संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
९२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
हैं और परमात्माकी प्रतिरूप परम कल्याण हस्तगत हो जाता है। अधिक क्या, उक्त प्रकरणके ज्ञाता पुरुषके सम्पूर्ण सांसारिक भ्रम मिट जाते हैं। वह निर्विषय चैतन्य प्रकाशरूप, विज्ञानस्वरूप, आधि-व्याधियोंसे रहित और आकाशमण्डलके समान निर्विकार हो जाता है। उसकी सभी जगद्-यात्राएँ शान्त हो जाती हैं और वह कृतकृत्य होनेके कारण स्वस्थ हो जाता है। वह प्रकृति एवं प्रकृतिके कार्यभूत सम्पूर्ण विषयोंमें कर्ताके अभिमान और ग्रहण-त्यागकी दृष्टिसे रहित हो जाता है, इसलिये वह देहधारी होते हुए विदेह-सा एव संसारी होनेपर भी असंसारी-सा प्रतीत होता है। उसका अहङ्काररूप पिशाच नष्ट हो जाता है और वह देहयुक्त होते हुए भी शरीर-रहित-सा रहता है। चैतन्यघन परमात्मा अपने अंदर कल्पित आकाशमें प्रत्येक परमाणुमें सहस्रों लोकोंकी रचना करके उन्हें धारण करता है और स्वयं उन्हें देखता है।
श्रीराम ! जैसे उपजाऊ खेतमें उचित समयपर बोये गये उत्तम बीजसे अवश्य ही श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है, उसी तरह इस संहिताको हृदयगम कर लेनेसे परमार्थ-विषयक ज्ञान सुलभ हो जाता है। जैसे प्रातःकाल होनेपर प्रकाशका होना अवश्यम्भावी है, वैसे ही इस संहिताको चित्तमें धारण कर लेने मात्रसे निश्चय ही उत्तम विवेककी उपलब्धि होगी। विद्वानोंके मुखसे इसका श्रवण करके अथवा स्वयं ही इसे समझकर धीरे-धीरे विचार करनेसे जब बुद्धि सुदृढ़रूपसे संस्कृत हो जाती है, तब पहले हृदयमें सभास्थानको विभूषित करनेवाली ऊँची लताके समान संस्कारयुक्त विशुद्ध वाणीका उदय होता है। फिर महान् गुणोंसे सुशोभित वह श्रेष्ठ चतुरता प्रकट होती है, जिससे राजा तथा देवगण भी प्रसन्न होते हैं। जैसे सुन्दर नेत्रोंसे युक्त पुरुष रात्रिके समय दीपक हाथमें लेकर सभी पदार्थोंको देख लेता है, उसी तरह बुद्धिमान् मनुष्य सर्वत्र पूर्वा-परका ज्ञाता हो जाता है। इस ग्रन्थके अभ्याससे जिसका अज्ञानान्धकाररूप आवरण फट गया है अतएव जो पदार्थोंके प्रविभाजनमें समर्थ हो गयी है; ऐसी प्रज्ञा कालिमारहित रत्नदीपककी लौके समान उत्कृष्ट प्रकाशवाली हो जाती है। प्रस्तुत ग्रन्थका ज्ञाता पुरुष चाहे भयहेतुओंके सम्मुख ही क्यों न खड़ा हो, फिर भी जैसे बाण बड़ी-बड़ी चट्टानोंको विदीर्ण नहीं कर सकते, उसी तरह भयंकर सांसारिक भय उसके हृदयको पीड़ा नहीं पहुँचा सकते। इस ग्रन्थके अध्ययनसे जन्ममें प्रारब्धकी और कर्ममें पुरुषार्थकी कारणता कैसे होगी !—इस प्रकारके संशय-समुदाय दिनमें अन्धकार-की भाँति विलीन हो जाते हैं। इस ग्रन्थका विचार करनेवाले पुरुषके हृदयमें समुद्रकी-सी गम्भीरताका, सुमेरुगिरिकी-सी धीरताका और चन्द्रमाकी-सी शीतलता-का उदय हो जाता है। जब हृदयाकाशमें शमके आलोकसे विभूषित विवेकरूपी निर्मल सूर्यका उदय हो जाता है, तब निश्चय ही अनर्थसूचक कामादि धूमकेतु अपना उदय नहीं ले पाते। धैर्यकी पराकाष्ठाको प्राप्त हुई जो बुद्धि धर्मरूपी दीवालमें गाढ़रूपसे संलग्न हो गयी है, उसे मानसिक चिन्ताएँ विचलित नहीं कर सकतीं, जैसे वायु चित्रलिखित लताको नहीं कँपा सकती। तत्त्वज्ञ पुरुष विषयासक्तिरूप गड्ढेमें नहीं गिरता; क्योंकि जिसे उत्तम मार्गका ज्ञान है, वह भला गड्ढेकी ओर क्यों दौड़ेगा। सत्-शास्त्रोंके परिशीलनसे जिनका चरित्र उत्तम हो गया है, उनकी बुद्धि यथायोग्य प्राप्त शास्त्रानुकूल कर्ममें ही रमण करती है—ठीक उसी तरह, जैसे पतिव्रता स्त्री अपने अन्त:पुरके आँगनमें ही प्रसन्न रहती है। जिस पुरुषका अन्तःकरण मोक्ष-साधनके अनुभवसे शुद्ध हो गया है, उसे भोगसमुदाय न तो कभी पीडित ही करते हैं और न आनन्द ही देते हैं। वह अनिष्ट कार्योंके प्राप्त होनेपर न तो द्वेष करता है और न इष्ट कार्योंके नष्ट हो जानेपर उनकी आकाङ्क्षा
मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन एवं ग्रन्थकी प्रशंसा * ९३
ही करता है; बल्कि यह कार्य-फलादिके स्वरूपका ज्ञाता होकर भी जड वृक्षकी भाँति अनभिज्ञका-सा आचरण करता है। वह साधारण जनकी तरह समयानुकूल प्राप्त हुए पदार्थोंसे ही निर्वाह करता हुआ देखा जाता है—यहाँतक कि अथवा अनिष्ट फलके प्राप्त होनेपर भी उसके हृदयमें स्वल्पमात्र भी विकार नहीं होता। राघव ! इस सम्पूर्ण शास्त्रको बँचवाकर और समझकर फिर इसपर विचार करो। यह कथनमात्र नहीं है, बल्कि देवोंके वरदान और शापकी भाँति इसका फल अवश्य प्राप्त होता है। यह सुन्दर शास्त्र उत्तम ज्ञानसे युक्त अलंकारोंसे विभूषित, काव्यस्वरूप और सरस है। इसमें दृष्टान्तोंद्वारा विषयका प्रतिपादन किया गया है। जिसे थोड़ा भी पद पदार्थका ज्ञान है, वह स्वयं ही उसे समझ लेता है; किंतु जो स्वयं इसे जाननेमें असमर्थ है, उसे पण्डितके मुखसे सुनना चाहिये। जैसे संकल्पद्वारा निर्मित नगरमें पुरुषको हर्ष-विषाद बाधा नहीं पहुँचाते उसी तरह संसार-भ्रमका परिज्ञान हो जानेपर यह भी कष्टदायक नहीं होता। जैसे यह चित्रलिखित सर्प है, वास्तविक सर्प नहीं है—ऐसा जान लेनेपर वह सर्प-जनित भयका दाता नहीं होता, उसी तरह इस दृश्य संसाररूपी सर्पका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर यह भी सुख अथवा दुःख नहीं देता। जैसे चित्रलिखित सर्पका पूर्ण ज्ञान हो जानेपर उसका सर्पत्व ही नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार संसारका वास्तविक स्वरूप ज्ञात हो जानेपर यह स्थित रहते हुए भी शान्त हो जाता है अर्थात् इसका प्रभाव नहीं पड़ता।
रघुनन्दन ! यह शास्त्र ज्ञानका विस्तार करनेवाला और बुद्धिद्वारा ग्रहण किये जानेवाले सारभूत पदार्थोंकी परमावधि है। अब मैं इसका वर्णन करता हूँ, सुनो। पहले जिस विधिसे यह शास्त्र श्रवण किया जाता है तथा जिस परिभाषासे इसका यथार्थरूपसे विचार करनेका विधान है, वह अवतरणिका श्रवण करो। जिस देखे हुए पदार्थके सादृश्यसे अनुभवमें न आये हुए पदार्थका ज्ञान कराया जाता है, बोधोपकाररूप फल प्रदान करनेवाले उस सादृश्यको विद्वान् लोग दृष्टान्त कहते हैं। श्रीराम ! जैसे रात्रिमें दीपकके बिना घरमें रखे हुए बर्तन आदि सामग्रियोंका ज्ञान नहीं हो सकता, उसी तरह दृष्टान्तके बिना अपूर्व अर्थका बोध होना असम्भव है। उपमान और उपमेयके जिस कार्य-कारणभावका प्रतिपादन किया गया है, वह परब्रह्मको छोड़कर शेष सभी पदार्थोंके साथ लागू होता है। मैं यहाँ ब्रह्मोपदेशके प्रसङ्गमें तुमसे जो दृष्टान्त कह रहा हूँ, उसमें एकदेशके साधर्म्यसे प्रकृतार्थका परिग्रहण किया जाता है। यहाँ ब्रह्मतत्त्वका बोध करानेके लिये जो-जो दृष्टान्त दिया जाता है, वह स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले पदार्थोंकी तरह मिथ्याभूत जगत्के अन्तर्गत ही है—ऐसा समझना चाहिये। उत्पत्तिके पूर्व और विनाशके उत्तरकालमें जैसे यह जगत् अभावग्रस्त था, उसी तरह वर्तमान कालमें भी विचार करनेपर अवस्तुभूत ही है; अतः मिथ्यात्वके कारण जाग्रत् और स्वप्न—इन दोनोंकी समानता है। यह प्रसिद्ध बात बालकोंतककी समझमें आ सकती है। मोक्षसाधनोंके निर्माता ग्रन्थकर्ता महर्षि वाल्मीकिने दूसरे भी जिन ग्रन्थोंकी रचना की है, उनमें भी ज्ञातव्य वस्तुका ज्ञान करानेके लिये केवल यही व्यवस्था रक्खी है कि दृष्टान्तोंके जिस अंशमें समता सम्भव हो, उसी अंशके साथ समता रक्खी जाय। चूँकि यह जगत् स्वप्न, संकल्प और ध्यानसे कल्पित नगरके समान मिथ्या है, इसी कारण यहाँ वे ही दृष्टान्त दिये गये हैं, दूसरे नहीं। ज्ञानप्राप्तिके लिये कारणरहित ब्रह्ममें जो कारणताकी उपमा दी जाती है, वहाँ उपमाप्रयुक्त पदार्थोंके साथ सर्वांशमें साधर्म्य सम्भव नहीं हो सकता। अतः विवादरहित बुद्धिमान् पुरुषको ज्ञानप्राप्तिके लिये उपमानसे उपमेयका एक अंशमें ही साधर्म्य स्वीकार करना चाहिये। पदार्थोंके
