भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * विचार, संतोष और सत्समागमका विशेषरूपसे वर्णन * ८७

विचार, संतोष और सत्समागमका विशेषरूपसे वर्णन तथा चारों गुणोंमेंसे एक ही गुणके सेवनसे सद्गतिका कथन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! ( विषय, संदेह, पूर्वपक्ष, सिद्धान्त और प्रयोजनरूप ) कारणोंके ज्ञाता पुरुषको शास्त्रज्ञानसे निर्मल हुई अतएव परम पवित्र बुद्धिद्वारा निरन्तर आत्मचिन्तन करना चाहिये; क्योंकि आत्मविषयक विचार करनेसे बुद्धि तीव्र होकर परम पदका साक्षात्कार कर लेती है। संसाररूपी महारोगके लिये विचार ही महौषध है। जो अनन्त कामनारूपी पल्लवोंसे सुशोभित है, ऐसा आपत्तिरूपी वन विचाररूपी आरेसे काट दिये जानेपर पुनः अङ्कुरित नहीं होता। लौकिक दुःखसे पार होनेके लिये विद्वानोंके पास विचारके अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है। सत्पुरुषोंकी बुद्धि विचारसे अशुभका परित्याग करके शुभको प्राप्त होती है। बुद्धिमानोंके बल, बुद्धि, सामर्थ्य, कर्तव्यका ज्ञान, क्रिया और उसका फल—ये सभी विचारसे ही सफल होते हैं। अतः जो उचित-अनुचितके रहस्योद्घाटनके लिये महान् दीपकके समान है तथा अभीष्टकी सिद्धि करनेवाला है, उस उत्कृष्ट विचारका आश्रय लेकर संसार-सागरको पार करना चाहिये। क्योंकि विशुद्ध विचाररूपी सिंह हृदयस्थित विवेकरूपी कमलोंको उखाड़ फेंकनेवाले महामोहरूपी गजराजोंको विदीर्ण कर डालता है। जो लोग विचारका अभ्युदय करनेवाली बुद्धिद्वारा सबके साथ व्यवहार करते हैं, वे निश्चय ही अत्यन्त श्रेष्ठ फलोंके भागी होते हैं। सद्विचारपरायण मनुष्य अत्यन्त विस्तृत महान् आपत्तियोंसे युक्त मोहकी परिस्थितियोंमें उसी प्रकार निमग्न नहीं होता, जैसे सूर्य अन्धकारमें नहीं डूबते। जितने क्रूर कर्म, निषिद्धाचरण और कुत्सित मानसिक कष्ट हैं, वे सभी विचारहीनतासे ही आविर्भूत होते हैं। जिस अधिकारी पुरुषका मन आशाकी परवशतासे रहित और विचारयुक्त है, वह पूर्ण चन्द्रमाकी भाँति अपने आत्मामें परमानन्दका अनुभव करता है। जब मनमें विवेकशीलताका उदय होता है, तब वह सारे विश्वको शीतल एवं सुशोभित करनेवाली चन्द्रमाकी चाँदनीकी भाँति सबको अत्यन्त शीतल और अलंकृत कर देती है। जगत्‌के सारे पदार्थ तभीतक सत्यकी तरह रमणीय प्रतीत होते हैं, जबतक विचार नहीं किया जाता। वस्तुतः उनका कोई अस्तित्व नहीं है, अतः विचार करनेपर वे नष्ट हो जाते हैं। जो समस्वरूप, आनन्दमय, अक्षय, अनन्त और अनन्याधीन है, उस कैवल्य पदको तुम विचाररूप महान् वृक्षका फल समझो। जो चित्तमें स्थित होकर उत्तम अचल स्थिति प्रदान करनेवाली है, उस आत्म-विचाररूपी महौषधिसे युक्त श्रेष्ठ पुरुष न तो अप्राप्तकी आकाङ्क्षा करता है और न प्राप्तका परित्याग ही। विचारशील पुरुष गयी हुई वस्तुकी उपेक्षा कर देता है और प्राप्त वस्तुका शास्त्रानुसार उपयोग करता है। वह मनकी प्रतिकूलतामें न तो क्षुब्ध होता है और न अनुकूलतामें प्रसन्न ही। उस समय जलसे परिपूर्ण सागरकी तरह उसकी शोभा होती है। इस प्रकार जिन उदाराशय महात्मा योगियोंका मन पूर्णकाम हो गया है, वे जीवन्मुक्त होकर इस जगत्‌में विचरण करते हैं। बुद्धिमान् पुरुषको आपत्तिकालमें भी 'मैं कौन हूँ ! यह संसार किसका है ?' यों उसके प्रतीकारके लिये प्रयत्नपूर्वक विचार करना चाहिये। जैसे रात्रिमें भूतलपर पदार्थोंका ज्ञान दीपकसे होता है, उसी प्रकार परमात्मस्वरूपमें स्थिति प्राप्त करनेके लिये वेद-वेदान्तके सिद्धान्तोंकी स्थितियोंका निर्णय विचारद्वारा होता है। विचाररूपी सुन्दर नेत्र अन्धकारमें नष्ट नहीं होता, उग्र तेजस्वी सूर्य आदिकी ओर देखनेपर भी उसकी ज्योति प्रतिहत नहीं होती और वह व्यवधानयुक्त पदार्थोंको