकर पराये वास्ते ले जाता है लेकिन उस केशर से अपना कुछ स्वार्थ नहीं रखता । इसी प्रकार प्रकृत की सृष्टि भी दूसरे के वास्ते है । प्र०-ऊँट का जो दृष्टांत दिया गया सो ऊँट चेतन है, और चेतन की चेष्टा दूसरे के वास्ते हो सकती है, लेकिन जड़ की नहीं हो सकती ? उ०--अचेतनत्वेऽपि क्षीरवच्चेष्टितं प्रधानस्य ॥५९ अर्थ-यद्यपि प्रकृति अचेतन है, तथापि उसकी प्रवृत्ति दूसरे के वास्ते है । दृष्टान्त-जैसे कि दूध जड़ है, लेकिन उसकी प्रवृत्ति चैतन्य बछड़ा आदि के वास्ते है । और भी दृष्टान्त है- कर्म्मवद्दृष्टेर्वा कालादेः ॥६०॥ अर्थ-जैसेकि खेती के करने में बीज बोया जाता है, वह अपनी ऋतु के समय में वृक्षरूप को धारण कर दूसरों के उपकारार्थ फल देता है ; इसी प्रकार प्रकृति की सृष्टि भी दूसरों के वास्ते है । प्र०-ऊँट तो पिटने के डर से केशर को लादकर ले जाता है, लेकिन प्रकृति को तो किसी का डर नहीं है ? उ०-स्वभावाच्चेष्टितमनभिसन्धानाद्भृत्य- वत् ॥ ६१ ॥ अर्थ-जैसे चतुर सेवक अपने स्वामी का सब काम करता है, और उसमें अपने स्वार्थ का कुछ भी प्रयोजन नहीं रखता,
( १०५ ) इसी तरह प्रकृति भी अपने आप सृष्टि करती है, पुरुष के भय प्रेरणादिक की अपेक्षा नहीं करती । कर्माकृष्टेर्वाऽनादितः ॥६२॥ अर्थ—अथवा कर्मों के अनादि प्रवाह के वश होकर प्रकृति सृष्टि को करती है । अब इससे आगे सृष्टि की निवृत्ति के कारणों को कहेंगे— विविक्तबोधात् सृष्टिनिवृत्तिः प्रधानस्य सूदवत् पाके ॥६३॥ अर्थ—जब विविक्त बोध अर्थात् एकान्त ज्ञान हो जाता है, तब प्रकृति की सृष्टि निवृत्त हो जाती है, जैसे—रसोइया भोजन बनाकर निश्चिन्त हो जाता है, फिर उसको कोई काम विशेष नहीं रहता । इसी तरह प्रकृति भी विवेक ( ज्ञान ) को उत्पन्न करके अपनी सृष्टि को निवृत्त कर देती है । आशय यह है कि ज्ञान होने से संसार छूट जाता है । प्र०—जबकि एक को ज्ञान हुआ और उससे सृष्टि की निवृत्ति हो गई, तो फिर विशेष जीव बद्ध क्यों रहते हैं ? क्योंकि सृष्टि की निवृत्ति में बन्धन न रहना चाहिये । उ०—इतर इतरवत्तद्दोषात् ॥ ६४ ॥ अर्थ—जो विवेक ( ज्ञान ) रहित है, वह बद्ध के बराबर है, क्योंकि अज्ञान के दोष से बँधा रहना ही पड़ता है। अब सृष्टि निवृत्ति का फल कहते हैं— द्वयोरेकतरस्य वोदासीन्यमपवर्गः ॥ ६५ ॥ अर्थ—प्रकृति और पुरुष इन दोनों की आपस में उदासीनता का होना ही मुक्ति कहलाता है । दूसरा यह भी अर्थ हो सकता
( १०६ ) है, कि ज्ञानी और अज्ञानी इन दोनों में से एक के वास्ते प्रकृति की उदासीनता ही को अपवर्ग मुक्ति कहते हैं । प्र०—जबकि विवेक के कारण प्रकृति पुरुष को मुक्त कर देती है, तो और भी पुरुष विवेक से मुक्त हो जायेंगे, ऐसा विचार- कर प्रकृति विवेक के डर के मारे सृष्टि करने से विरक्त क्यों नहीं होती ? उ०—अन्यसृष्ट्युपरागेपि न विरज्यते प्रबुद्ध- रज्जुतत्वस्येवोरगः ॥ ६६ ॥ अर्थ—यद्यपि प्रकृति एक मनुष्य के ज्ञानी होने से उसके वास्ते सृष्टि से विमुख हो जाती है, तथापि दूसरे अज्ञानी के वास्ते प्रकृति सृष्टि करने से विमुख नहीं होती । दृष्टान्त—जैसे कि किसी मनुष्य ने रस्सी को देखा, उस रस्सी को देखकर उसको प्रथम साँप की भ्रान्ति हुई, और भय मालूम पड़ा । बाद को जब उसने विचार करके देखा, तो उसको यथार्थ ज्ञान हो गया, कि यह साँप नहीं है, किन्तु रस्सी है । जब उसको आनन्द हो गया, तब वह रस्सी उस ज्ञानी को फिर भय नहीं देती, किन्तु जो अज्ञानी है उसे तो साँप की भ्रान्ति से भय देती ही है । इसी प्रकार प्रकृति की भी व्यवस्था है, कि जो विवेकी है उसके वास्ते इसकी सृष्टि नहीं है, किन्तु अविवेकी के वास्ते है । कर्म निमित्तयोगाच्च ॥ ६७ ॥ अर्थ—सृष्टि के प्रवाह में जो कर्म हेतु हैं उनके कारण भी प्रकृति सृष्टि करने से विमुख नहीं होती, और मुक्त मनुष्य के कर्म छूट जाते हैं; इस कारण उसके वास्ते सृष्टि शान्त हो जाती है । प्र०—जब सब मनुष्य समान और निरपेक्ष हैं, तो किसी
सूत्र में उपकार शब्द को स्थापित किया है ।
( १०७ ) के वास्ते प्रकृति सृष्टि की निवृत्ति और किसी के वास्ते प्रवृत्ति हो इसमें क्या नियम है ? उ०—कर्म का प्रवाह ही इसमें नियम है । प्र०—यह उत्तर ठीक नहीं, क्योंकि न मालूम किस मनुष्य का कौन-सा कर्म है ? यह भी कोई निश्चय किया हुआ नियम नहीं है ? उ०—नैरपेक्ष्येऽपि प्रकृत्युपकारेऽविवेको निमित्तम् ॥ ६८ ॥ अर्थ—यद्यपि सब पुरुष निरपेक्ष हैं, अर्थात् एक दूसरे की अपेक्षा नहीं रखता, तथापि यह मेरा स्वामी है, मैं इसका सेवक हूँ ; इस तरह प्रकृति के उपकार में ( सृष्टि करने में ) अविवेक ही निमित्त है । प्रत्यक्ष यह है कि जब प्रकृति यह बात चाहती है, कि यह मनुष्य मुक्त हो, तब ही उसको अपनी सृष्टि के भीतर रखकर अनेक प्रकार के कार्यों में लगा देती है, और उन्हीं कार्यों को करता हुआ वह मनुष्य किसी न किसी जन्म में विवेकी ( ज्ञानी ) होकर मुक्त हो जाता है; इसी वास्ते आचार्य ने सूत्र में उपकार शब्द को स्थापित किया है । प्र०—जबकि प्रकृति का स्वभाव वर्त्तमान मान लिया है, तो ज्ञान के उत्पन्न होने पर क्यों निवृत्त हो जाती है ? क्योंकि जो जिसका स्वाभाविक धर्म है, वह सब जगह एकसा रहना चाहिए ? उ०—नर्त्तकीवत् प्रवृत्तस्यापि निवृत्तिश्चा- रितार्थ्यात् ॥ ६९ ॥ अर्थ—जैसे नाच करनेवाली का नाच करना स्वभाव है, वह सब सभा को नाच दिखाती है, और जब नाच करते करते उसके