१—दृश्य जगत्के मिथ्यात्वका निरूपण, दृश्य ही बन्धन है और उसका निवारण होनेसे ही मोक्ष होता है, इसका प्रतिपादन तथा द्रष्टाके हृदयमें ही दृश्यकी स्थितिका कथन
९४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अवलोकनमें दीपकके प्रकाशमात्रके अतिरिक्त उसके पात्र, तेल और बत्ती आदि किसीका भी उपयोग नहीं होता। केवल एकदेशके सादृश्यं, उपमान उपमेयका ज्ञान करा देता है। जैसे 'मणिदीप इव' इस दृष्टान्तमें उपमान दीपक केवल प्रकाशसे उपमेय मणिका बोधक होता है। दृष्टान्तके अंशमात्रसे ज्ञेय तत्त्वका ज्ञान हो जानेपर 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंके अर्थका निश्चय उपादेयरूपसे ग्रहण करना चाहिये। कुतार्किकताका आश्रय लेकर अनुभवविरुद्ध अपवित्र विकल्पोंद्वारा प्रबुद्धताका नाश नहीं करना चाहिये।
श्रीराम ! दृष्टान्तके द्वारा अद्वितीय आत्मज्ञानस्वरूप शास्त्रार्थके ज्ञानसे महावाक्यार्थभूत ब्रह्मस्वरूपसे सम्यक् प्रकारसे सिद्ध हुई शान्तिको ही निर्वाण कहा जाता है। इसलिये दृष्टान्त और दाष्ट्रान्तके विविध विकल्पोंके पचड़ेसे कोई प्रयोजन नहीं है। किंतु जिस किसी भी युक्तिसे महावाक्यार्थका भलीभाँति आश्रय लेना चाहिये। राघव ! तुम शान्तिको ही परम श्रेय जानो, अतः उसकी प्राप्तिके लिये यत्नशील हो जाओ; क्योंकि शान्ति और शास्त्र-ज्ञानसे विभूषित विचारपरायण पुरुषको दृष्टान्त एवं शास्त्रोपदेश, सौजन्य, उत्तम बुद्धि और शास्त्रज्ञ पुरुषोंके समागमद्वारा यत्नका आश्रय लेकर उत्तम परम पदको प्राप्त करना चाहिये। विद्वान् पुरुषको तबतक विचार करते रहना चाहिये, जबतक पुनः नष्ट न होनेवाली तुर्यपद नामक शान्तिमयी आत्मविश्रान्ति प्राप्त न हो जाय। जो पुरुष तुर्यपद नामक शान्तिसे युक्त होकर भवसागरसे पार हो गया है, वह गृहस्थ हो या संन्यासी, उसका जीने या न जीनेसे अथवा कर्म करने या न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। जैसे सम्पूर्ण जलोंका अधिष्ठान समुद्र है, उसी तरह सारे प्रमाणोंकी सत्ताका प्रमाण एकमात्र प्रत्यक्ष ही है; अतः अब तुम उसके विषयमें श्रवण करो। श्रेष्ठ पुरुष सारी इन्द्रियोंके सारभूत ज्ञानको प्रत्यक्ष कहते हैं। जिस इन्द्रियके प्रति जो ज्ञान सिद्ध होता है, वही प्रत्यक्ष कहा जाता है। अनुभूति, वेदन और प्रतिपत्तिके नामानुसार इस शास्त्रमें उसीका प्रत्यक्ष नाम रखा गया है। वही हमलोगोंका जीव है, वही संवित् है, वही 'अहंता' की प्रतीतिका विषयभूत साक्षी पुरुष है। वह जब संवित्के सहयोगसे उदित होता है, तब उसे पदार्थ कहा जाता है। जैसे जल तरङ्ग आदिके रूपमें दृष्टिगोचर होता है, उसी प्रकार वह परमात्मा संकल्प-विकल्प आदि नाना प्रकारके भ्रमोंके कारण जगद्रूपसे प्रकाशित होता है। सृष्टिके पूर्व जो कारणरहित था, वही सृष्टिके आरम्भमें सृष्टिलीलावश स्वयं ही अपनेमें स्फुरित होकर प्रत्यक्ष कारण हुआ। जीवका अज्ञानजनित कारण यद्यपि असत् है, तथापि वह सत्-सा प्रतीत होता है। वही इस प्रकृतिमें जगद्रूपसे व्यक्त हुआ है। विचार तो स्वयं ही स्वकर्मा-नुसार प्राप्त हुए अपने शरीरका नाश करके शीघ्र ही महान् परम पदको प्रकट कर देता है । विचारवान् पुरुष जब परमात्माको प्राप्त कर लेता है, तब उसका विचार भी उसीमें विलीन हो जाता है, उस समय वर्णनातीत केवल परमात्मा ही अवशिष्ट रह जाता है।
इस प्रकार प्रपञ्चका अभाव हो जानेके कारण अपने बुद्धि, इन्द्रिय और कर्मोंद्वारा मनके इच्छारहित अतएव शान्त हो जानेपर उसका न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न न करनेसे ही। फिर तो जैसे संचालकके द्वारा बिना चलाया हुआ यन्त्र काम नहीं देता, उसी तरह इच्छारहित मनके शान्त हो जानेपर कर्मेन्द्रियाँ कर्म आदिमें प्रवृत्त ही नहीं होतीं। बाह्य इन्द्रियोंद्वारा विषय-ग्रहण एवं मनद्वारा विषयानुसंधान-रूप पदार्थोंसे समाकुल यह जगत् विचारके अन्तर्गत विद्यमान है—ठीक उसी तरह, जैसे स्पन्दन वायुके भीतर ही होता है। शुद्ध सर्वात्मविषयक विचार जिस प्रकार कर्मानुसार भोगके लिये प्रकट होता है, तदनुरूप ही वह दिशा, काल तथा बाह्य एवं आन्तर पदार्थोंके
२—द्रष्टाकी मनोरूपता और उसके संकल्परूपमय जगत्की असत्ता तथा ज्ञाताके कैवल्यकी ही मोक्षरूपताका प्रतिपादन
मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन एवं ग्रन्थकी प्रशंसा * ९५
रूपमें विस्तृत रूपसे शोभित होता है। वह विचार शरीर आदिमें दृश्यताभासको देखकर 'यही मेरा स्वरूप है' यों मोहवश धारणा करके स्थित है। उसको अपना रूप जहाँ, जैसे और जिस प्रकारका प्रतीत होता है, वह वैसा ही हो जाता है। वह सर्वात्मा जहाँ जिस प्रकार आविर्भूत होता है, वहाँ वैसे ही तत्काल स्थिर हो जाता है और उसे अपना ही स्वरूप मानकर सुशोभित होता है। सर्वात्मकताके कारण द्रष्टा में दृश्यत्वका आरोप होता है। वह दृश्यत्व द्रष्टाकी उपस्थिति में ही सम्भव है, अन्यथा दृश्यता भी वास्तविक नहीं है। अतः प्रत्यक्ष ही कारणरहित अद्वितीय ब्रह्मरूपसे सिद्ध हुआ स्थित है। वही सभी प्रमाणोंका निर्माता है, क्योंकि अनुमान आदि प्रमाण प्रत्यक्षपूर्वक होनेके कारण उसीके अंश हैं। स.शुद्धभाव राम! अपने कर्ममात्रको दैव—प्रारब्ध मानकर उसकी उपासना करनेवाला इन्द्रियजयी पुरुष उस दैव-शब्दार्थ अर्थात् प्रारब्धको दूर हटाकर अपने पुरुषार्थ-द्वारा उस परम पदको अपने भीतर ही प्राप्त करता है।
रघुनन्दन ! पहले संत-समागमरूपी युक्तिके द्वारा बलपूर्वक अपनी बुद्धिको बढ़ाना उचित है। तत्पश्चात् महापुरुषोंके लक्षणोंके अनुकरणसे अपनेमें महापुरुषता लानी चाहिये। इस जगत्में जो-जो पुरुष जिस-जिस गुणसे विशेषरूपसे सम्पन्न है, वह उसी गुणके द्वारा विशिष्ट समझा जाता है; अतः शीघ्र ही उस पुरुषसे वह गुण प्राप्त करके अपनी बुद्धिकी वृद्धि करनी चाहिये। जैसे कमलसे सरोवर और सरोवरसे कमल परस्पर उन्नति-लाभ करते हैं, उसी तरह ज्ञानसे शम आदि गुण और शम आदि गुणोंसे ज्ञान—ये परस्पर वृद्धिगत होते रहते हैं। सत्पुरुषोंके सदाचरणसे ज्ञानकी और ज्ञानसे सत्पुरुषोंके आचरणकी वृद्धि होती है। यों ज्ञान और सत्पुरुषोंके आचरण परस्पर एक-दूसरेके सहयोगसे बढ़ते रहते हैं। तात ! जबतक इस संसारमें ज्ञान और सदाचारका समानरूपसे अभ्यास नहीं किया जाता, तबतक पुरुषको इन दोनोंमेंसे एककी भी सिद्धि नहीं होती। रघुनन्दन ! जिस प्रकार मैंने सदाचारके क्रमका वर्णन किया है, उसी तरह अब आगे ज्ञानक्रमका भलीभाँति उपदेश करूँगा। यह सद्-शास्त्र कीर्तिकारक, आयुवर्धक और परम पुरुषार्थरूप फल प्रदान करनेवाला है; अतः बुद्धिमान् पुरुषको इस शास्त्रके ज्ञानसे सम्पन्न आप्त पुरुषसे इसका श्रवण करना चाहिये।
( सर्ग १७—२० )
॥ मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण सम्पूर्ण ॥
उत्पत्ति-प्रकरण
