भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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७८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सर्वव्यापक, सबका आश्रय-स्थान, नित्य चेतन, अविनाशी, समस्त प्राणियोंमें प्रकाशकरूपसे वर्तमान और अनन्त विलासोंका एकमात्र अधिष्ठान है। प्रकृतिक़ी साम्यावस्था तथा विषमावस्थामें भी वह निर्विकाररूपसे स्थित रहता है। उसी परमात्मासे विष्णुका प्राकट्य हुआ, ठीक उसी तरह जैसे प्रवहणशील जलसे परिपूर्ण सागरसे तरङ्ग उत्पन्न होती है। उन विष्णुके हृदयकमलसे ब्रह्मा प्रकट हुए, जो वेद तथा वेदार्थके तत्त्वज्ञ हैं। उन्होंने देवताओं और मुनियोंके समुदायोंसे संयुक्त होकर अनेकविध विकल्पोंकी सृष्टि करनेवाले मनकी भाँति विभिन्न प्रकारकी सृष्टि-रचना की। जम्बूद्वीपके इस भागमें, जो भारतवर्ष नामसे प्रसिद्ध है, ब्रह्माजीद्वारा रचित सारा प्राणिसमुदाय आधि-व्याधिसे संयुक्त, लाभ-हानिसे पीड़ित और जन्म मरणशील था। प्राणियोंकी इस सृष्टिमें सारे जनसमुदायको नाना प्रकारके व्यसनजन्य कष्टोंसे पीड़ित देख सर्वलोकस्रष्टा भगवान् ब्रह्माका हृदय उसी प्रकार दयार्द्र हो गया, जैसे पुत्रको दुखी देखकर पिताको दया आ जाती है। फिर तो वे उनके कल्याणके लिये क्षणभर एकाग्रचित्त हो यों विचार करने लगे कि इन हताश तथा अल्पायु जीवोंके दुःखका अन्त किस प्रकार होगा ऐसा विचारकर सामर्थ्यशाली स्वयं भगवान् ब्रह्माने उनके कष्टपहरणके लिये तप, धर्म, दान, सत्य और तीर्थ-सेवन आदि साधनोंका निर्माण किया। इन्हें उत्पन्न करके सृष्टिकर्त्ता ब्रह्माने पुनः स्वयं विचार किया कि इन साधनोंसे लोगोंके सांसारिक दुःखका समूल विनाश नहीं हो सकता; बल्कि परम निर्वाणरूप मोक्ष ही परम सुख है, जिसकी प्राप्ति हो जानेपर जीव जन्म-मृत्युके चक्रसे छूट जाता है। उस मोक्षकी प्राप्ति ज्ञानसे ही होती है। इसलिये जीवके लिये संसार-सागरसे पार होनेका एकमात्र उपाय ज्ञान ही है। तप, दान और तीर्थसेवन आदि भव-तरणके लिये सीधे उपाय नहीं कहे गये हैं। अतः मैं इस हताश जनसमुदायके दुःखकी निवृत्तिके लिये संसारसे उद्धार पानेका एक नूतन उपाय शीघ्र ही प्रकट करूँगा।

यों विचारकर कमलपर विराजमान भगवान् ब्रह्माने अपने मानसिक संकल्पद्वारा तुम्हारे सामने बैठे हुए मुझको उत्पन्न किया। निष्पाप श्रीराम ! जैसे एक तरङ्गसे शीघ्र ही दूसरी तरङ्ग प्रकट हो जाती है, उसी प्रकार मैं भी अनिर्वचनीय मायासे उत्पन्न हुआ और फिर तुरंत ही अपने उन पितृदेवके समीप जा पहुँचा, जिनके हाथमें कमण्डलु और रुद्राक्षकी माला शोभा पा रही थी। मैंने नम्रतापूर्वक उनको प्रणाम किया। उस समय मैं भी कमण्डलु और रुद्राक्षकी मालासे संयुक्त था। तब 'बेटा! यहाँ आओ' मुझसे यों कहकर उन्होंने अपने आसनभूत कमलके ऊपरी पत्तेपर श्वेत बादलपर बैठे हुए चन्द्रमाकी भाँति मुझे अपने हाथसे पकड़कर बैठा लिया। फिर मृगचर्म ही जिसका परिधान था, ऐसे मुझसे मृगचर्मधारी मेरे पितृदेव ब्रह्माजीने कहा—'बेटा ! जैसे चन्द्रमामें कलङ्क प्रविष्ट होता है, उसी प्रकार वानरके समान