संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
प्राप्ति करानेवाली होती है। कर्तव्यपालनके लिये जो शरीर आदिका संचालन होता है, वही जिसका धर्म है, उस क्रिया (श्रवण-मनन आदि साधन) से, सत्सङ्गसे और सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायसे शुद्ध एवं तेज की हुई अपनी बुद्धिके द्वारा जो स्वयं ही आत्माका उद्धार किया जाता है, वही परम स्वार्थकी सिद्धि है। विद्वान्लोग अन्तरहित, समतारूप परमानन्दसे पूर्ण परमार्थ वस्तु (परब्रह्म) को जानते हैं। जिन साधनोंसे उसकी प्राप्ति होती है, उनका नित्य-निरन्तर सेवन करना चाहिये। वे साधन हैं शास्त्रोंका स्वाध्याय और सत्सङ्ग आदि। जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक आत्म-कल्याणके साधनमें संलग्न होता है, उसे अपने पुरुषार्थसे ही हाथपर रखे हुए आँवलेकी भाँति वह अभीष्ट फल प्रत्यक्ष दिखायी देता है। जो इस प्रत्यक्ष पुरुषार्थको छोड़कर दैवरूपी मोहमें निमग्न होता है, वह मूढ़ है।
अतः शुभाशय श्रीराम ! अपनी कोरी कल्पनाके बलसे उत्पन्न, मिथ्याभूत तथा सम्पूर्ण कारण और कार्यसे रहित दैवकी अपेक्षा न रखकर आत्मकल्याणके लिये अपने उत्तम पुरुषार्थका आश्रय लो। शास्त्रोंद्वारा तथा महापुरुषोंके सदाचारसे विस्तारको प्राप्त हुए विविध देश धर्मोंद्वारा समर्थित जो परमात्माकी प्राप्तिरूप अतिशय प्रसिद्ध फल है, उसके लिये हृदयमें अत्यन्त उत्कट अभिलाषा होनेपर उसकी प्राप्तिके लिये चित्तमें स्पन्दन या चेष्टा होती है। तत्पश्चात् इन्द्रियों और हाथ-पैर आदि अङ्गोंमें क्रिया होती है—इनके द्वारा श्रवण-मनन आदि एवं यम-नियमादि साधनोंका आरम्भ होता है, इसीको उत्तम पुरुषार्थ कहते हैं। अधिकारी पुरुषका जन्म पुरुषार्थके सिद्ध होनेपर ही सफल होता है, अन्यथा नहीं—ऐसा जानकर सदा आत्मकल्याणके प्रयत्नमें ही संलग्न रहना चाहिये। तत्पश्चात् साधनविषयक उस तत्परताको सत्-शास्त्रोंके अभ्यास एवं संत-महात्माओं तथा ज्ञानी पुरुषोंके सेवनद्वारा आत्मज्ञानरूप फलकी प्राप्तिसे सफल बनाना चाहिये। आत्मकल्याणके विषयमें यदि परम पुरुषार्थका आश्रय लिया जाय तो वह अवश्य दैवको जीत लेता है, ऐसी धारणा रखकर दैव और पौरुषके बलाबलका विचार करनेके कारण जो परम सुन्दर प्रतीत होते हैं तथा जिनमें शम, दम आदि साधन भी विद्यमान हैं एवं श्रेष्ठ पुरुषोंकी सेवासे जिनका अन्त करण सदा भावित रहता है, ऐसे अधिकारी पुरुषोंको तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके लिये अवश्य उद्यम करना चाहिये। इस जन्ममें सम्पादन करनेयोग्य स्वाभाविक प्रयत्न ही परम पुरुषार्थकी सिद्धिका हेतु है, ऐसा निश्चितरूपसे जानकर यह अधिकारी जीव नित्य संतुष्ट एवं उत्तम ज्ञानीजनोंकी सेवारूप अमोघ, मधुर और उत्कृष्ट औषधसे जन्म मरणकी परम्परारूप भवरोगको शान्त करे। (सर्ग ६)
विविध युक्तियोंद्वारा दैवकी दुर्बलता और पुरुषार्थकी प्रधानताका समर्थन
जो लोग उद्योगका त्याग करके केवल दैवके भरोसे बैठे रहते हैं, वे आलसी मनुष्य स्वयं ही अपने शत्रु हैं। वे अपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका नाश कर डालते हैं।* बुद्धि, मन और कर्मेन्द्रियोंके द्वारा की जानेवाली चेष्टाएँ पौरुषके रूप हैं। इन्हींसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। साक्षी चेतनमें पहले जैसी विषयकी अनुभूति होती है, मन वैसी ही चेष्टा करता है। मनके व्यापारके अनुसार शरीर चलता है—शारीरिक क्रिया होती है और उसके अनुसार ही फलकी सिद्धि होती है। लोकमें जहाँ-जहाँ जैसे-जैसे पुरुषार्थकी आवश्यकता होती है, वहाँ-वहाँ वैसे-ही-वैसे पौरुषके उपयोगसे तदनुरूप लौकिक या वैदिक फलकी सिद्धि होती है। पुरुषार्थसे ही बृहस्पति देवताओंके गुरु बने हुए हैं और पुरुषार्थसे शुक्राचार्यने दैत्यराजोंके गुरुका पद प्राप्त किया
* ये समुद्योगमुत्सृज्य स्थिता दैवपरायणाः।
ते धर्ममर्थं कामं च नाशयन्त्यात्मविद्विषः॥
(मुमुक्षु० ७। ३)