दृश्य जगत्के मिथ्यात्वका निरूपण, दृश्य ही बन्धन है और उसका निवारण होनेसे ही मोक्ष होता है, इसका प्रतिपादन तथा द्रष्टाके हृदयमें ही दृश्यकी स्थितिका कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जिसमें मुमुक्षुओंके व्यवहारोंका ही प्रधानरूपसे वर्णन है, उस मुमुक्षु-व्यवहार-प्रकरणके बाद अब मैं इस उत्पत्ति-प्रकरणका वर्णन करता हूँ । जबतक दृश्य जगत्की सत्ता है, तभीतक यह जन्म-मृत्युरूप संसारका बन्धन है । दृश्य-का अभाव हो जानेसे बन्धन कदापि नहीं रह सकता । यह दृश्य जगत् जिस प्रकार उत्पन्न होता है, वह बता रहा हूँ । तुम क्रमशः ध्यान देकर सुनो । संसारमें जो उत्पन्न होता है, वही वृद्धि एवं क्षयको प्राप्त होता है । वही बँधता और मोक्षको प्राप्त होता है तथा वही स्वर्ग या नरकमें पड़ता है । अपने स्वरूपका बोध न होनेसे ही बन्धन है । इसलिये स्वरूपके बोधके लिये ही मैं आगेकी बात बता रहा हूँ ( इससे तुम्हें यह ज्ञात होगा कि यह दृश्य प्रपञ्च कभी हुआ ही नहीं ) । उत्पत्ति आदिका सम्बन्ध इस दृश्य जगत्से ही है ( आत्मासे नहीं ) । आत्मा तो दृश्यकी उत्पत्तिसे पहले जैसा रहा है, वैसा ही उसकी उत्पत्तिके बाद भी है ( वह सदा ही एकरस रहता है ) जैसे सुषुप्तिमें स्वप्नके संसारका अभाव हो जाता है, उसी तरह यह जो समस्त चराचर जगत् दिखायी देता है, इसका कल्पके अन्तमें विनाश ( अभाव ) हो जाता है । तत्पश्चात् निष्क्रिय गम्भीर ( अपरिच्छिन्न ), नाम-रूपसे रहित और अव्यक्त कोई अनिर्वचनीय सद् वस्तु ही शेष रह जाती है वह तेजस्तत्त्व नहीं है, क्योंकि उसके रूप नहीं होता । तथा वह तमोमय भी नहीं है, क्योंकि वह स्वयं प्रकाशस्वरूप है। विद्वानोंने व्यवहार-निर्वाहके लिये उस सत्-स्वरूप परमात्माके ऋत, आत्मा, परब्रह्म तथा सत्य इत्यादि नाम रख छोड़े हैं ।
सोनेका बना हुआ कड़ा सोना ही है । उस सोनेसे 'कटक' शब्दका अर्थ ( कडा ) जैसे पृथक् नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार 'जगत्' शब्दका जो अर्थ है वह परब्रह्मपर ही आधारित है, अतः उससे पृथक् नहीं है । जैसे कड़ेका स्वरूप सुवर्णके स्वभावके ही अन्तर्गत है, कड़ेके स्वभावके अन्तर्गत नहीं, उसी प्रकार यह दृश्यमान जगत् भी अपने परिच्छिन्न स्वभावको त्याग देनेपर ब्रह्मभावमें ही प्रतिष्ठित है, 'जगत्' शब्दके अर्थमें नहीं । ( तात्पर्य यह कि सोनेमें ही कड़ेकी कल्पना हुई है, कड़ेमें नहीं । इसी तरह ब्रह्ममें ही जगत्की कल्पना हुई है, जगत्में नहीं; अतः वह ब्रह्मसे भिन्न नहीं है । ) जैसे मरु-मरीचिकामें प्रतीत होनेवाली नदी अपने भीतर न होनेपर भी चञ्चल तरङ्गोंका विस्तार करती है और वे तरङ्गें सच्ची सी जान पड़ती हैं, उसी प्रकार मन ही इस जगत्रूपी इन्द्रजालकी सम्पत्ति-का विस्तार करता है और वह सम्पत्ति असत् होनेपर भी सत्य-सी प्रतीत होती है । जिसके कारण असत् वस्तु भी सत्-सी प्रतीत होती है, वह माया है । सर्वज्ञ विद्वानोंने उसके अविद्या, संसृति, बन्ध, माया, मोह, महत् और तम आदि अनेक नामोंकी कल्पना की है ।
प्रिय श्रीराम ! दृश्य-प्रपञ्चका अस्तित्व ही द्रष्टाका बन्धन कहा गया है । दृश्यके बलसे ही द्रष्टा बन्धनमें पड़ा है । दृश्यका निवारण हो जानेपर वह उस बन्धनसे मुक्त हो जाता है । 'त्वम्' ( तू ), 'अहम्' ( मैं ) और 'इदम्' ( यह ) इत्यादि रूपोंमें कल्पित जो मिथ्या जगत् है, उसीको दृश्य कहते हैं । जबतक वह दृश्य बना रहता है, तबतक मोक्ष नहीं होता । यदि यह दृश्यजगत् वास्तवमें है, तब तो किसीके लिये उसका
३—मनके स्वरूपका विवेचन, मन एवं मनःकल्पित दृश्य जगत्की असत्ताका निरूपण तथा महाप्रलय-कालमें समस्त जगत्को अपनेमें लीन करके एकमात्र परमात्मा ही शेष रहते हैं और वे ही सबके मूल हैं, इसका प्रतिपादन
उत्पत्ति प्रकरण ] * ब्रह्माकी मनोरूपता और उसके संकल्परूपमय जगत्की असत्ताका प्रतिपादन * ९७
निवारण नहीं हो सकता; क्योंकि जो असत् वस्तु है, उसका अस्तित्व नहीं है और जो सत् वस्तु है, उसका कभी अभाव नहीं होता। चित्-स्वरूप आत्माका जिसे बोध नहीं है, वह द्रष्टा जहाँ कहीं भी रहता है, वहीं उसकी दृष्टिके समक्ष इस दृश्य जगत्का वैभव प्रकट हो जाता है। इस दृश्य-प्रपञ्चके रहते हुए निर्विकल्प समाधि कैसे हो सकती है ? निर्विकल्प समाधि होनेपर ही चेतनता और तुरीय पदकी उपपत्ति होती है। जैसे सुषुप्ति (प्रगाढ निद्रा) के पश्चात् यह सारा सांसारिक दुःख अनुभवमें आने लगता है, उसी प्रकार समाधिसे उठनेपर यह सम्पूर्ण दुःखमय जगत् जैसेका तैसा प्रतीत होने लगता है। इस मनोरूप दृश्यके रहते हुए कोई समाधिके लिये कितना ही प्रयत्नशील क्यों न हो, क्या उसे दृश्य प्राप्त नहीं होता ? (अवश्य होता है); क्योंकि जहाँ-जहाँ इसकी चित्तवृत्ति जाती है, वहाँ-वहाँ उससे सम्बन्ध रखनेवाले जगत्रूपी भ्रमका निवारण नहीं किया जा सकता। जैसे कमलगट्टेके भीतर कमलिनीका वह बीज विद्यमान है, जिसमें उसका मृणालमय रूप छिपा हुआ है, उसी प्रकार अज्ञानी द्रष्टामें वह बुद्धि रहती है, जिसमें दृश्य जगत् अन्तर्हित होता है। जैसे पदार्थोंमें रस, तिल आदिमें तेल और फूलोंमें सुगंध रहती है, उसी प्रकार उपद्रष्टामें दृश्य बुद्धि रहती ही है। कपूर या कस्तूरी आदि जहाँ कहीं भी हों, उनकी सुगंध प्रकट हो ही जाती है, उसी प्रकार द्रष्टा कहीं भी हो, उसके उदरमें दृश्य जगत्का प्रादुर्भाव होता ही है। जैसे तुम्हारे हृदयमें स्थित मनो-राज्य-बुद्धि अपने अनुभवसे ही देखी गयी है और जैसे हृदयस्थित स्वप्न एव संकल्प तुम्हारे द्वारा अनुभवसे ही देखे जाते हैं, उसी प्रकार यह दृश्य जगत् तुम्हारे हृदयमें ही स्थित है और अपने अनुभवसे ही दृष्टिगोचर होता है। (सर्ग १)
ब्रह्माकी मनोरूपता और उसके संकल्परूपमय जगत्की असत्ता तथा ज्ञाताके कैवल्यकी ही मोक्षरूपताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मन्वन्तर आरम्भ होनेपर जब सम्पूर्ण प्राणियोंको अपना ग्रास बनानेवाली मृत्यु प्रजाका संहार करती हुई सबल हो उठी, तब उसने स्वयं ही ब्रह्माजीपर आक्रमण करनेका उद्योग आरम्भ किया। उस समय धर्मराज यमने उसे शीघ्र ही इस प्रकार शिक्षा दी—'मृत्यो ! ब्रह्मा परम (चिन्मय) व्योमरूप हैं। उनकी आकृति पृथ्वी आदि पाँचों भूतोंसे रहित है। वे मनोमय और संकल्परूप हैं। भला, उनपर कैसे आक्रमण किया जा सकता है ? जो चेतन आकाशके समान चमत्कारपूर्ण और चिन्मय आकाशके समान अनुभवरूप हैं, वे ब्रह्मा चिन्मय आकाश ही हैं। उनमें कार्य-कारण-भाव नहीं है। जैसे आकाशमें इन्द्रनील मणिसे बने हुए तथा औंधे रक्खे हुए महान् कड़ाहका-सा आकार पृथ्वी आदिसे रहित प्रतीत होता है और जैसे संकल्पनिर्मित पुरुष भी पृथ्वी आदिसे रहित ही ज्ञात होता है, उसी प्रकार स्वयम्भू ब्रह्मा भी पृथ्वी, जल आदि तत्त्वोंसे रहित ही भासित होते हैं। केवल (अद्वितीय) परमात्मामें न दृश्य है और न द्रष्टा ही है। यह स्वयं चिन्मात्रस्वरूप ही हैं, तथापि 'स्वयम्भू' नामसे प्रकाशित होता हैं। आदि, मध्य और अन्तसे रहित चिदाकाशरूप अद्वितीय ब्रह्म ही अपने संकल्पके कारण स्वयम्भू ब्रह्माके नामसे पुरुष अथवा देहधारी-सा भासित होता है।'
श्रीराम ! जिसका पूर्वजन्मोंमें उपार्जित कर्मोंसे युक्त पूर्व-शरीर रहा है, उसीको इस जन्ममें संसार-स्थितिकी कारणभूत स्मृतिका होना सम्भव है। जब ब्रह्माका कोई प्राक्तन कर्म है ही नहीं, तब उन्हें पूर्व-जन्मकी स्मृतिका उदय कहाँसे और कैसे होगा ?