( १०८ ) मनोरथ पूरे हो जाते हैं, तब वह नाच करने से निवृत्त हो जाती है; इसी तरह यद्यपि प्रकृति का सृष्टि करना स्वभाव है, परन्तु उस सृष्टि करने का जो प्रयोजन है वह विवेक के उत्पन्न होने से निवृत्त होजाता है, अतएव उससे निवृत्त भी होजाती है। अब मुक्ति से पुनरागमन होता है या नहीं, इसपर यहां इस कारण विचार किया जाता है, कि इस ऊपर के सूत्र में विवेक के उपरान्त सृष्टि की निवृत्ति प्रतिपादन कर चुके, और इस पर यह सन्देह होता है, कि जब प्रकृति यह समझ लेती होगी, कि पुरुष को मेरे संयोग से अनेक दुःखादि होते हैं, अत- एव फिर उसका संयोग किसी काल में न कहना चाहिये। इसी मत पर तो आचार्य विचार करते हैं। दोषबोधेऽपि नोपसर्पणं प्रधानस्य कुल- वधूवत् ॥ ७० ॥ अर्थ—पुरुष को मेरे संयोग से दुःख होगा, इस बात में प्रकृति अपना दोष जानती है, तो क्या फिर उसका संयोग नहीं करती, किन्तु अवश्य करती है, जैसे—अच्छे वंश की पतिव्रता स्त्री से यदि कोई दोष हो भी जाय, और उससे स्वामी को कष्ट भी पहुँचे, तब क्या वह अपने पति के पास का जाना छोड़ देगी ? ऐसा नहीं होसकता, अवश्य जायगी; क्योंकि जो पति को त्यागती है, तो उसका पतिव्रत धर्म नष्ट होता है। और भी प्रकार से अन्य आचार्यों ने इस सूत्र का अर्थ किया है, कि जब प्रकृति अपना दोष जान लेती है तब लज्जा के वश होकर फिर कभी पुरुष के पास नहीं जाती, जैसे कुलवधू नहीं जाती। इस अर्थ के करने से उनका तात्पर्य यह है, कि मुक्ति से पुनरावृत्ति नहीं होती, परन्तु यह अर्थ ठीक नहीं; क्योंकि विज्ञानभिक्षु ने "अपि" शब्द का कुछ भी आशय नहीं निकाला, और न यह समझा
( १०६ ) कि जो अपने दोष से पति को छोड़ दे, वह कुलवधू कैसे हो सकती है। कुलवधू वही होती है, जो अपने दोष को स्वामी से क्षमा कराकर अपने स्वामी की सेवा में तत्पर ( लगी ) रहे ; किन्तु अन्य टीकाकारों ने इस दृष्टान्त के गूढ़ आशय को बिना समझे जो लिख दिया है, सो योग्य नहीं है, अथवा आचार्य्य को यही बात माननीय थी, कि मुक्ति से फिर नहीं लौटता, तो इन से पहिले सूत्र में इस बात को एक दृष्टांत के द्वारा प्रतिपादन कर ही चुके थे, फिर इस सूत्र को बनाकर पुनरुक्ति क्यों करते । इसी ज्ञापक से सिद्ध है, कि मुक्ति से फिर लौट आता है, लेकिन इस पुनरुक्ति को अन्य आचार्य नहीं समझे। पुरुष का बन्ध और मोक्ष किस से होता है ? इस बात का विचार करते हैं । नैकान्ततो बन्धमोक्षौ पुरुषस्याविवेकादृते ॥७१॥ अर्थ—पुरुष को बन्ध मोक्ष स्वाभाविक नहीं है, किन्तु अविवेक ही से होते हैं। प्रकृतेराञ्जस्यात् ससंगत्वात् पशुवत् ॥ ७२ ॥ अर्थ—जब विचार करते हैं, तो ज्ञात होता है, कि प्रकृति का संयोग पुरुष को रहता है, उसीसे पुरुष का बन्ध है। प्रकृति का संयोग छूटना ही मोक्ष है, जैसे पशु रस्सी के संयोग से बँध जाता है; और उसका संयोग छूट जाता है, तब वह मुक्त हो जाता है; इसी तरह मनुष्य को भी जानना चाहिये । प्र०-प्रकृति कौन-से साधनों से बन्धन करती है, और कैसे मुक्त करती है ? उ०—रूपैः सप्तभिरात्मानं बध्नाति प्रधानं कोशकारवद्विमोचयत्येकरूपेण ॥ ७३ ॥ अर्थ-धर्म, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और
