संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 113, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ें८० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
उपयुक्त बहुत-से स्मृति-ग्रन्थों तथा यज्ञविधायक शास्त्रोंका निर्माण किया। तत्पश्चात् इस कालचक्रके चलते रहनेपर जब उस क्रमका विनाश हो गया तथा लोग प्रतिदिन भोजनमात्रपरायण और खाद्य पदार्थोंके उपार्जनमें तत्पर हो गये, तब हमलोगों ने उनकी दीनताका विनाश करने तथा लोकमें आत्मतत्त्वज्ञानके प्रचारके लिये बड़े-बड़े ज्ञानोत्पादक शास्त्रोंका उपदेश किया। यह अध्यात्मविद्या प्रथमतः राजसमाजमें उपदिष्ट हुई। तदनन्तर इसका प्रसार लोकमें हुआ। इसी कारण इसे 'राजविद्या' कहा गया है। रघुनन्दन ! राजविद्या एवं राजगुह्य नामसे जिसकी प्रसिद्धि है, उस उत्तम अध्यात्मज्ञानको पाकर राजालोग दुःखरहित हो परमानन्दको प्राप्त हो गये। श्रीराम ! कालक्रमानुसार निर्मल कीर्तिवाले बहुसंख्यक राजाओंके स्वर्गवासी हो जानेपर इस समय तुम इस भूतलपर इन महाराज दशरथके यहाँ प्रकट हुए हो। शत्रुओंका मर्दन करनेवाले राम ! तुम्हारा मन अत्यन्त निर्मल है, इसीलिये किसी निमित्तके बिना स्वाभाविक ही तुम्हारे मनमें यह परम पावन तथा उत्तम वैराग्य जाग उठा है; क्योंकि समस्त विवेकशील पुरुषोंमें जिसकी ख्याति है, उस श्रेष्ठ पुरुषका भी वैराग्य किसी निमित्तको लेकर होता है, इसलिये वह राजस कहलाता है, परंतु तुम्हारे मनमें उत्पन्न हुआ यह वैराग्य अपूर्व है। यह किसी निमित्तकी अपेक्षा न रखकर स्वतः अपने विवेकसे उत्पन्न हुआ है और सत्पुरुषोंको आश्चर्यमें डालनेवाला है, अतः सात्त्विक है। जिन्हें निमित्तके बिना ही वैराग्य हो जाता है, वे ही महापुरुष तथा ज्ञानवान् हैं और उन्हींका अन्तःकरण शुद्ध है।* जो लोग ज्ञानद्वारा इस सृष्टिपरम्पराका विचार करके वैराग्यको प्राप्त होते हैं, वे ही उत्तम पुरुष हैं।
श्रीराम ! जो लोग इस संसारकी असारता एवं दुःखरूपताको देखकर अपनी सांसारिक बुद्धिका परित्याग कर देते हैं, वे साँकलसे छूटे हुए गजराजोंकी भाँति संसार-बन्धनसे मुक्त होकर परमपदको प्राप्त हो जाते हैं। यह जगत्-परम्परा विभ्रम और अनन्त है। इसमें पड़ा हुआ महान् जीव देहाध्याससे युक्त रहता है, अतएव ज्ञानके बिना उसे परमपदकी प्राप्तिका मार्ग नहीं सूझता। परंतु रघुनन्दन ! जिनकी बुद्धि अगाध है—ऐसे विवेकशील पुरुष इस दुस्तर भवसागरको ज्ञानरूपी नौकाद्वारा क्षणमात्रमें ही पार कर जाते हैं। संसार-सागरसे उबारनेवाले उस ज्ञानरूप उपायको तुम अपनी बुद्धिसे, जो नित्य विवेक-वैराग्य आदिसे समन्वित है, एकाग्रचित्त होकर श्रवण करो; क्योंकि इस निर्दोष ज्ञानयुक्तिके बिना अनन्त विक्षेपोंसे परिपूर्ण ये सांसारिक दुःख और भय चिरकालतक हृदयको संतप्त करते रहते हैं। राघव ! श्रेष्ठ पुरुषोंमें शीत, उष्ण, वात आदि द्वन्द्वजनित दुःखोंको सहन करनेकी क्षमता ज्ञानके बलपर ही आती है, अन्यथा ज्ञानयुक्तिके अतिरिक्त वे किसी प्रकार सह्य नहीं हो सकते। दुःखकी चिन्ताएँ अज्ञानी मनुष्यको पद-पदपर आ घेरती हैं और समयानुसार उसे उसी प्रकार संतप्त करती रहती हैं, जैसे अग्निकी लपटें तृणको जलाकर भस्म कर डालती हैं; परंतु जिस प्रकार वर्षाके जलसे अभिषिक्त हुए वनपर उन अग्नि-ज्वालाओंका प्रभाव नहीं पड़ता, उसी तरह जिसे जाननेयोग्य अध्यात्मशास्त्रका ज्ञान प्राप्त हो गया है तथा जिसने भलीभाँति ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार कर लिया है, ऐसे ज्ञानी पुरुषको मानसिक व्यथाएँ संताप नहीं पहुँचा सकतीं। इस संसाररूपी मरुस्थलमें बहनेवाली वायु शारीरिक तथा मानसिक कष्टरूपी आवर्तोंसे परिपूर्ण है। यह क्षुब्ध होकर भी तत्त्वज्ञानीको वैसे ही पीड़ित नहीं कर सकती, जैसे प्रचण्ड आँधी कल्पवृक्षका कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह तत्त्वज्ञानकी
* ते महान्तो महाप्राज्ञा निमित्तेन विनैव हि।
वैराग्यं जायते येषां तेषां ह्यमलमानसस्॥
(मुमुक्षु० ११। २४)