भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 108

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * विविध युक्तियोंद्वारा दैवकी दुर्बलता और पुरुषार्थकी प्रधानताका समर्थन * ७५

है । जो नाना प्रकारके आश्चर्यजनक वैभवके आश्रय ( अधिपति ) थे और वैभवभोगकी दृष्टिसे महान् समझे जाते थे, ऐसे पुरुष भी अपने दोषयुक्त पौरुष (पापाचरण) से ही नरकोंके अतिथि हुए हैं—उच्च पदवीसे भ्रष्ट हो गये हैं । सहस्रों सम्पदाओं और हजारों विपत्तियोंसे पूर्ण नाना प्रकारकी अनुकूल-प्रतिकूल दशाओंमें पड़े हुए विभिन्न जातियोंके प्राणी अपने पुरुषार्थसे ही उन्हें लाँघकर कल्याणके मार्गपर अग्रसर होते हैं । शास्त्रोंके अभ्यास, गुरुके उपदेश और अपने प्रयत्न—इन तीनोंसे ही सर्वत्र पुरुषार्थकी सिद्धि देखी जाती है । कल्याणकामी पुरुष अशुभ कर्मोंमें लगे हुए मनको वहाँसे हटाकर प्रयत्नपूर्वक शुभ कर्मोंमें ही लगाये । यही सम्पूर्ण शास्त्रोंके सारांशका संग्रह है । वत्स ! जो वस्तु कल्याणकारी है, जो तुच्छ नहीं ( सबसे उत्कृष्ट ) है तथा जिसका कभी विनाश नहीं होता, उसीका यत्नपूर्वक आचरण करो । यही सब गुरुजन उपदेश देते हैं । पौरुषसे ही अभीष्ट वस्तुकी सिद्धि होती देखी जाती है । पौरुषसे ही बुद्धिमानोंकी कल्याणमार्गमें प्रगति होती है । दैव तो दुःख-सागरमें डूबे हुए कोमल एवं दुर्बल चित्तवाले लोगोंके लिये आश्वासनमात्र है ।

लोकमें प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंद्वारा पुरुषका प्रयत्न सदा सफल होता देखा जाता है । पुरुष अपने पौरुषसे ही देशान्तरमें आता-जाता है । उत्तम बुद्धिवाले मनुष्य पौरुषसे ही उन भीषण संकटोंसे अनायास पार हो जाते हैं, जिनसे पार पाना अत्यन्त कठिन होता है । यह जो व्यर्थ दैवकी कल्पना की गयी है, उसके भरोसे वे संकटोंसे पार नहीं होते । जो मनुष्य जैसा प्रयत्न करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है । इस जगत्में चुपचाप बैठे रहनेवाले किसी भी मनुष्यको अभीष्ट फलकी प्राप्ति नहीं होती । श्रीराम ! शुभ पुरुषार्थसे शुभ फल प्राप्त होता है और अशुभ पुरुषार्थसे अशुभ । अतः तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो । अपने परम अभीष्ट वस्तुको प्राप्त करानेवाले एकमात्र कार्यके प्रयत्नमें जो तत्पर हो जाना है, उसीको विद्वान् पुरुष पौरुष कहते हैं । उस तत्परतासे ही सब कुछ प्राप्त किया जाता है । अपने पैरोंद्वारा एक स्थानसे दूसरे स्थानमें जाना, हाथका किसी द्रव्यको धारण करना तथा दूसरे-दूसरे अङ्गोंका तदनुकूल व्यापारमें प्रवृत्त होना—यह सब पुरुषार्थसे ही सम्भव होता है, दैवसे नहीं । अनर्थकी प्राप्ति करानेवाले एकमात्र कार्यके प्रयत्नमें जो तत्पर होना है, उसे विद्वानोंने पागलोंकी-सी चेष्टा बतायी है । उससे कोई भी शुभ फल नहीं प्राप्त होता ( अशुभ फलकी ही प्राप्ति होती है )। कर्तव्य-पालनके लिये जो शरीर आदिका संचालन होता है, वही जिसका धर्म है, उस क्रियासे, सत्सङ्गसे और सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायसे शुद्ध एवं तेज की हुई अपनी बुद्धिके द्वारा जो स्वयं ही आत्माका उद्धार किया जाता है, वही परम स्वार्थकी सिद्धि है । विद्वान्लोग अनन्त, समतारूप परमानन्दसे पूर्ण अपने परम प्राप्य अर्थ (परब्रह्म परमात्मा) को जानते हैं । जिन साधनोंसे उसकी प्राप्ति होती है, उन्होंका नित्य-निरन्तर सेवन करना चाहिये । वे साधन हैं शास्त्रोंके स्वाध्याय और सत्सङ्ग आदि । जैसे शरत्कालमें सरोवर और कमल एक दूसरेकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार सद्बुद्धिसे सत्-शास्त्रोंका अभ्यास और सत्सङ्गरूपी गुण विकसित होता है तथा सत्-शास्त्रोंके स्वाध्याय और सत्सङ्गरूपी गुणसे सद्बुद्धिकी वृद्धि होती है । चिरकालके अभ्याससे ये दोनों एक दूसरेके वर्धक और पोषक होते हैं । बाल्यावस्थासे ही पूर्णतः अभ्यासमें लाये गये शास्त्र और सत्सङ्ग आदि गुणोंसे पौरुषद्वारा अपना हितकारी कार्य सिद्ध होता है । ( सर्ग ७ )


सं० यो० व० अं० ४-