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इसलिये ब्रह्माका शरीर पृथ्वी आदि कारणोंसे रहित है। ब्रह्मा अपने कारणभूत परब्रह्म परमात्मासे अभिन्न एवं स्वयं आत्मस्वरूप हैं। श्रीराम! स्वयम्भू ब्रह्माका वह शरीर आतिवाहिक¹ ही है। जो अजन्मा है, उसे आधिभौतिक शरीरकी प्राप्ति हो ही नहीं सकती।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—गुरुदेव! सभी प्राणियोंके एक 'आतिवाहिक' शरीर होता है और दूसरा 'आधिभौतिक'। किंतु ब्रह्माके केवल आतिवाहिक ही शरीर क्यों है?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम! सभी भूत कारणात्मा हैं—पञ्चीकृत भूतोंसे उत्पन्न देह आदिसे युक्त हैं; इसलिये उनके दो-दो शरीर होते हैं; परंतु अजन्मा ब्रह्माके लिये ऐसा कोई कारण नहीं है। इसलिये उनके एक ही आतिवाहिक शरीर है। एकमात्र अजन्मा ब्रह्मा ही सभी जातिके प्राणियोंके परम कारण हैं। उसका दूसरा कोई कारण नहीं है। इसलिये भी उनके एक ही शरीर है। सङ्कल्परूप ही उनका शरीर है। पृथ्वी आदि भूतोंके क्रमशः सम्मिश्रणसे उनके शरीरका निर्माण नहीं हुआ है। वे चिदाकाशस्वरूप आदिप्रजापति ब्रह्मा ही विविध जीवोंकी सृष्टि करके उनका विस्तार करते हैं। वे जीव ब्रह्माके संकल्पके सिवा अन्य कारणोंसे उत्पन्न नहीं हुए हैं। अतः वे भी चिदाकाश-स्वरूप ही हैं। जिस उपादानसे जिसकी उत्पत्ति होती है, वह तद्रूप ही होता है (जैसे मृत्तिकासे निर्मित हुआ घट मृत्तिकारूप ही है)। स्वर्णके कटक-कुण्डल आदि दृष्टान्तोंके द्वारा इस बातका सभीको अनुभव होता है। संसारमें व्यवहार करनेवाले समस्त प्राणियोंमें ब्रह्मा ही सबसे प्रथम चेष्टाशील चेतन भूत हैं। अन्तःकरण ही उनका स्वरूप है। उन्हींसे अहंकारका उदय होता है। जैसे वायुसे हिलना-चलना आदि चेष्टाएँ प्रकट होती हैं, उसी प्रकार उन प्रथम प्रतिस्पन्द (पहले प्रकट हुए चेष्टाशील चेतन भूत) ब्रह्मासे अभिन्न रूपवाली यह सृष्टि प्रकट हुई और फैली है। प्रतिभास ही जिनकी आकृति है, उन ब्रह्मासे उत्पन्न होनेके कारण यह दृश्यमान सृष्टि भी प्रतिभासरूप ही है। फिर भी लोगोंकी दृष्टिमें यह सत्य-सी प्रतीत होती है। इस विषयमें दृष्टान्त है—स्वप्नमें दीखनेवाले स्वप्नान्तरमें प्राप्त होनेवाला स्त्रीका समागम। जैसे स्वप्नमें स्त्री-समागमका स्वप्न देखा जाय तो उससे भी वीर्यपात होता है, उसी प्रकार व्यवहार और प्रयोजनकी सिद्धिकी दृष्टिसे असत् वस्तु भी सत्य वस्तुके समान व्यवहारका प्रकाश करती है। तात्पर्य यह कि स्वप्नमें स्त्रीका समागम जाग्रत्-कालमें सर्वथा असत्य सिद्ध होता है, तो भी उससे सत्यके समान कार्य होता देखा जाता है। इसी प्रकार प्रतिभासमात्र शरीरवाले ब्रह्मासे उत्पन्न यह सृष्टि भी यद्यपि प्रतिभासरूपा ही है, तथापि सत्यके समान प्रयोजनको सिद्ध करती है।
जिनका शरीर पृथ्वी आदि तत्त्वोंसे नहीं बना है, जो चिदाकाशस्वरूप और निराकार हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति स्वयम्भू ब्रह्मा सशरीर पुरुषकी भाँति प्रतीत होते हैं। पृथ्वी आदि तत्त्वोंसे शून्य आकारवाले संकल्प-पुरुष ब्रह्माका शरीर चित्तमात्र है। वे ही तीनों लोकोंकी स्थितिके कारण हैं। स्वयम्भू ब्रह्माका यह संकल्प प्राणियोंके कर्मोंके अनुसार जिस-जिस प्रकारसे विकासको प्राप्त होता है, चिदाकाशस्वरूप आत्मा उसी प्रकारसे प्रतीत होता है। ब्रह्मा मनोमय ही हैं, पृथ्वी-आदि-निर्मित नहीं हैं। इसलिये उनसे उत्पन्न हुआ यह विश्व भी मनोमय ही है; क्योंकि जो जिससे उत्पन्न होता है, वह तद्रूप ही होता है। (जैसे सोनेका बना हुआ कटक-कुण्डल आदि सुवर्णरूप ही होता है।) अजन्मा ब्रह्माके कोई सहकारी कारण
१. अर्चि आदि मार्गके द्वारा लोकान्तरमें पहुँचना 'अतिवहन' कहलाता है। इस अतिवहन कर्ममें कुशल अत्यन्त सूक्ष्म शरीरको 'आतिवाहिक' कहते हैं।
उत्पत्ति-प्रकरण ] * मनके स्वरूपका विवेचन तथा मन एवं मनःकल्पित दृश्य जगत्की असत्ताका निरूपण * ९९
नहीं हैं। सुतरां उनसे उत्पन्न हुए जगत्के भी कोई सहकारी कारण नहीं हैं। अतः यहाँ कारणसे कार्यमें कोई विचित्रता या विलक्षणता नहीं है। इसलिये जैसे कारण शुद्ध है, वैसे कार्य भी शुद्ध ब्रह्म ही है—यह सिद्धान्त स्थिर हुआ। इस जगत्के विषयमें कार्य-कारण-भावकी किंचिन्मात्र भी संगति नहीं है। जैसा परब्रह्म है वैसे ही तीनों लोक हैं। जल द्रवत्वसे अभिन्न ही है। उस अभिन्नरूप जलसे जिस तरह द्रवत्वका विस्तार होता है, उसी प्रकार मनोरूपताको प्राप्त हुए ब्रह्मा अपने शुद्ध आत्मा (स्वरूप) से ही जगत्का विस्तार करते हैं। वह जगत् उनके विशुद्ध आत्मस्वरूपसे भिन्न नहीं है जैसे ज्ञानियोंकी दृष्टिमें रस्सीमें सर्पभाव नहीं है, उसी प्रकार जगत्में आधिभौतिकता (जडता) नहीं है। फिर वे प्रबुद्ध ब्रह्मा आदि आधिभौतिक देहमें कैसे रह सकते हैं।
मन ही ब्रह्माके स्वरूपको प्राप्त हुआ है। वह मन संकल्परूप है। मन अपने ही स्वरूपको विकसित करके इस जगत्का निर्माण एवं विस्तार करता है! मनका रूप ब्रह्मा है और ब्रह्माका रूप मन। इसमें पृथ्वी आदिका प्रवेश नहीं है। मनने ही परमात्मामें पृथ्वी आदिकी कल्पना की है। जैसे कमलगट्टेके अंदर कमलिनी (भावी कमल-नाल) विद्यमान है उसी प्रकार मनके भीतर सम्पूर्ण दृश्यवर्ग स्थित है। मन, दृश्यवर्ग और इन दोनोंका द्रष्टा—इनका कभी किसीने विवेक नहीं किया। (जबतक द्रष्टा और दृश्यका विवेक न किया जाय, तबतक अज्ञानका उच्छेद न होनेसे मनमें दृश्यवर्गकी प्रतीति होती ही है।) यदि दृश्यरूप दुःख सत् हो तो उसकी कभी शान्ति नहीं हो सकती और दृश्यकी शान्ति न होनेपर ज्ञातामें कैवल्य (मोक्ष) की सिद्धि नहीं हो सकती। दृश्यका अभाव हो जानेपर ज्ञातामें ज्ञातृभाव स्थित हो, तो भी वह शान्त या निवृत्त हो जाता है। वही (ज्ञाताका कैवल्य ही) उसका मोक्ष कहा गया है। (सर्ग २-३)
मनके स्वरूपका विवेचन, मन एवं मनःकल्पित दृश्य जगत्की असत्ताका निरूपण तथा महाप्रलय-कालमें समस्त जगत्को अपनेमें लीन करके एकमात्र परमात्मा ही शेष रहते हैं और वे ही सबके मूल हैं, इसका प्रतिपादन
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! मनका स्वरूप कैसा है, यह मुझे स्पष्टरूपसे बताइये; क्योंकि मन ही इस सम्पूर्ण लोकमञ्जरीका* विस्तार करता है।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जैसे शून्य तथा जड आकारवाले आकाशका नाममात्रके अतिरिक्त दूसरा कोई रूप दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी प्रकार शून्य एवं जड रूप इस संकल्पात्मक मनका नामके सिवा कोई भी वास्तविक रूप नहीं दिखायी देता। यह जगत् क्षणिक संकल्परूपी मनसे उत्पन्न हुआ है। मृगतृष्णामें प्रतीत होनेवाले जल तथा चन्द्रमामें भ्रमसे दीखनेवाले द्वितीय चन्द्रमाके समान ही इस मनःकल्पित जगत्का स्वरूप है। रघुनन्दन ! संकल्पको ही मन समझो। जैसे द्रवत्व (द्रवरूपता) से जलका भेद नहीं है और जैसे वायुसे स्पन्दन (चेष्टा या गतिशीलता) भिन्न नहीं है, उसी प्रकार संकल्पसे मन भिन्न नहीं है। प्रियवर श्रीराम ! जिस विषयके लिये सङ्कल्प होता है, उसमें मन सङ्कल्परूपसे स्थित रहता है। तात्पर्य यह कि जो सङ्कल्प है वही मन है। सङ्कल्प और मनको कभी कोई पृथक् नहीं कर पाया है (इन दोनोंके पार्थक्यका अनुभव किसीको नहीं हुआ है)। मनको सङ्कल्पमात्र समझो।
वह समष्टिगत मन ही पितामह ब्रह्मा है। आतिवाहिक देह
* १. जगत्-रूपिणी लता ।
४—ज्ञानसे ही परासिद्धि या परमात्मप्राप्तिका प्रतिपादन तथा ज्ञानके उपायोंमें सत्सङ्ग एवं सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायकी प्रशंसा
