संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन * ७९
चञ्चल अज्ञान दो घड़ीके लिये तुम्हारे चित्तमें प्रवेश करे।'
यों पिताद्वारा अभिशप्त हुआ मैं उनके संकल्पके अनन्तर अपने सम्पूर्ण शुद्ध स्वरूपको भूल गया। फिर तो मेरी बुद्धि तत्त्वज्ञानसे रहित हो गयी और मैं दुःख-शोकसे संतप्त हो दीनताको प्राप्त हो गया। उस समय मैं 'हाय ! बड़े कष्टकी बात हुई। यह संसार नामक दोष मुझे कहाँसे प्राप्त हो गया ?' यों हृदयमें विचार करके चुपचाप बैठा रहता था। मेरी यह दशा देखकर मेरे पिताजीने मुझसे कहा—'बेटा ! तुम क्यों दुखी हो रहे हो ? अपने इस दुःखके नाशका उपाय मुझसे पूछो। उसे जानकर तुम नित्य परमात्माको प्राप्त हो जाओगे।' तब मैंने उनसे पूछा—'नाथ ! यह महान् दुःखमय संसार मुझ प्राणीको कहाँसे प्राप्त हो गया ? और इसका विनाश किस प्रकार होता है ?' मेरे यों प्रश्न करनेपर उन्होंने मुझे ऐसे प्रचुर ज्ञानका उपदेश दिया, जिस परम पावन ज्ञानको प्राप्तकर मैं पिताजीके अभिप्रायके अनुरूप अधिक ज्ञानसम्पन्न हो गया। इस प्रकार जब मुझे ज्ञातव्य तत्त्वकी जानकारी हो गयी और मैं अपनी प्रकृतिमें स्थित हो गया, तब जगत्-स्रष्टा तथा सबकी उत्पत्तिके कारणस्वरूप और उपदेष्टा ब्रह्माजीने मुझसे कहा—'पुत्र ! मैंने प्रथमतः तुम्हें शापद्वारा ज्ञान-हीन करके पुनः समस्त अधिकारी जनोंकी ज्ञान-सिद्धिके लिये इस सारभूत ज्ञानका पिपासु बनाया है। अब तुम्हारा शाप शान्त हो गया है और तुम्हें परमोत्कृष्ट ज्ञानकी प्राप्ति हो गयी है, जिससे तुम मेरे ही सदृश अद्वितीय आत्मस्वरूप हो गये हो। साधो ! अब तुम प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये भूलोकमें जम्बूद्वीपके मध्यभागमें स्थित भारतवर्षमें जाओ। परोपकारनिष्ठ पुत्र ! तुम तो बड़े बुद्धिमान् हो; अतः वहाँ जो लोग कर्मकाण्ड-परायण हों, उन्हें कर्मकाण्डके क्रमसे शिक्षा देना और जो लोग विवेकशील, विरक्तचित्त तथा महाबुद्धिमान् हों, उन्हें परमानन्ददायक ज्ञानका उपदेश करना।'
रघुकुलभूषण राम ! इस प्रकार मैं अपने पिता ब्रह्माजीद्वारा नियुक्त होकर इस लोकमें निवास कर रहा हूँ और जबतक यह सृष्टिपरम्परा रहेगी, तबतक यहाँ रहूँगा। जिस प्रकार भगवान् ब्रह्माने मुझे यहाँ आनेका आदेश दिया, उसी प्रकार उन्होंने सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार तथा नारद आदि अन्यान्य बहुत-से महर्षियोंको भी यह कहकर प्रेरित किया कि तुमलोग भारतवर्षमें जाकर पवित्र कर्मकाण्ड तथा ज्ञानकाण्डके उपदेशद्वारा वहाँके निवासियोंका, जो अन्तःकरणके अज्ञानरूपी रोगके वशीभूत होकर महान् कष्ट भोग रहे हैं, उद्धार करो।
प्राचीन कालमें सत्ययुगके समाप्त होनेपर जब भूतलपर कालक्रमसे पवित्र कर्मकाण्डका ह्रास हो गया, तब उन महर्षियोंने कर्मकाण्डकी स्थापना तथा मर्यादाकी रक्षाके लिये पृथक्-पृथक् देशोंका विभाजन किया और उन देशोंपर भूपालोंकी स्थापना की। तदनन्तर उन्होंने भूतलपर धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये उन-उन कर्मोंके