भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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९० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सम्पत्तियाँ सुलभ होती हैं। पूर्ण चन्द्रमामें परिलक्षित हुए सौन्दर्य आदि गुणोंकी तरह विचार, शम, सत्समागम और संतोषयुक्त मानवमें प्रसाद आदि गुण प्रादुर्भूत हो जाते हैं। जैसे श्रेष्ठ मन्त्रिगणोंसे युक्त राजाके पास विजयलक्ष्मी उपस्थित होती है, उसी तरह जिस पुरुषकी बुद्धि सत्सङ्ग, संतोष, शम और विचारसे युक्त होनेके कारण उत्तम हो गयी है, उसे दिव्य ज्ञान-सम्पत्ति सुलभ हो जाती है। इसलिये रघुनन्दन ! मनुष्यको चाहिये कि वह पुरुषार्थसे मनको वशमें करके इनमेंसे एक गुणका नित्य यत्नपूर्वक उपार्जन करे; क्योंकि जबतक मनुष्य परम पुरुषार्थके आश्रयसे अपने चित्तरूपी गजराजको जीतकर हृदयमें एक गुण भी धारण नहीं कर लेता, तबतक उत्तम गतिकी प्राप्ति नहीं हो सकती। जिसके चित्तमें उत्तम फलदायक एक ही गुण सुदृढ हो गया है, उसके सारे दोष शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि एक ही गुणकी विशेष वृद्धि होनेपर दोषोंपर विजय प्रदान करनेवाले अनेक गुणोंकी वृद्धि होती है और एक दोषके अधिक बढ़ जानेपर बहुत-से गुण-विनाशक दोष बढ़ जाते हैं। (सर्ग १४—१६)


प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन, ग्रन्थकी प्रशंसा, शान्ति, ब्रह्म, द्रष्टा और दृश्यका विवेचन, परस्पर सहायक प्रज्ञा और सदाचारका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिसका हृदय पूर्वोक्त प्रकारके विवेकसे युक्त है, वही इस जगत्में महान् है और वही ज्ञानोपदेश सुननेका योग्य अधिकारी है—ठीक उसी तरह, जैसे राजा नीति-शास्त्रके श्रवणका उत्तम पात्र होता है। जैसे मेघजालसे रहित शरत्काल-का आकाश चन्द्रमाके लिये योग्य होता है, उसी तरह जो मूर्खोंके सङ्गसे रहित एवं महान् आशयवाला है, वह निर्मल पुरुष विशुद्ध विचारका योग्य भाजन है। श्रीराम ! तुम इस समग्र गुणलक्ष्मीसे सम्पन्न हो; अतः मैं आगे जिसका वर्णन करूँगा, उस मनके मोहको हरनेवाले वाक्यको सुनो। जिसका पुण्यरूपी कल्पवृक्ष फलोंके भारसे अत्यन्त झुका हुआ खड़ा है, वही पुरुष मुक्ति-प्राप्तिके निमित्त इसे श्रवण करनेके लिये उद्योग करता है। अतः उपर्युक्त गुणसम्पन्न पुरुष ही कल्याण-प्राप्तिके लिये पवित्र, उदार तथा परायेको ज्ञान प्रदान करनेवाले वचनोंके सुननेका अधिकारी होता है।

यह संहिता मोक्ष-साधनकी प्रतिपादिका, सारभूत अर्थोंसे परिपूर्ण और मोक्षदायिनी है। इसमें बत्तीस हजार* श्लोक बतलाये जाते हैं। जैसे गाढ निद्राके वशीभूत हुए पुरुषके सामने दीपक जला दिये जानेपर यद्यपि उसे प्रकाशकी कामना नहीं रहती तो भी प्रकाश होता है, उसी प्रकार इस संहिताके परिशीलनसे इच्छा न रहने-पर भी निर्वाणकी प्राप्ति हो जाती है। यह संहिता स्वयं सम्यक् प्रकारसे परिशीलन करके जानी गयी हो अथवा अन्यद्वारा वर्णन किये जाते समय सुनी गयी हो, तो भी पाप-तापकी शान्तिद्वारा सुखकी हेतुभूता


* इस ग्रन्थके छहों प्रकरणोंमें क्रमशः वैराग्यप्रकरणमें ११४५, मुमुक्षुव्यवहारप्रकरणमें ८०७, उत्पत्तिप्रकरणमें ५४०४, स्थितिप्रकरणमें २४०४, उपशमप्रकरणमें ४२७७ और निर्वाणप्रकरणमें १४२७५ श्लोक-संख्या है—इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थमें श्लोकोंकी संख्या २८३१२ मिलती है। किंतु यहाँ इस सर्गमें, वैराग्यप्रकरणमें १५००, मुमुक्षुव्यवहारप्रकरणमें १०००, उत्पत्तिप्रकरणमें ७०००, स्थितिप्रकरणमें ३०००, उपशमप्रकरणमें ५००० और निर्वाणप्रकरणमें १४५००—इस प्रकार कुल ३२००० श्लोक बताये गये हैं। ग्रन्थमें आये हुए बड़े श्लोकोंके और गद्यभागके अक्षरोंकी सख्याको ३२ अक्षरके एक अनुष्टुप् श्लोकके हिसाबसे गिननेपर यह संख्या प्रायः ठीक हो सकती है।