सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ६५ ) धारणा, आसन और अपने कर्म से ध्यान की सिद्धि होती है। प्रथम धारणा का लक्षण कहते हैं— निरोधश्छर्दिर्विधारणाभ्याम् ॥३३॥ अर्थ—छर्दि ( वमन ) और विधारण ( त्याग ) अर्थात् प्राण का पूरक, रेचक और कुम्भक से निरोध ( वश में रखने ) को धारणा कहते हैं । यद्यपि आचार्य ने धारणा शब्द का उच्चारण इस सूत्र में नहीं किया है तथापि आगे के दो सूत्रों में आसन और स्वकर्म का लक्षण किया है। इसी परिशेष से धारणा शब्द का अध्याहार इस सूत्र में कर लिया जाता है, जैसे—पाणिनि- मुनि ने भी लाघव के वास्ते “लट्, शेषे च” इत्यादि सूत्र कहे हैं। अब आसन का लक्षण कहते हैं— स्थिरसुखमासनम् ॥३४॥ अर्थ—स्थिर होने पर जो सुख का साधन हो, उसी का नाम आसन, जैसे—स्वस्तिका ( पालकी ) आदि स्थिर होने पर सुख के साधन होते हैं, तो उनको भी आसन कह सकते हैं। किसी विशेष पदार्थ का नाम आसन नहीं है। अथ स्वकर्म का लक्षण कहते हैं— स्वकर्म स्वाश्रमविहितकर्मानुष्ठानम् ॥३५॥ अर्थ—जो कर्म अपने आश्रम के वास्ते शास्त्रों ने प्रतिपादन किये हैं उनके अनुष्ठान को स्वकर्म कहते हैं। यहाँ पर कर्म शब्द से यम, नियम, और प्रत्याहार, इन तीनों को समझना चाहिये ; क्योंकि इनका सब वर्णों के वास्ते समान सम्बन्ध है, और इन यमादिकों को योगशास्त्र में योग का अङ्ग तथा ज्ञान का साधन भी माना है, और भी जो ज्ञान प्राप्ति में उपाय हैं, उनको भी कहेंगे—