| १०० | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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( सङ्कल्पमय शरीर ) रूपी ब्रह्माको लोकमें समष्टिगत मन कहा गया है। अविद्या, संसार, चित्त, मन, बन्धन, मल और तम—इन्हें श्रेष्ठ विद्वानोंने दृश्यके पर्यायवाची नाम माना है। संकल्परूप दृश्यसे अतिरिक्त मनका कुछ भी स्वरूप नहीं है। यह दृश्य-प्रपञ्च वास्तवमें उत्पन्न ही नहीं हुआ है, यह बात मैं आगे चलकर फिर बताऊँगा। जैसे प्रकाशका आलोक* स्वभाव है, जैसे चपलता वायुका स्वभाव है और जिस प्रकार द्रवीभूत होना जलका स्वभाव है, उसी प्रकार द्रष्टामें दृश्यत्व स्वभावसे ही विद्यमान है ( अर्थात् द्रष्टासे दृश्य भिन्न नहीं है ), जैसे सुवर्णमें बाजूबंद और कटक-कुण्डल आदिकी स्थिति है, जैसे मृगतृष्णाकी नदीमें जलकी स्थिति है और जैसे सपनेकी नगरीमें उठायी गयी दीवारकी स्थिति है, उसी प्रकार द्रष्टामें दृश्यकी स्थिति मानो गयी है। अर्थात् जैसे उपर्युक्त वस्तुएँ अपने अधिष्ठानसे भिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार द्रष्टासे दृश्यकी पृथक् सत्ता नहीं है।
द्रष्टासे दृश्यकी पृथक् सत्ता न होनेके कारण दृश्यका अभाव हो जानेपर जो द्रष्टामें बलात् द्रष्टापनका अभाव प्राप्त होता है, उसीको तुम असत् ( मिथ्या दृश्य ) के बाधित होनेसे सन्मात्र चिन्मयरूपमें अवशिष्ट हुए आत्माका केवलीभाव ( या कैवल्य ) समझो। जब चित्त आत्माके कैवल्य ( अद्वितीय चिन्मात्रस्वरूपता ) के बोधसे तदाकार ( कैवल्यभावको प्राप्त ) हो जाता है, तब उसकी राग-द्वेष आदि वासनाएँ उसी तरह शान्त हो जाती हैं, जैसे हवाके न चलनेपर वृक्षोंमें कम्पन और जलाशय आदिमें लहरोंका उठना बंद हो जाता है। दिशा, भूमि और आकाशरूपी सभी प्रकाशनीय पदार्थोंके न रहनेपर जिस तरह प्रकाशका शुद्ध रूप ही अवशिष्ट रहता है, उसी प्रकार तीनों लोक, तू और मैं इत्यादि दृश्य प्रपञ्चकी सत्ता न होनेपर शुद्धरूपसे अवशिष्ट चिन्मय द्रष्टाका केवलीभाव ( कैवल्य ) ही रह जाता है।
* अन्धकारकी निवृत्तिपूर्वक समस्त पदार्थोंको नेत्रोंके समक्ष ला देना।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! यदि दृश्य सत् है, तब तो यह शान्त या निवृत्त नहीं हो सकता; क्योंकि सद्का कभी अभाव नहीं होता और यदि यह दोष प्रदान करने-वाला दृश्य असत् है, तब यह बात हमारी समझमें आती नहीं। इसलिये यह दृश्यरूपिणी विषूचिका ( हैजा ), जो मनसे जन्म आदिके भ्रमको उत्पन्न करनेवाली और दुःखकी परम्पराको देनेवाली है, कैसे शान्त होगी ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिस वस्तुकी सत्ता है, उसका कभी नाश नहीं होता। यह जो कुछ आकाश आदि भूत और अहंकारके रूपमें लक्षित होता है, वह सब व्यवहार-दशामें जगत् है, किंतु परमार्थ दशामें ब्रह्म है। ब्रह्मके सिवा 'जगत्' शब्दका दूसरा कोई वास्तविक अर्थ है ही नहीं। हमारे सामने यह जो कुछ दृश्य-प्रपञ्च दृष्टिगोचर होता है, वह सब अजर, अमर एवं अव्यय परब्रह्म ही है। सर्वत्र पूर्णका प्रसार हो रहा है। शान्त परब्रह्ममें शान्त जगत् स्थित है। आकाशमें ही आकाशका उदय हुआ है तथा ब्रह्ममें ही ब्रह्म प्रतिष्ठित है * । वास्तवमें न तो दृश्य सत्-रूप
* परब्रह्म परमात्माके साथ जीवात्माकी एकताका जो बोध है, वही पूर्णमें पूर्णका प्रसार या प्रवेश है। परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र व्यापक होनेके कारण पूर्ण है। जीवात्मा भी उससे अभिन्न होनेके कारण पूर्ण ही है। इनमें जो भेदका भ्रम था, उसका मिट जाना ही उनकी एकता है। इस एकताकी अनुभूति ही पूर्णमें पूर्णका प्रवेश है। वास्तवमें जीवात्मा न तो कभी ब्रह्मसे पृथक् होता है और न वह कहीं अन्यत्रसे आकर ब्रह्ममें प्रविष्ट ही होता है। ये प्रवेश और निर्गम औप-चारिक हैं, वह ( जीवात्मा ) ब्रह्मरूप होकर ही ब्रह्ममें प्रतिष्ठित होता है, जैसा कि श्रुतिका कथन है—'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति।' मूल ग्रन्थमें जो 'शान्ते शान्तं व्यवस्थितम्' कहा गया है, इसमें प्रथम 'शान्त' शब्द ब्रह्मके लिये प्रयुक्त हुआ है और दूसरा 'शान्त' शब्द जगत्के लिये। जहाँ तीनों अवस्थाओं तथा सब प्रकारकी भेद-भ्रान्तियोंका सदाके लिये शमन हो गया है, वह ब्रह्म शान्तस्वरूप कहा गया है। ब्रह्मदृष्टि प्राप्ति होनेपर जगत-दृष्टि शान्त हो जाती है, इसलिये जगत्को भी शान्त कहा गया
५—परमात्माके ज्ञानकी महिमा, उसके स्वरूपका विवेचन, दृश्य जगत्के अत्यन्ताभाव एवं ब्रह्मरूपताका निरूपण तथा आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये योगवासिष्ठ ही सर्वोत्तम शास्त्र है—इसका प्रतिपादन
उत्पत्ति-प्रकरण ] * मनके स्वरूपका विवेचन तथा मन एवं मनःकल्पित दृश्य-जगत्की असत्ताका निरूपण * १०१
है, न द्रष्टा, न दर्शन, न शून्य, न जड और न चित् ही सद्रूप है। केवल शान्तस्वरूप ब्रह्म ही सद्रूप है, जो सर्वत्र व्याप्त है।
यह जगत् सृष्टिके आदिमें उत्पन्न नहीं हुआ था, इसलिये इसका अस्तित्व सर्वथा नहीं है। जैसे स्वप्न आदिमें मनसे ही नगरकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार यह जगत् भी मनसे ही उत्पन्न होकर प्रतीतिको विषय हो रहा है। स्वयं मन ही सृष्टिके आदिमें उत्पन्न न होनेके कारण असत्-स्वरूप है, उस असत्-रूप मनसे कल्पित होनेके कारण भी यह जगत् असत् ही है। फिर जिस प्रकार इसका अनुभव होता है, वह बता रहा हूँ, सुनो। मन निरन्तर क्षीण होनेवाले इस दृश्यरूपी दोषका विस्तार करता है। वह स्वयं असत्-रूप ही है, तो भी सत्-सा प्रतीत होनेवाले जगत्की सृष्टि करता है—ठीक उसी तरह, जैसे स्वप्न असत् होता हुआ भी सत्-सा प्रतीत होनेवाले जगत्की सृष्टि करता है। मन ही अपनी इच्छाके अनुसार स्वयं शीघ्र ही शरीरकी कल्पना कर लेता है। वही चिरकालकी भावनासे विस्तारको प्राप्त होकर इस ऐन्द्रजालिक वैभवरूप दृश्य-जगत्का विस्तार करता है। चञ्चल शक्तिसे युक्त होनेके कारण केवल यह मन ही स्वयं स्फुरित होता, उछलता, कूदता, जाता, आता, याचना करता, घूमता, गोते लगाता, संहार करता और अपकर्षको प्राप्त होता है।
श्रीराम ! महाप्रलय होनेपर जब जगत् अति सूक्ष्म रूपसे स्थित होनेके कारण अपने कार्यमें असमर्थ हो जाता है, उस समय वह सम्पूर्ण भावी दृश्यवर्गकी सृष्टिसे पहले विक्षेपरहित शान्तावस्थामें ही शेष रहता है। उस प्रलयकालमें केवल कभी अस्त न होनेवाले सूर्यदेव—स्वयञ्ज्योति, अजन्मा, रोग-शोकसे रहित, सदा सर्वशक्तिमान्, सर्वस्वरूप, परमात्मा महेश्वर ही विराजमान होते हैं। जहाँसे वाणी उन्हें न पाकर लौट आती है अर्थात् जहाँ वाणीकी पहुँच नहीं हो पाती, जो जीवन्मुक्त महात्माओंके द्वारा जाने जाते हैं, साङ्ख्यदर्शनके अनुयायी जिन्हें 'पुरुष' कहते हैं, वेदान्तवादी 'ब्रह्म' नामसे जिनका चिन्तन करते हैं, विज्ञानवेत्ताओंकी दृष्टिमें जो परम निर्मल विज्ञानमात्र हैं, जिन्हें शून्यवादी शून्य कहते हैं, जो सूर्यके प्रकाशके भी प्रकाशक हैं; जैसे नदी-नाले आदिके जल अन्ततोगत्वा महासागरमें ही गिरते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण दृश्यसमूह महाप्रलयकालमें जिनमें ही विलीन होते हैं; जो आकाशमें, विभिन्न शरीरोंमें, प्रस्तरोंमें, जलमें, लताओंमें, धूलिकणोंमें, पर्वतोंमें, वायुमें और पाताल आदि सभी देश, काल एवं वस्तुओंमें समान भावसे स्थित हैं; जिन्होंने आकाशको शून्य पर्वतोंको घनीभूत और जलको द्रवीभूत बनाया है, जगत्को दीपककी भाँति प्रकाशित करनेवाले सूर्य जिनके अधीन हैं; जैसे मरुभूमिमें सूर्यकी तपती हुई किरणोंके भीतर जलराशि लहराती दिखायी देती है, उसी प्रकार जिन अत्यन्त व्यापक परमात्मारूपी महासागरमें आविर्भाव और तिरोभाव (उत्पत्ति और प्रलय)—से युक्त त्रिलोकरूपिणी तरङ्ग उठती रहती हैं, जो सम्पूर्ण व्यावहारिक सत्ताओंसे ऊँचे उठे हुए—सर्वविलक्षण पारमार्थिक सत्तासे सम्पन्न हैं, जिनसे ही नियति, देश, काल, चलन, चेष्टा और क्रिया आदि समस्त भावोंको कार्य निर्वाहकी क्षमता प्राप्त हुई है—वे एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही उक्त महाप्रलयके समय शेष रहते हैं। वे परमात्मा उत्पत्ति-स्थिति आदिसे रहित, कभी अस्त न होनेवाले, नित्य प्रकाशमान ज्ञानसे परिपूर्ण एव विकारशून्य अपने स्वरूपमें ही स्थित हैं। वे एकमात्र—अद्वितीय ही हैं। अतएव वे मायासे अनेक विशाल संसारों—अगणित ब्रह्माण्डोंकी रचना करते हुए भी वास्तवमें न कोई कार्य करते हैं और न उनसे कोई चेष्टाएँ ही बनती हैं।
(सर्ग ४-५)