( ११० ) अनैश्वर्य—इन सात रूपों से प्रकृति पुरुष का बन्धन करती है, जैसे—तलवार के म्यान बनानेवाले की कारीगरी से तलवार ढकी रहती है, इसी तरह प्रकृति से पुरुष को भी समझना चाहिये, और वही प्रकृति ज्ञान से आत्मा को दुःखों से मुक्त कर देती है। प्र०—जब मुक्ति में हेतु ज्ञान कहा, और धर्म्मादिक सब बन्धन के हेतु कहे, तो धर्म में क्यों किसी की प्रवृत्ति होगी, और क्यों ध्यानादि के वास्ते उपाय किया जावेगा ? उ०—निमित्तत्वमविवेकस्येति न दृष्टहानिः।७४ अर्थ—मुक्ति के न होने में अज्ञान ही ( अविवेक ) निमित्त है, इस वास्ते उसकी निवृत्ति ही के वास्ते यत्न करना चाहिये और उस यत्न में धर्म्मानुष्ठान आदि चित्तशोधक कर्म भी परि- गणित हैं, अतः उसकी हानि नहीं हो सकती ; क्योंकि बिना धर्म, ध्यान आदि किये, कोई भी ज्ञानवान् हो ही नहीं सकता। अब विवेक कैसे होता है, उसका उपाय कहते हैं— तत्त्वाभ्यासान्नेति नेतीति त्यागाद्विवेक सिद्धिः ॥ ७५ ॥ अर्थ—देह आत्मा नहीं है, पुत्र आत्मा नहीं है, इन्द्रियाँ आत्मा नहीं हैं, मन आत्मा नहीं है। इस प्रकार नेति-नेति करके त्याग से और तत्त्वाभ्यास करने से विवेक की सिद्धि हो जाती है। श्रुति भी इसी आशय को कहती है, “अर्थात् आदेशो नेति नेतीति त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः”। अधिकारिभेदान्न नियमः ॥ ७६ ॥ अर्थ—कोई मूर्ख बुद्धिवाले होते हैं, कोई विलक्षण ( श्रेष्ठ ) बुद्धिवाले होते हैं। इस कारण एक ही जन्म में सबको विवेक
पादन करती है ।
( १११ ) ( ज्ञान ) हो जावे, यह नियम नहीं है, किन्तु श्रेष्ठ अधिकारी एक जन्म में भी विवेकी हो सकता है । बाधितानुवृत्त्या मध्यविवेकतोऽप्यपभोगः ॥ ७७ अर्थ—जिसको विवेक साक्षात्कार हो भी गया है, उसको भी कर्मों का भोग भोगना होगा ही, क्योंकि यद्यपि कर्म एकबार बाधित भी कर दिये जाते हैं, तथापि उनकी अनुवृत्ति होती है । प्रारब्ध आदि संज्ञावाले कर्म सर्वथा विनाश को प्राप्त नहीं होते । जीवन्मुक्तश्च ॥ ७८ ॥ अर्थ—जब विवेक हो जाता है तब इस शरीर की मौजूदगी में भी मुक्त हो सकता है, उसको ही जीवन्मुक्त कहते हैं । अब जीवन्मुक्त होने का उपाय भी कहते हैं । उपदेश्योपदेष्टृत्वात् तत्सिद्धिः ॥ ७६ ॥ अर्थ—जब शिष्य बनकर गुरु के मुख से शास्त्रों को पढ़ेगा और विचार करने से विवेक की उत्पत्ति हो जावेगी, तो जीवन् मुक्त होना कुछ कठिन बात नहीं है । बिना गुरु द्वारा उपदेश के जीवन्मुक्त नहीं हो सकता । इसी विषय को श्रुति भी प्रति- पादन करती है । श्रुतिश्च ॥ ८० ॥ “तद्विज्ञानार्थं सगुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्म- निष्ठम्। तस्मै सविद्वानुपासन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमा- न्विताय येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाचतान्तत्वतो ब्रह्मविद्याम् ।” अर्थ—जबकि जिज्ञासु पुरुष को सत्य के जानने की अभि- लाषा हो, उस समय समित्पाणि अर्थात् पुष्पादिक हाथ में लेकर श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ (वेद के जाननेवाले) गुरु की शरण ले, फिर उस महात्मा गुरु को चाहिये, कि ऐसे शिष्य को धोखे में न डाले,
