भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६६ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

बात थी, वह सब यथावत् एवं विशुद्ध रूपसे बता दी। उनका उपदेश सुननेके अनन्तर शुकदेवजीने सोचा, यह तो मैं पहले ही जान गया था। ऐसा विचारकर उन्होंने पिताजीके उस उपदेश-वाक्यका अपनी शुभ बुद्धिके द्वारा अधिक आदर नहीं किया। भगवान् व्यास भी अपने पुत्रके इस अभिप्रायको समझकर उससे बोले—'बेटा! भूतलपर जनक नामसे प्रसिद्ध एक राजा हैं, जो जाननेयोग्य तत्त्व (सच्चिदानन्दघन परमात्माको) यथार्थरूपसे जानते हैं। उनसे तुम्हें सम्पूर्ण तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जायगा।'

पिताके ऐसा कहनेपर शुकदेवजी सुमेरु पर्वतसे उतरकर पृथ्वीपर आये और महाराज जनकके द्वारा पालित विदेहपुरीमें जा पहुँचे। वहाँ छड़ीदार द्वारपालोंने महात्मा जनकको यह सूचना दी—'राजन्! राजद्वारपर व्यासजीके पुत्र शुकदेवजी खड़े हैं।' उन्होंने शुकदेवजीकी परीक्षा लेनेके लिये द्वारपालोंसे अवहेलनापूर्वक कहा—'शुकदेवजी आये हैं तो वहीं ठहरें।' ऐसा कहकर

राजा सात दिनोंतक चुपचाप बैठे रहे--उनकी कोई खोज-खबर नहीं ली। तत्पश्चात् राजा जनकने शुकदेवजीको राजमहलके आँगनमें बुलवाया। वहाँ आनेपर भी शुकदेवजी पूरे सात दिनोंतक उसी प्रकार उपरत होकर बैठे रहे। इसके बाद जनकने शुकदेवजीको अन्तःपुरमें ले आनेकी आज्ञा दी, किंतु वहाँ भी राजाने सात दिनोंतक उन्हें दर्शन नहीं दिया। वे चन्द्रमाके समान मुखवाले शुकदेवजीका अन्तःपुरमें यौवनके मदसे उन्मत्त कमनीय कान्तिवाली सुन्दरियोंद्वारा भाँति-भाँतिके भोजनों तथा भोगसामग्रियोंसे लालन-पालन कराते रहे।

परंतु जैसे मन्द गतिसे बहनेवाली वायु दृढ़मूल अविचल वृक्षको नहीं उखाड़ सकती, उसी प्रकार वे भोग तथा अनादर एवं उपेक्षाजनित दुःख भी व्यासपुत्रके मनको अपनी ओर खींच न सके, उसमें विकार पैदा न कर सके। शुकदेव वहाँ पूर्ण चन्द्रमाके समान निर्विकार, भोग और अनादरमें भी समान (हर्ष-विषादसे रहित), स्वस्थ, मौन तथा प्रसन्न-चित्त बने रहे।