है। मृत्तिकामें घटकी भाँति ब्रह्ममें ही जगत्की कल्पना हुई है; इसलिये वह उसीमे स्थित है। घट आदि उपाधियोंके नष्ट होनेपर घटाकाश, मठाकाश आदिकी जो महाकाशमें प्रतिष्ठा होती है, वही आकाशमें आकाशका उदय है। इसी तरह जगत्-दृष्टिका निवारण होकर जो ब्रह्मभावका साक्षात्कार होता है, वही ब्रह्ममें ब्रह्मकी प्रतिष्ठा है।
१०२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
ज्ञानसे ही परासिद्धि या परमात्मप्राप्तिका प्रतिपादन तथा ज्ञानके उपायोंमें सत्सङ्ग एवं सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायकी प्रशंसा
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! परब्रह्म परमात्मा देवताओंके भी देवता हैं। उनके ज्ञानसे ही परम सिद्धि (मोक्ष) की प्राप्ति होती है, क्लेशयुक्त सकाम कर्मोंके अनुष्ठानसे नहीं। संसार-बन्धनकी निवृत्ति या मोक्षकी प्राप्तिके लिये ज्ञान ही साधन है, ज्ञानके अतिरिक्त सकाम कर्म आदिका इसमें कोई भी उपयोग नहीं है; क्योंकि मृगतृष्णामें होनेवाले जलके भ्रमका निवारण करनेके लिये ज्ञानका ही उपयोग देखा गया है—ज्ञानसे ही उस भ्रमकी निवृत्ति होती है, किसी कर्मसे नहीं। सत्सङ्ग तथा सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर होना ही ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिमें हेतु है। वह स्वाभाविक साधन ही मोहजालका नाशक होता है। यह परमात्मा सत्स्वरूप ही है, ऐसे ज्ञानमात्रसे ही जीवके दुःखका निवारण होता है तथा वह जीवन्मुक्त अवस्थाको प्राप्त होता है।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—गुरुदेव ! सबके आत्मस्वरूप इन परमात्माके ज्ञानमात्रसे कष्टप्रद जन्म-मरण आदि फिर कभी बाधा नहीं देते। अतः बताइये, ये महान् देवाधिदेव परब्रह्म परमात्मा किस उपायसे शीघ्र प्राप्त होते हैं ? किस तीव्र तपस्यासे अथवा कितने महान् क्लेश उठानेसे इनके ज्ञानकी उपलब्धि हो सकती है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! अपने पौरुषजनित प्रयत्नसे विकासको प्राप्त हुए विवेकके द्वारा उन परमात्म-देवका यथार्थ ज्ञान होता है। इसलिये पुरुषोचित प्रयत्नके द्वारा भवरोगके निवारणके लिये मुख्य औषधोंका संग्रह करना चाहिये। सत्-शास्त्रोंका अभ्यास और सत्पुरुषोंका सङ्ग—ये दो प्रधान औषधें संसाररूपी रोगका नाश करनेवाली हैं। इस जगत्में सम्पूर्ण दुःखोंके विनाशकी सिद्धिके लिये एकमात्र पुरुषप्रयत्न ही प्रधान साधन है। उसे छोड़कर दूसरी कोई गति या उपाय काम दे सके, यह सम्भव नहीं। रघुनन्दन ! आत्म-ज्ञानकी प्राप्तिके लिये अपेक्षित उस पुरुषप्रयत्नका स्वरूप कैसा है, जिसका पूर्णतया पालन करनेसे राग-द्वेष-मयी महामारी शान्त हो जाती है—यह बताता हूँ, सुनो। मुमुक्षु पुरुषको चाहिये कि वह यथासम्भव ऐसी वृत्तिके द्वारा जो लोक और शास्त्रके विरुद्ध न हो, निष्कामभावसे जीवन-निर्वाह करता हुआ संतुष्टचित्त हो भोगवासनाका परित्याग करे। अपनी अनुद्विग्नता (उद्वेगशून्यता अथवा शान्तवृत्ति) के द्वारा यथासम्भव उद्योग करके सत्सङ्ग और सत्-शास्त्रोंका अभ्यास—इन दो साधनोंकी सबसे पहले शरण लेनी चाहिये। जो पुरुष प्रारब्धके अनुसार जो कुछ भी मिल जाय, उसीसे संतुष्ट रहता है, सत्पुरुषों अथवा शास्त्रोंद्वारा निन्दित वस्तुकी ओर आँख उठाकर नहीं देखता और सत्सङ्ग एवं सत्-शास्त्रोंके अभ्यासमें तत्पर रहता है, वह शीघ्र ही मुक्त हो जाता है। देशमें प्रायः सज्जन (शास्त्रोक्त सदाचारमें प्रतिष्ठित) पुरुष जिसे श्रेष्ठ महात्मा कहते हैं, वह यदि ज्ञान-वैराग्य आदि उत्तम गुणोंसे युक्त हो तो अवश्य ही श्रेष्ठ महात्मा है। ऐसे महात्माकी प्रयत्नपूर्वक शरण लेनी चाहिये। सम्पूर्ण विद्याओंमें अध्यात्मविद्या प्रधान है। उस अध्यात्मतत्त्वकी चर्चासे युक्त जो उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र एवं गीता आदि सद्ग्रन्थ हैं, उन्हींको सत्-शास्त्र कहते हैं। उनका विवेकपूर्वक विचार करनेसे मनुष्य मुक्त हो जाता है। जैसे निर्मलीके चूर्णके संसर्गसे जलकी मैल साफ हो जाती है तथा जिस प्रकार योगके अभ्याससे लोगोंकी बुद्धि शुद्ध हो जाती है, उसी प्रकार सत्-शास्त्र और सत्सङ्गसे प्राप्त हुए विवेकके द्वारा अज्ञानका बलपूर्वक निवारण हो जाता है। (सर्ग ६)
६—जीवन्मुक्तिका लक्षण, जगत्की असत्ता तथा ब्रह्मसे उसकी अभिन्नताका प्रतिपादन, परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका वर्णन
उत्पत्ति-प्रकरण ] * परमात्माके ज्ञानकी महिमा और उसके स्वरूपका विवेचन * १०३
परमात्माके ज्ञानकी महिमा, उसके स्वरूपका विवेचन, दृश्य-जगत्के अत्यन्ताभाव एवं ब्रह्मरूपताका निरूपण तथा आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये योगवासिष्ठ ही सर्वोत्तम शास्त्र है—इसका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिन परमात्म-देवकी चर्चा की गयी है, ये कहीं दूर नहीं रहते, सदा शरीरमें ही स्थित हैं और चिन्मय ( चेतन ) रूपसे विख्यात हैं। ये ही चिन्मय चन्द्रशेखर शिव हैं। ये ही चिन्मय गरुड़वाहन विष्णु हैं। ये ही चिन्मय सूर्य हैं तथा ये ही चिन्मय ब्रह्मा हैं। कार्य-कारणरूप इन परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार हो जानेपर इस साधन-परायणके हृदयकी गाँठ ( चिजडग्रन्थि ) खुल जाती है, सम्पूर्ण संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं।
श्रीराम ! जब परमात्माका ज्ञान हो जाता है, तब विषके वेगके शान्त होनेपर जैसे विषूचिका मिट जाती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण दुःखोंकी परम्परा नष्ट हो जाती है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जिनका ज्ञान या साक्षात्कार होनेपर मन सम्पूर्ण मोह-महासागरके पार हो जायगा, उन परब्रह्म परमात्माका यथार्थ स्वरूप कैसा है ? इसका मेरे समक्ष वर्णन कीजिये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिस ज्ञानरूपी महासागरमें नाश आदि विकारके बिना ही ज्यों-के-त्यों स्थित हुए इस संसारका अत्यन्त अभाव ही सिद्ध होता है, वही परमात्माका स्वरूप है। जो परम चिन्मय होनेके कारण अत्यन्त सूक्ष्म होकर भी अज्ञानी जनोंकी दृष्टिमें विशाल पाषाणकी भाँति स्थूलरूपसे स्थित प्रतीत होता है तथा अजड ( चिन्मय ) होता हुआ भी मूढ मनुष्योंके अन्तःकरणमें जडके तुल्य ही जान पड़ता है, वह परमात्माका स्वरूप है।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—मुने ! परमात्मा सत् है, यह कैसे जाना जाता है ? तथा इतने बड़े इस जगत् नामक दृश्यको असत् कैसे समझा जाता है ? आप कहते हैं इसकी उत्पत्ति हुई ही नहीं, यह बिना हुए ही प्रतीत हो रहा है; यह बात कैसे समझमें आये ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे रूपहीन आकाशमें भ्रमवश नील, पीत आदि वर्णोंकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दमय ब्रह्ममें यह जगत्-सम्बन्धी भ्रम उत्पन्न हुआ है। इस भ्रमके अत्यन्ताभावके ज्ञानमें यदि पूरी दृढ़ता हो जाय, तभी ब्रह्मका स्वरूप ज्ञात होता है, दूसरे किसी कर्मसे नहीं। दृश्यके अत्यन्ताभावके सिवा दूसरी कोई शुभ गति नहीं है। ज्यों-के-त्यों स्थित हुए इस दृश्य-जगत्के अत्यन्ताभावका निश्चय हो जानेपर जो शेष रह जाता है, उसी परमार्थ वस्तुका बोध होता है। जिसका बोध होता है, वह परमात्मा उस जाननेवाले पुरुषका आत्मा ही हो जाता है। जबतक इस जगत् नामक दृश्यकी अपनी सत्ताका अत्यन्ताभाव अथवा मिथ्यात्व सिद्ध नहीं हो जाता, तबतक परम तत्त्वरूप परमात्माको कभी कोई जान नहीं सकता। असत् पदार्थकी सत्ता नहीं होती और सत् वस्तुका कभी अभाव नहीं होता। जो वस्तु स्वभावसे है ही नहीं, उसके निवारणमें— उसे मिथ्या समझकर त्याग देनेमें कौन-सी कठिनाई है ? यह जो विस्तृत जगत् दिखायी देता है, पहले उत्पन्न नहीं हुआ था। यह चिन्मात्र होनेके कारण निर्मल आत्मामें ही कल्पित है, अतः ब्रह्मरूप ही है। उससे अतिरिक्त इसकी कोई सत्ता नहीं है। जगत् नामसे न यह कभी उत्पन्न हुआ, न है और न दिखायी ही देता है। जैसे सुवर्णमें कल्पित कटक-कुण्डल आदिका सुवर्ण-दृष्टिसे अभाव ही है, उसी प्रकार ब्रह्ममें कल्पित जगत्का ब्रह्मदृष्टिसे अभाव ही सिद्ध होता है। अतः इसके परिमार्जनमें— इसे असत् समझ लेनेमें क्या परिश्रम है !