( ११२ ) और वह उपदेश करना चाहिये, जिस कारण से वह शिष्य सत्यमार्ग को प्राप्त हो जाय । प्र०-ब्रह्मनिष्ठ गुरु की ही शरण क्यों ले, और भी तो बहुतेरे होते हैं ? उ०-इतरथान्धपरम्परा ॥ ८१ ॥ यदि ज्ञानवान् ब्रह्मनिष्ठ गुरु से ज्ञान न लिया जावे, तो क्या मूर्खों से लिया जायगा, फिर तो अन्ध-परम्परा गिनी जायेगी, जैसे- एक अन्धा कुवें में गिरा, तो सब ही अन्धे कुवें में गिर पड़े; इसी प्रकार मूर्ख की शरण लेने से सब मूर्ख रह जाते हैं । प्र०-जब ज्ञान से कर्म नाश हो जाते हैं, तो फिर शरीर क्यों रहता है, और उसकी जीवन्मुक्त संज्ञा कैसे होती है ? उ०-चक्रभ्रमणवद्धृतशरीरः ॥ ८२ ॥ अर्थ-जैसे कुम्हार का चाक भोलुआ इत्यादि के बनाने के समय डंडे से चलाया जाता है, और कुम्हार-बर्तनों को बना- कर उतार भी लेता है, लेकिन उस चलाने का ऐसा वेग होता है कि पीछे बहुत देर तक वह चाक घूमता रहता है; इसी तरह ज्ञान के उत्पन्न होते ही यद्यपि नये कर्म उत्पन्न नहीं होते तथापि प्रारब्ध कर्मों के बेग से शरीर को धारण किये हुये जीवन्मुक्त रहता है । प्र०-यद्यपि चक्र के घूमने में दण्डे की कोई ताड़ना उस समय नहीं है, तो भी वह पहिली ताड़ना के कारण से चलता है, किन्तु जब जीवन्मुक्त के सब रागादि नाश हो जाते हैं, तो वह उपभोग किसके सहारे से करता है ? उ०-संस्कारलेशतस्तत्सिद्धिः ॥ ८३ ॥ अर्थ-रागादिकों के संस्कार का भी लेश रहता है, उसी के
चतुर्थोऽध्यायः
( ११३ ) सहारे से उपभोग की सिद्धि जीवन्मुक्त को हो जाती है, वास्त- विक राग जीवन्मुक्त को नहीं रहते। यह सब जीवन्मुक्त के विषय में कहा। अब बिना देह की मुक्ति के वास्ते अपना परमसिद्धान्त कहकर अध्याय को समाप्त करते हैं। विवेकान्निःशेष दुःखनिवृत्तौ कृतकृत्यता नेत- रान्नेतरात् ॥ ८४ ॥ अर्थ—विवेक ही से सब दुःख दूर होते हैं, तब जीव कृत- कृत्य होता है, दूसरे से नहीं होता, नहीं होता। पुनरुक्ति अर्थात् नेतरात् इसका दुबारा कहना पक्ष की पुष्टि और अध्याय की समाप्ति के वास्ते है। इति सांख्यदर्शने तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ चतुर्थोऽध्यायः इस अध्याय में विवेक (ज्ञान) के साधनों का वर्णन करेंगे— राजपुत्रवत्तत्वोपदेशात् ॥ १ ॥ अर्थ—पूर्व सूत्र से यहाँ विवेक की अनुवृत्ति आती है। राजा के पुत्र के समान तत्त्वोपदेश होने से विवेक होता है। यहाँ यह कथा है, कि कोई राजा का पुत्र गंडमाला रोग से युक्त उत्पन्न हुआ था, इस कारण वह शहर में से निकाल दिया गया, और उसको किसी शवर ( भील ) ने पाल लिया। जब वह बड़ा हो गया, तब अपने को भी शवर मानने लगा। कालान्तर में ( कुछ दिनों के बाद ) उस राजपुत्र को जीता हुआ देखकर कोई