भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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९२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


हैं और परमात्माकी प्रतिरूप परम कल्याण हस्तगत हो जाता है। अधिक क्या, उक्त प्रकरणके ज्ञाता पुरुषके सम्पूर्ण सांसारिक भ्रम मिट जाते हैं। वह निर्विषय चैतन्य प्रकाशरूप, विज्ञानस्वरूप, आधि-व्याधियोंसे रहित और आकाशमण्डलके समान निर्विकार हो जाता है। उसकी सभी जगद्-यात्राएँ शान्त हो जाती हैं और वह कृतकृत्य होनेके कारण स्वस्थ हो जाता है। वह प्रकृति एवं प्रकृतिके कार्यभूत सम्पूर्ण विषयोंमें कर्ताके अभिमान और ग्रहण-त्यागकी दृष्टिसे रहित हो जाता है, इसलिये वह देहधारी होते हुए विदेह-सा एव संसारी होनेपर भी असंसारी-सा प्रतीत होता है। उसका अहङ्काररूप पिशाच नष्ट हो जाता है और वह देहयुक्त होते हुए भी शरीर-रहित-सा रहता है। चैतन्यघन परमात्मा अपने अंदर कल्पित आकाशमें प्रत्येक परमाणुमें सहस्रों लोकोंकी रचना करके उन्हें धारण करता है और स्वयं उन्हें देखता है।

श्रीराम ! जैसे उपजाऊ खेतमें उचित समयपर बोये गये उत्तम बीजसे अवश्य ही श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है, उसी तरह इस संहिताको हृदयगम कर लेनेसे परमार्थ-विषयक ज्ञान सुलभ हो जाता है। जैसे प्रातःकाल होनेपर प्रकाशका होना अवश्यम्भावी है, वैसे ही इस संहिताको चित्तमें धारण कर लेने मात्रसे निश्चय ही उत्तम विवेककी उपलब्धि होगी। विद्वानोंके मुखसे इसका श्रवण करके अथवा स्वयं ही इसे समझकर धीरे-धीरे विचार करनेसे जब बुद्धि सुदृढ़रूपसे संस्कृत हो जाती है, तब पहले हृदयमें सभास्थानको विभूषित करनेवाली ऊँची लताके समान संस्कारयुक्त विशुद्ध वाणीका उदय होता है। फिर महान् गुणोंसे सुशोभित वह श्रेष्ठ चतुरता प्रकट होती है, जिससे राजा तथा देवगण भी प्रसन्न होते हैं। जैसे सुन्दर नेत्रोंसे युक्त पुरुष रात्रिके समय दीपक हाथमें लेकर सभी पदार्थोंको देख लेता है, उसी तरह बुद्धिमान् मनुष्य सर्वत्र पूर्वा-परका ज्ञाता हो जाता है। इस ग्रन्थके अभ्याससे जिसका अज्ञानान्धकाररूप आवरण फट गया है अतएव जो पदार्थोंके प्रविभाजनमें समर्थ हो गयी है; ऐसी प्रज्ञा कालिमारहित रत्नदीपककी लौके समान उत्कृष्ट प्रकाशवाली हो जाती है। प्रस्तुत ग्रन्थका ज्ञाता पुरुष चाहे भयहेतुओंके सम्मुख ही क्यों न खड़ा हो, फिर भी जैसे बाण बड़ी-बड़ी चट्टानोंको विदीर्ण नहीं कर सकते, उसी तरह भयंकर सांसारिक भय उसके हृदयको पीड़ा नहीं पहुँचा सकते। इस ग्रन्थके अध्ययनसे जन्ममें प्रारब्धकी और कर्ममें पुरुषार्थकी कारणता कैसे होगी !—इस प्रकारके संशय-समुदाय दिनमें अन्धकार-की भाँति विलीन हो जाते हैं। इस ग्रन्थका विचार करनेवाले पुरुषके हृदयमें समुद्रकी-सी गम्भीरताका, सुमेरुगिरिकी-सी धीरताका और चन्द्रमाकी-सी शीतलता-का उदय हो जाता है। जब हृदयाकाशमें शमके आलोकसे विभूषित विवेकरूपी निर्मल सूर्यका उदय हो जाता है, तब निश्चय ही अनर्थसूचक कामादि धूमकेतु अपना उदय नहीं ले पाते। धैर्यकी पराकाष्ठाको प्राप्त हुई जो बुद्धि धर्मरूपी दीवालमें गाढ़रूपसे संलग्न हो गयी है, उसे मानसिक चिन्ताएँ विचलित नहीं कर सकतीं, जैसे वायु चित्रलिखित लताको नहीं कँपा सकती। तत्त्वज्ञ पुरुष विषयासक्तिरूप गड्ढेमें नहीं गिरता; क्योंकि जिसे उत्तम मार्गका ज्ञान है, वह भला गड्ढेकी ओर क्यों दौड़ेगा। सत्-शास्त्रोंके परिशीलनसे जिनका चरित्र उत्तम हो गया है, उनकी बुद्धि यथायोग्य प्राप्त शास्त्रानुकूल कर्ममें ही रमण करती है—ठीक उसी तरह, जैसे पतिव्रता स्त्री अपने अन्त:पुरके आँगनमें ही प्रसन्न रहती है। जिस पुरुषका अन्तःकरण मोक्ष-साधनके अनुभवसे शुद्ध हो गया है, उसे भोगसमुदाय न तो कभी पीडित ही करते हैं और न आनन्द ही देते हैं। वह अनिष्ट कार्योंके प्राप्त होनेपर न तो द्वेष करता है और न इष्ट कार्योंके नष्ट हो जानेपर उनकी आकाङ्क्षा