भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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८८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

भी देख लेता है। यह विचार-चमत्कृति परमात्ममयी, आदरणीया और परमानन्दकी एकमात्र साधिका है; अतः एक क्षणके लिये भी इसका परित्याग नहीं करना चाहिये। जैसे पक जानेके कारण मधुर रससे परिपूर्ण आमका फल सबके लिये रुचिकर होता है, उसी तरह उत्तम विचारसे युक्त पुरुष, सामान्य जनोंकी तो बात ही क्या, महापुरुषोंके लिये भी आदरणीय हो जाता है। विचारद्वारा जिनकी बुद्धि विशुद्ध हो गयी है और विचारसे ही जिन्हें ज्ञानमार्गमें जानेकी युक्ति ज्ञात है, वे मनुष्य नाना प्रकारके दुःखरूप गड्ढोंमें बार-बार नहीं गिरते अर्थात् आवागमनसे मुक्त हो जाते हैं। सैकड़ों अनर्थोंके संयोगसे जिसका शरीर जर्जर हो गया है तथा जो रोगग्रस्त है, वह वैसा रुदन नहीं करता, जैसा वह मूर्ख विलाप करता है, जिसने विचारहीनतासे अपने आत्माका हनन कर दिया है। विचारहीनता सारे अनर्थोंका निजी निवासस्थान है। सभी सत्पुरुष उसका तिरस्कार करते हैं और वह सारी दुर्गतियोंकी चरम सीमा है, अतः उसका परित्याग कर देना चाहिये। विचारपूर्वक स्वयं ही अपनी बुद्धिद्वारा अपने मनको वशमें करके मोहमय संसारसागरसे अपने मनरूपी मृगका उद्धार करना चाहिये। मैं कौन हूँ और यह संसारनामक दोष मेरे निकट कैसे आ गया—इस विषयमें न्यायपूर्वक किया गया अनुसंधान 'विचार' कहलाता है। रघुनन्दन ! इस जगत्में सत्यके ग्रहण और असत्यके त्यागकी बुद्धिसे सम्पन्न पुरुषोंको विचारके बिना उत्तम तत्त्वका कुछ भी ज्ञान नहीं होता। विचारसे ही तत्त्वका ज्ञान होता है, तत्त्वज्ञानसे मनकी निश्चलता प्राप्त होती है और मनके शान्त हो जानेसे सम्पूर्ण दुःखोंका सर्वथा विनाश हो जाता है। भूतलपर सभी लोग स्पष्ट विचारदृष्टिसे ही समस्त कर्मोंकी सफलता लाभ करते हैं तथा उत्तम परमात्मसाक्षात्कारतां भी विचारसे ही उपलब्ध होती है, इसलिये श्रीराम ! शमादि साधनसम्पन्न तुम्हें उपर्युक्त विचारशीलता रुचिकर होनी चाहिये।

परंतप राम ! संतोष ही परम श्रेय है और संतोष परम सुख भी कहा जाता है। संतोषयुक्त पुरुष परम विश्रामको प्राप्त होता है। जो संतोषरूपी ऐश्वर्यके सुखसे सम्पन्न हैं तथा जिनका चित्त निरन्तर विश्रामपूर्ण रहता है, ऐसे शान्त पुरुषोंको विशाल साम्राज्य भी पुराने घासके टुकड़ेके समान प्रतीत होता है। श्रीराम ! संतोषयुक्त बुद्धि संसारकी विषम परिस्थितियोंमें भी न तो उद्विग्न होती है और न कभी उसका विनाश ही होता है। जो शान्त पुरुष संतोषामृतके पानसे पूर्णतः तृप्त हो चुके हैं, उनके लिये यह अपरिमित भोगसम्पत्ति विष-सी जान पड़ती है। रागादि दोषोंका विनाशक तथा अत्यन्त मधुर आस्वादसे युक्त संतोष जैसा सुखद होता है, वैसा सुख ये अमृतरसकी लहरियाँ नहीं दे सकतीं। जो अप्राप्त वस्तुकी आकाङ्क्षाका परित्याग करके प्राप्त हुई वस्तुमें समभाव रखनेवाला है तथा जिसमें हर्ष-शोकके विकार परिलक्षित नहीं होते, वह मनुष्य इस लोकमें संतुष्ट कहा जाता है। जबतक मन आत्माके द्वारा आत्मामें संतुष्ट नहीं हो जाता, तबतक उस मनरूपी गड्ढेसे उसी प्रकार आपत्तियाँ उद्भूत होती रहती हैं, जैसे गड्ढेसे लताएँ। संतोषसे शीतल हुआ मन विशुद्ध विज्ञानकी दृष्टियोंसे अत्यन्त विकासको प्राप्त होता है—ठीक उसी तरह, जैसे सूर्यकी किरणोंके सम्पर्कसे कमल विकसित हो जाता है। जैसे मलिन दर्पणमें मुखकी छाया नहीं दीखती, उसी प्रकार आशाकी परवशतासे व्याकुल एवं संतोषरहित चित्तमें ज्ञानका प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता। जिसका मन शारीरिक तथा मानसिक क्लेशोंसे मुक्त एवं संतुष्ट है, वह प्राणी दरिद्र होते हुए भी सच्चे साम्राज्यसुखका उपभोग करता है। अपने आत्मामें आत्मासे ही स्वयं सम्यक् प्रकारसे निरतिशय पूर्णानन्दका आश्रय लेकर पुरुषार्थद्वारा प्रयत्नपूर्वक सभी विषयोंमें तृष्णा-