संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] ❖ श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन ❖ ७७
है । रघुनन्दन ! इस प्रकार पौरुषसे मनुष्य इस जगत्में सभी कुछ प्राप्त कर सकता है, दैवसे नहीं । अतः वह पुरुषार्थ तुम्हारे लिये शुभफल देनेवाला हो । तुम अपने प्रयत्नसे प्राप्त परम पुरुषार्थद्वारा ही सदा बने रहनेवाले परम कल्याणको प्राप्त होओगे, अन्यथा नहीं । श्रुतिमें जो चैतन्यमात्रस्वरूप प्राज्ञ पुरुष बताया गया है, वही तुम हो, जड शरीर नहीं हो । तुम स्वयंप्रकाशरूप चेतन हो । अन्य चेतनसे प्रकाशित होनेकी योग्यता तुममें कहाँ है ? यदि तुम्हें दूसरा कोई चेतन प्रकाशित करता है, ऐसा मान लिया जाय तो फिर उसे दूसरा कौन प्रकाशित करता है, यह प्रश्न खड़ा हो जायगा । यदि उसका भी कोई अन्य चेतन प्रकाशक हो तो फिर इसको कौन प्रकाशित करेगा ? इस प्रकार अनवस्था-दोष प्राप्त होता है, जो वस्तुका साधक नहीं है । इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह शुभ और अशुभ मार्गोंसे बहती हुई वासनारूपिणी नदीको पुरुषोचित प्रयत्नके द्वारा अशुभ मार्गसे हटाकर शुभ मार्गमें ही लगाये ।
मनुष्यका चित्त शिशुके समान चञ्चल होता है, उसे अशुभ मार्ग ( पाप ) से हटा दिया जाय तो शुभ मार्ग ( पुण्य ) में जाता है और यदि शुभ मार्गसे हटाया जाय तो अशुभ मार्गमें चला जाता है । इसलिये उसे यत्नपूर्वक पापमार्गसे हटाकर पुण्यके मार्गमें लगाना चाहिये । इस प्रकार मनुष्यके लिये उचित है कि वह पूर्वोक्त क्रमसे चित्तरूपी बालकको शीघ्र ही समतारूप सान्त्वना देकर पुरुषोचित प्रयत्नके द्वारा धीरे-धीरे आत्मस्वरूपमें लगाये, हठपूर्वक एकाएक उसका निरोध न करे । यही उसका लालन-पालन है । लोकमें मनुष्य जिस-जिस विषयका अभ्यास करता है, निस्संदेह उसीमें तन्मय हो जाता है । यह बात बालकोंसे लेकर बड़े बड़े विद्वानोंतकमें देखी गयी है । अतः श्रीराम ! तुम परम कल्याणकी प्राप्तिके लिये उत्तम पुरुषार्थका आश्रय ले पाँचों इन्द्रियोंको जीतकर यहाँ शुभ वासनासे युक्त हो जाओ । तुम श्रेष्ठतम पुरुषोंद्वारा सेवित और अत्यन्त सुन्दर शुभ वासनाका अनुसरण करके मनोरम भावयुक्त बुद्धिसे परम पुरुषार्थद्वारा सदा शोकरहित पदको प्राप्त करो । तत्पश्चात् उस शुभ वासनाका भी परित्याग करके परब्रह्म परमात्मामें भलीभाँति स्थित हो जाओ ।
( सर्ग ८-९ )
श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन, ज्ञानप्राप्तिका विस्तार, श्रीरामजीके वैराग्यकी प्रशंसा, वक्ता और प्रश्नकर्ताके लक्षण आदिका विशेषरूपसे वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जो सर्वत्र नित्य समतारूपसे स्थित सच्चिदानन्दमय ब्रह्मतत्त्व है, उससे सम्बन्ध रखनेवाली सत्ताको नियति कहते हैं । वही नियन्ताकी नियन्त्रण-शक्ति है तथा नियन्त्रणमें रहनेवाले पदार्थोंमें जो नियन्त्रित होनेकी योग्यता है, वह भी सत्ता ही है । अब मैं उस सारगर्भित संहिताका वर्णन करूँगा, जो इहलोक तथा परलोककी सिद्धिके लिये परमपुरुषार्थ-रूप फल प्रदान करनेवाली और मोक्षके उपायभूत साधनोंसे सम्पन्न है । उसे तुम सावधानतया श्रवण करो ।
प्राचीन कालकी बात है—सृष्टिके आदिमें परमेष्ठी ब्रह्माने इस मोक्षकथाका वर्णन किया था । यह सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाली है और बुद्धिको परम शान्ति प्रदान करती है । सारे विवेकशील पुरुषोंके साथ इस मोक्षकथाको सुनकर तुम उस दुःखरहित सच्चिदानन्दमय परमपदको प्राप्त कर लोगे, जहाँ पहुँच जानेपर पुनः विनाशका भय नहीं रह जाता ।
श्रीरामने पूछा—ब्रह्मन् ! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने किस लिये इस कथाका वर्णन किया था ? और आपको इसकी प्राप्ति कैसे हुई ? प्रभो ! यह वृत्तान्त मुझे बताइये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! परब्रह्म परमात्मा