१०४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अब मैं बहुत-सी युक्तियोंद्वारा इस विषयका कुछ विस्तारके साथ इस तरह प्रतिपादन करूँगा, जिससे अबाधित (परमार्थ) तत्त्वका स्वयं ही अनुभव हो जाता है। जो पहले (सृष्टिके आरम्भमें) ही उत्पन्न नहीं हुआ, उसका यहाँ अस्तित्व कैसे हो सकता है। मरुभूमिमें जलपूर्ण नदीकी सत्ता कैसे सम्भव है। भ्रमसे प्रतीत होनेवाले द्वितीय चन्द्रमामें ग्रहभाव कैसे हो सकता है। जैसे वन्ध्याका पुत्र नहीं होता, जैसे मरुभूमिमें जलकी सरिता नहीं बहती और जैसे आकाशमें वृक्ष नहीं होता, उसी तरह जगत्-रूप भ्रमकी भी कहीं सत्ता नहीं है। श्रीराम! यह जो कुछ दिखायी देता है, वह सब रोग-शोकसे रहित ब्रह्म ही है। इस विषयका मैं आगे चलकर केवल वाणीद्वारा ही नहीं, युक्तियोंसे भी प्रतिपादन करूँगा। उदारबुद्धि रघुनन्दन! तत्त्वज्ञ पुरुष जिस विषयका युक्तियोद्वारा वर्णन करते हैं, उसकी अवहेलना करना कदापि उचित नहीं है। जो मूढ़बुद्धि मानव युक्तियुक्त वस्तुका अनादर करके कष्टसाध्य (युक्तिशून्य) वस्तुमें आग्रह रखता है, उसे विद्वान् लोग अज्ञानी ही समझते हैं।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन्! यह किस युक्तिसे जाना जाता है कि यह दृश्यमान जगत् ब्रह्म ही है? यह बात कैसे सिद्ध होती है? यदि युक्तियोंद्वारा इस विषयका अनुभव हो जाय, तब तो फिर जाननेयोग्य कुछ भी शेष नहीं रह जाता।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन! यह मिथ्याज्ञान-रूपिणी विषूचिका चिरकालसे दृढमूल हो गयी है। इसीका नाम जगत् है और इसीको अविचार कहते हैं। यह ज्ञानके बिना निवृत्त नहीं होती। जो जिस पदार्थको पाना चाहता है और उसके लिये पूरा प्रयत्न करता है, वह उस पदार्थको अवश्य प्राप्त कर लेता है। परंतु यह बात तभी सम्भव होती है, जब वह बीचमें ही थककर या ऊबकर प्रयत्नसे मुँह न मोड़ ले।
श्रीरामजीने पूछा—शास्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गुरुदेव! आत्मज्ञानकी प्राप्ति करानेके लिये कौन-सा शास्त्र मुख्य है, जिसका ज्ञान प्राप्त कर लेनेपर मनुष्यको फिर कभी शोक नहीं होता?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—महामते! जिन शास्त्रोंमें मुख्यतः आत्मज्ञानका ही प्रतिपादन हुआ है, उनमें यह महारामायण नामक शास्त्र ही सबमें श्रेष्ठ और शुभ है। इस उत्तम इतिहासका श्रवण करनेसे बोध प्राप्त हो जाता है। इसे समस्त इतिहासोंका सार कहा गया है। इस वाङ्मय (शास्त्र) का श्रवण कर लेनेपर कभी क्षीण न होनेवाली जीवन्मुक्ति स्वयं ही प्रकट हो जाती है। इसलिये यही सबकी अपेक्षा अत्यन्त पावन है। जैसे स्वप्न आदिके रहते हुए ही यह स्वप्न है, ऐसा ज्ञान हो जानेपर उस स्वप्नके सच्चे होनेकी भावना नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार इस शास्त्रका विचार करनेसे जब यह समझमें आ जाता है कि सारा जगत् स्वप्नके समान मिथ्या है, तब यह दृश्य-जगत् ज्यों-का-त्यों स्थित रहकर भी ज्ञानीकी दृष्टिमें अस्तको प्राप्त हो जाता है। आत्मज्ञानके लिये अपेक्षित जो-जो युक्तियाँ इस शास्त्रमें हैं, वे ही दूसरे ग्रन्थोंमें भी उपलब्ध होती हैं। इसीलिये विद्वान् पुरुष इस महारामायणको सम्पूर्ण विज्ञान-शास्त्ररूपी धनका कोष (खजाना) मानते हैं। जो पुरुष प्रतिदिन इस महारामायणका श्रवण करता है, उसमें उत्कृष्ट चमत्कार आ जाता है। उसकी बुद्धि अन्य ग्रन्थोंके स्वाध्यायसे उत्पन्न हुए बोधकी अपेक्षा उत्तम बोधको प्राप्त कर लेती है, इसमें संशय नहीं। किसी दुष्कर्मके फलका उदय होनेके कारण जिसकी इस ग्रन्थके प्रति रुचि अथवा श्रद्धा नहीं है, जिसे यह शास्त्र नहीं रुचता, वह दूसरे किसी ज्ञानप्रधान सत्-शास्त्रका विचार करे (उससे हमारा कोई द्वेष नहीं है)। जैसे उत्तम औषधका पान करनेपर स्वयं ही नीरोगता प्राप्त हो जाती है, उसी तरह इस योगवासिष्ठ महारामायणका श्रवण कर लेनेपर जीवन्मुक्तिका स्वयं अनुभव होने लगता है।
(सर्ग ७-८)
७—जगत्की ब्रह्मसे अभिन्नता, परमार्थ-तत्त्वका लक्षण, महाप्रलयकालमें जगत्के अधिष्ठानका विचार तथा जगत्की ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन
उत्पत्ति-प्रकरण] * जीवन्मुक्तिका लक्षण, जगत्की असत्ता तथा ब्रह्मसे उसकी अभिन्नताका प्रतिपादन * १०५
जीवन्मुक्तिका लक्षण, जगत्की असत्ता तथा ब्रह्मसे उसकी अभिन्नताका प्रतिपादन, परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिनके चित्त परमात्मचिन्तनमें लगे हुए हैं, जिनके प्राण उन्हींमें रम रहे हैं, जो परस्पर परमात्मतत्त्वका बोध कराते हुए सदा परमात्माकी ही चर्चा करते हैं, उसीसे ही संतुष्ट होते हैं और उसीमें निरन्तर रत रहते हैं, एकमात्र ज्ञानमें ही जिनकी निष्ठा है तथा जो सदा परमात्मज्ञानका ही विचार करते हैं, उन पुरुषोंको ही वह जीवन्मुक्ति प्राप्त होती है, जो देह-त्यागके अनन्तर विशुद्ध मुक्ति ही है।
शास्त्रानुकूल व्यवहार करते हुए भी जिस पुरुषकी दृष्टिमें ज्यों-का-त्यों स्थित हुआ यह जगत् विलीन हो जाता है और आकाशके समान शून्य प्रतीत होने लगता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो व्यवहारमें लगा हुआ ही एकमात्र बोध-निष्ठाको प्राप्त हो, जाग्रत् अवस्थामें भी सुषुप्त-पुरुषकी भाँति राग-द्वेष एवं हर्ष-शोकादिसे शून्य हो जाता है, उसे जीवन्मुक्त कहते हैं। जिसके मुखकी कान्ति सुखमें उदित (अथवा वृद्धिको प्राप्त) नहीं होती तथा दुःखम अस्त नहीं हो जाती और प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाय, उसीसे जो सन्तोषपूर्वक जीवननिर्वाह करता रहता है, वही जीवन्मुक्त कहा जाता है। जो निर्विकार आत्मामें सुषुप्तकी भाँति स्थित रहता हुआ भी अविद्यारूपिणी निद्राका निवारण हो जानेसे सदा जागता रहता है, जिसकी जाग्रत् अवस्था नहीं है (अर्थात् देह, इन्द्रिय आदिका बाध हो जानेसे जो इन्द्रियोंद्वारा पदार्थोंका उपभोग नहीं करता) और जिसका ज्ञान सर्वथा वासना-रहित है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसमें अहंकारका भाव नहीं है, जिसकी बुद्धि कर्म करते समय कर्तृत्वके और न करते समय अकर्तृत्त्वके अभिमानसे लिप्त नहीं होती, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो ज्ञानस्वरूप परमात्माके किञ्चित् उन्मेष और निमेषसे ही तीनों लोकोंकी प्रलय और उत्पत्ति देखता है तथा जिसका सबके प्रति अपने समान ही भाव है अर्थात् जो सबके प्रति आत्मभाव रखता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिससे लोगोंको उद्वेग नहीं होता और जिसको लोगोंसे उद्वेग नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष और भयसे रहित है, वह पुरुष जीवन्मुक्त कहा जाता है। जिसकी संसारके प्रति सत्यता-बुद्धि नष्ट हो गयी है, जो दूसरोंकी दृष्टिमें अवयवोंसे युक्त होनेपर भी वास्तवमें अवयवरहित है तथा जो चित्तयुक्त होकर भी वस्तुतः चित्तसे शून्य है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है।
