भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * विश्वामित्रजीका श्रीरामके सामने शुकदेवजीका दृष्टान्त उपस्थित करना * ६७


इस प्रकार परीक्षाद्वारा शुकदेवजीके स्वभावको जानकर राजा जनकने उन्हें सादर अपने पास बुलवाया और प्रसन्नचित्त देखकर प्रणाम किया । तत्पश्चात् शीघ्रतापूर्वक उनका स्वागत करके राजाने उनसे कहा—'ब्रह्मन् ! जगत्में परम पुरुषार्थकी सिद्धिके लिये जो-जो आवश्यक कर्तव्य हैं, वे सब आपने पूर्ण कर लिये हैं । सारे मनोरथोंको प्राप्त कर लिया है (इस तरह आप कृतकृत्य तथा आप्तकाम हो चुके हैं)। अब आपको किस वस्तुकी इच्छा है ?'

श्रीशुकदेवजीने कहा —महाराज ! मैं जानना चाहता हूँ कि यह संसाररूपी आडम्बर कैसे उत्पन्न हुआ है और इसकी शान्ति या विनाश कैसे होता है। आप शीघ्र ही मुझसे इस विषयका यथावत् रूपसे प्रतिपादन कीजिये ।

श्रीविश्वामित्रजी कहते हैं—महाराज ! इस प्रकार पूछे जानेपर राजा जनकने शुकदेवजीको उस समय वही बात बतायी, जो पहले उनके महात्मा पिता व्यासजीके द्वारा बतायी गयी थी।

तब शुकदेवजीने कहा—वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाराज ! मैंने पहले विवेकसे स्वयं ही यह बात जान ली थी। फिर जब पिताजीसे इसके विषयमें पूछा, तब उन्होंने भी मुझे यही बात बतायी और आज आपने भी यही बात कही है। शास्त्रोंमें भी महावाक्योंका यही अर्थ दृष्टिगोचर होता है। वह इस प्रकार है—'यह विनाशशील संसार अपने संकल्पसे उत्पन्न हुआ है और संकल्पका आत्यन्तिक विनाश होनेसे नष्ट हो जाता है अतः सर्वथा निःसार है। यही शास्त्रोंका निश्चय है।' महाबाहो ! क्या यही अविचल सत्य है ? यदि हाँ, तो इसका इस तरह उपदेश कीजिये, जिससे यह मेरे हृदयमें अचल—असंदिग्धरूपसे बैठ जाय । संसारके विषयोंमें भटकते हुए चित्तके द्वारा इधर-उधर भटकाया जाता हुआ मैं आज आपसे शान्ति लाभ करना चाहता हूँ।

राजा जनकने कहा—मुने ! इस ब्रह्माण्डमें एक अखण्ड चिन्मय परम पुरुष परमात्माके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। आपने स्वयं विवेकके द्वारा इस तत्त्वको जाना है और फिर गुरुरूप पिताके मुखसे इसको सुना है। इससे बढ़कर दूसरा कोई निश्चय (जानने योग्य तत्त्व) नहीं है। मुनिकुमार ! आप बालक होते हुए भी विषयभोगोंके त्यागमें शूरवीर होनेके कारण महान् वीर हैं। आपकी बुद्धि दीर्घ कालतक बने रहनेवाले रोगरूपी भोगोंसे पूर्णतः विरक्त हो गयी है। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ! ब्रह्मन् ! जो प्राप्त करने योग्य वस्तु है, उसे पूर्णरूपसे आपने पा लिया है। आपका चित्त पूर्णकाम हो गया है। आप दृश्य वस्तु (बाह्य विषय) की ओर दृष्टिपात नहीं करते हैं, अतः मुक्त हैं। अभी और कुछ पाना या जानना शेष रह गया है, इस भ्रमको त्याग दीजिये।

(विश्वामित्रजी कहते हैं—श्रीराम !) महात्मा जनकके द्वारा इस प्रकार उपदेश पाकर शुकदेवजी अत्यन्त शुद्ध परम वस्तु परमात्मामें चुपचाप स्थित हो गये। उनके शोक, भय और श्रम—सभी नष्ट हो गये। वे सर्वथा निरीह एवं संशयरहित हो गये। तदनन्तर वे मेरुगिरिके प्रशस्त शिखरपर समाधि लगानेके लिये चले गये। वहाँ दस हजार वर्षोतक निर्विकल्प समाधिमें स्थित रहे और जैसे तेल समाप्त होनेपर दीपक बुझ जाता है, उसी प्रकार वे प्रारब्ध क्षीण हो जानेपर परमात्मामें लीन हो गये ।

(सर्ग १)