भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 124

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन एवं ग्रन्थकी प्रशंसा * ९१


देवनदी गङ्गाके समान यह अज्ञानके उपशमद्वारा तुरंत सुख प्रदान करती है । जैसे रस्सीका पूर्ण ज्ञान हो जानेसे उसमें उत्पन्न हुई सर्पभ्रान्ति विनष्ट हो जाती है, उसी तरह इस संहिताके सम्यक् परिशीलनसे संसार- दुःख शान्त हो जाता है । इस संहितामें पृथक्-पृथक् रचे गये छ प्रकरण हैं, जो युक्तियुक्त अर्थवाले वाक्यों- से युक्त और सार-सार दृष्टान्तोंसे भरी हुई सूक्तियोंसे समन्वित हैं । उनमें पहला प्रकरण 'वैराग्य' नामसे कहा गया है, जिसके अध्ययनसे उसी प्रकार विरागकी वृद्धि होती है, जैसे मरुस्थलमें भी जलके सिंचनसे वृक्ष बढ़ता है । जैसे मणिके भलीभाँति मार्जित किये जानेके कारण उत्पन्न हुए प्रकाशसे उसमें निर्मलता प्रकट हो जाती है, उसी तरह डेढ़ हजार श्लोकोंसे युक्त इस वैराग्य- प्रकरणका विचार करनेसे विषयोंके दोषोंका परिज्ञान होनेके कारण उत्पन्न हुए विवेकके प्रकाशसे हृदयमें शुद्धताका उदय हो जाता है । तदनन्तर 'मुमुक्षुव्यवहार' नामक प्रकरणकी रचना की गयी है । इस प्रकरणमें केवल एक हजार श्लोक हैं । युक्तियोंसे भरा होनेके कारण यह अत्यन्त सुन्दर है और इसमें मुमुक्षु पुरुषोंके स्वभावका वर्णन किया गया है । इसके बाद तीसरा 'उत्पत्तिप्रकरण' आता है, जो दृष्टान्त और आख्यायिकाओं- से परिपूर्ण तथा विज्ञानका प्रतिपादक है । उसमें सात हजार श्लोक हैं । इस प्रकरणमें 'अहं' और 'त्वं' जिसका स्वरूप है एवं जो वास्तवमें उत्पन्न न होकर भी प्रकट हुई-सी प्रतीत होती है, द्रष्टा और दृश्यके भेदसे समन्वित उस सांसारिक सम्पत्तिका वर्णन किया गया है । इस प्रकरणके सुननेपर श्रोता इस सम्पूर्ण जगत्को अपने हृदयमें ऐसा समझता है कि यह 'त्वं' और 'अहं'के विस्तारसे युक्त, लोक, पर्वत और आकाशसे समन्वित, संकल्परूपमय नगरके तुल्य क्षणध्वंसी, स्वप्नमें प्राप्त हुए पदार्थोंके समान सत्तारहित, मनोराज्यकी तरह विस्तारवाला, अर्थशून्य होनेके कारण गन्धर्वनगरके सदृश, दो चन्द्रमाओंकी भ्रान्तिके समान मृगतृष्णामें जलभ्रान्तिकी तरह, नौकाके चलनेसे पर्वतादिके संचलन भ्रमकी भाँति चञ्चल और यथार्थ लाभसे रहित है तथा जैसे सुवर्णमें कङ्कण, जलमें तरङ्ग और आकाशमें नीलिमा असत् है, वस्तुतः ये क्रमशः अपने-अपने अधिष्ठानके ही अङ्ग हैं, उसी तरह यह जगत् असत् होकर भी सत्-रूपसे उत्पन्न हुआ है । परमार्थ दृष्टिसे तो यह उस विज्ञानरूपी शरत्कालके आकाशके समान है, जिसका अज्ञानरूपी कुहरा पूर्णरूपसे शान्त हो गया है ।

तत्पश्चात् चौथे 'स्थितिप्रकरण'की अवतारणा की गयी है । इस प्रकरणमें तीन हजार श्लोक हैं और यह व्याख्यान और आख्यायिकाओंसे भरा हुआ है । ब्रह्म ही द्रष्टा और दृश्य भावको स्वीकार करके इस प्रकार जगत्-रूप एवं अहंरूपसे स्थितिको प्राप्त हुआ है— ऐसा इस प्रकरणमें कहा गया है । इसी तरह यह जगद्धम जो दसों दिशाओंके मण्डलकी विशालतासे देदीप्यमान है और चिरकालसे वृद्धिको प्राप्त होता आया है, यह विषय भी उस प्रकरणमें समझाया गया है ।

तदुपरान्त पाँचवाँ 'उपशान्ति' प्रकरण कहा गया है । इसमें पाँच हजार श्लोक हैं । यह परम पावन तथा विविध युक्तियोंसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त सुन्दर है । इस प्रकरणमें 'यह जगत् है, यह मैं हूँ, यह तुम हो और यह वह है—यों उत्पन्न हुई भ्रान्ति किस प्रकार पूर्णरूपसे शान्त होती है' यह विषय बहुत-से श्लोकों- द्वारा बतलाया गया है । उपशमप्रकरणका श्रवण करनेसे यह संसार प्रायः शान्त हो जाता है; क्योंकि जिसका भ्रान्त स्वरूप सम्यक् प्रकारसे शान्त हो गया है—ऐसी संसृतिका शतांशमात्र अवशिष्ट रह जाता है ।

तदनन्तर 'निर्वाण' नामक छठे प्रकरणका वर्णन किया गया है । उसमें शेष साढ़े चौदह हजार श्लोक हैं । यह प्रकरण ज्ञानरूपी महान् पुरुषार्थका देनेवाला है । उसे जान लेनेपर सारी कल्पनाएँ शान्त हो जाती