श्रीराम ! विदेहमुक्ति ही मुक्ति कहलाती है। इसीको ब्रह्म कहा गया है और इसीको निर्वाण कहते हैं। इसकी प्राप्ति कैसे होती है, यह बता रहा हूँ; सुनो। मैं, तुम, यह, वह इत्यादि रूपसे जो यह दृश्य-प्रपञ्च दिखायी देता है, यह यद्यपि सत्-रूपसे प्रतीत होता है, तथापि वन्ध्यापुत्रके समान इसकी कभी उत्पत्ति हुई ही नहीं—ऐसा निश्चय हो जानेपर यह मुक्ति प्राप्त होती है। जो अद्वितीय, शान्त, चिन्मय और आकाशके समान निर्मल है, वह ब्रह्म ही यह सम्पूर्ण जगत् है; क्योंकि सबमें सत्तामात्रका ही तो बोध होता है। रघुनन्दन ! मैंने सोनेके कड़ेमें बहुत विचार करनेपर भी विशुद्ध सुवर्णके सिवा कहीं कोई कड़ा नामकी वस्तु नहीं देखी। जलकी तरङ्गमें मैं जलके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं देखता; क्योंकि जहाँ वैसी तरङ्ग नहीं दिखायी देती, वहाँ भी जल ही है (अतः जहाँ तरङ्ग है, वहाँ भी जलके अतिरिक्त कुछ नहीं है) वायुके अतिरिक्त कभी कहीं भी स्पन्दन (गतिशीलता) नामकी कोई वस्तु नहीं है। स्पन्दन सदा वायुरूप ही है। अतः इन दृष्टान्तोंके अनुसार यह जगत् भी ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। जैसे आकाशमें शून्यता है, मरुभूमिमें ताप ही जल है और प्रकाशमें सदा तेज
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स्थित है, उसी प्रकार ये तीनों लोक परब्रह्म परमात्मा ही हैं।
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—मुने ! जिस युक्तिसे इस दृश्य-जगत्के अत्यन्ताभावका बोध होकर मुक्तिका उदय हो, उस उत्तम युक्तिका आप मुझे उपदेश कीजिये। द्वैतका अभाव होनेपर ही निर्वाण सुलभ होता है, इसलिये जिस प्रकार इस दृश्य-जगत्की अत्यन्त असत्ता सिद्ध हो और इसके रूपमें स्वभावनिष्ठ ब्रह्म ही विराजमान है—यह बोध हो जाय, वैसा ही उपदेश मुझे दीजिये। महर्षे ! किस युक्तिसे इस बातका ज्ञान होता है और कैसे यह बात सिद्ध होती है ? इस ज्ञानके सिद्ध हो जानेपर तो फिर कुछ साध्य (कर्तव्य) शेष नहीं रह जायगा।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! यह मिथ्याज्ञान-रूपिणी विषूचिका चिरकालसे दृढमूल हो गयी है। निश्चय ही विचाररूपी मन्त्रसे इसका समूल नाश हो जाता है। सब प्रकारकी वस्तुओंसे युक्त तथा देवता, असुर और किंनर आदिसहित यह जो कुछ भी स्थावर-जङ्गमस्वरूप सारा जगत् दिखायी देता है, वह महाप्रलय-कालमें असत् एवं अदृश्यरूप होकर न जाने कहाँ चला जाता और नष्ट हो जाता है। तदनन्तर नाम और रूपसे रहित, शान्त, गम्भीर एवं अनिर्वचनीय 'सत्' अवशिष्ट रहता है। वह न तो तेज है न फैला हुआ अन्धकार है; न शून्य है न आकारवान् है; न दृश्य है न दर्शन है और न भूतों तथा भौतिक पदार्थोंका समूह ही है। वह विलक्षण सद्वस्तु अनन्तरूपसे स्थित है। नाम-रूपसे रहित होनेके कारण ही उसके स्वरूपका विशेषरूपसे वर्णन नहीं किया जा सकता। उसका स्वरूप पूर्णसे भी पूर्णतर है। वह दृश्य-शून्य, चिन्मात्र, असीम, अजर, शिव, आदि, मध्य और अन्तसे रहित, कारणशून्य तथा रोग-शोक आदिसे रहित है। उसके न कान हैं न जीभ, न नासिका है न त्वचा है और न नेत्र ही हैं; तथापि वह सदा सभी जगह सुनता है, रसका आस्वादन करता है, सूँघता है, स्पर्श करता है और देखता है। जिस प्रकाशसे पूर्वोक्त सदसत्-स्वरूप प्रपञ्च दिखायी देता है, वह चैतन्यमय प्रकाश भी वही है। विविध सृष्टियोंसे विचित्ररूप धारण करनेवाला भी वही है। आदि-अन्तसे शून्य स्वरूपको पाकर सर्वत्र प्रकाशित होनेवाला नित्य चेतन ब्रह्म भी वही है।
जो सामान्यतः तो सर्वत्र प्रकाशित होते हैं, परंतु अन्त:करणमें विशेषरूपसे निरन्तर प्रकाशित होते हुए विद्यमान रहते हैं, जो चिन्मय दीप हैं तथा जिनके ही प्रकाशसे तीनों लोक प्रकाशित होते हैं, जिनके बिना ये सूर्य आदि सारे प्रकाश अन्धकारके तुल्य हैं, जिनके रहनेपर ही त्रिभुवनरूपी मृग-तृष्णाकी प्रवृत्ति होती है (अर्थात् जैसे सूर्यकी किरणोंके प्रकाशित होनेपर ही उनमें मृग-तृष्णाके जलकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार जिन चिन्मय परमात्मामें ही त्रिलोकीरूपी भ्रमका उदय होता है), जगत्की सृष्टि और संहार जिनके विलास हैं, जो सबसे महान् और व्यापक हैं, स्पन्द और अस्पन्द (चल और अचल) जिनके स्वरूप हैं, जिनका स्वभाव निर्मल और अविनाशी है, वायुके समान जिनकी गतिशील और गतिहीन सर्वव्यापीनी सत्ता व्यवहारवश केवल नामसे ही भिन्न है, वास्तवमें भिन्न नहीं है, वही चिन्मय परमात्मा है।
जो सदा ही जगा हुआ है, सर्वदा ही सोया हुआ है तथा जो सर्वत्र और सदा ही न तो सोया है और न जगा ही हुआ है, जिसका स्पन्दरहित (निश्चल) रूप कल्याणस्वरूप और शान्त है, जिसका स्पन्दनशील स्वरूप ही तीनों लोकोंकी स्थिति है, स्पन्द और अस्पन्दका विलास ही जिसका स्वरूप है; जो अद्वितीय एवं परिपूर्णस्वरूप है, फूलोंमें सुगन्धकी भाँति सब पदार्थोंमें साररूपसे स्थित है, विनाशशील वस्तुओंमें भी अविनाशी रूपसे विद्यमान है, सम्पूर्ण वस्तुओंका प्रत्यक्ष करनेवाली वृत्तियोंमें प्रकाश-रूपसे स्थित होकर भी जो श्वेतवस्त्रमें स्थित श्वेतताकी भाँति अग्राह्य है, जो वाग् आदि इन्द्रियोंसे रहित होनेके कारण गूँगेके समान होता हुआ भी सबकी वाणीकी
उत्पत्ति-प्रकरण ] * जगत्की ब्रह्मसे अभिन्नता तथा परमार्थ-तत्त्वका लक्षण * १०७
प्रवृत्तिमें कारण होनेसे गूँगा नहीं है; जो मननरूप विकारसे रहित होनेके कारण पाषाणके समान होता हुआ भी मननशील है, नित्यतृप्त होता हुआ भी भोक्ता है और अकिंचन (क्रिया आदिसे रहित) होता हुआ भी कर्ता है; जो अङ्गरहित है तथापि सम्पूर्ण लोकोंके अङ्ग जिसके अपने ही अङ्ग हैं; जो सहस्रों भुजाओं और नेत्रोंसे युक्त है, अकिंचनरूपसे स्थित होनेपर भी जिसने सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रक्खा है; जो इन्द्रिय-ग्राससे हीन है तो भी जिससे सम्पूर्ण इन्द्रियोंके व्यापार होते रहते हैं; जो मननशून्य है तथापि जिससे ये मनोनिर्माणकी रीतियाँ प्रकट होती हैं; जिसका साक्षात्कार न होनेसे भ्रान्तिजनित संसाररूपी सर्पका भय बना रहता है तथा जिसका दर्शन (ज्ञान) हो जानेपर सारी आशाएँ और सम्पूर्ण भय सब ओर भाग जाते हैं; जैसे समुद्रसे छोटी-छोटी लहरोंके समूहसे युक्त चञ्चल उत्ताल तरङ्ग प्रकट होती रहती हैं, उसी तरह जिससे घट-पट आदिके रूपमें सैकड़ों पदार्थोंकी श्रेणियाँ प्रादुर्भूत होती हैं; जैसे कड़े, बाजूबंद, बहूँटा और नूपुर आदिके रूपमें सुवर्ण ही अन्य-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार शत-शत घटादि पदार्थोंके भ्रमसे जो अन्य-सा भासित होता है; जैसे जलमें प्रतिक्षण नष्ट होनेवाली तरङ्गमाला प्रकट होती रहती है, उसी प्रकार जिससे अन्य-सी, अतिरिक्त-सी, पहले-जैसे और नूतन-सी क्षणभङ्गुर दृश्यपरम्परा स्फुरित होती है, उसे चिन्मय परमात्मा ही समझो।
रघुनन्दन ! तुम जिस रूपमें स्थित होकर क्रिया, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और चेतनको जानते हो, वह प्रमाता चेतन भी वही है और जिससे जानते हो, वह भी परमात्मदेव ही है। साधो ! द्रष्टा, दर्शन और दृश्यके मध्यमें साक्षी-रूपसे जिसका दर्शन होता है, उसे तुम एकाग्रचित्त होकर अपना आत्मा ही समझो। श्रीराम ! वह परब्रह्म परमात्मा अजन्मा, अजर, अनादि, सनातन, नित्य, कल्याणमय, निर्मल, अमोघ, सबका परम वन्दनीय, अनित्य, समस्त कल्पनाओंसे शून्य, कारणोंका भी कारण, अनुभव-रूप, अवेद्य, ज्ञानस्वरूप, विश्वरूप तथा अन्तर्यामी है।
(सर्ग ९)
जगत्की ब्रह्मसे अभिन्नता, परमार्थ-तत्त्वका लक्षण, महाप्रलयकालमें जगत्के अधिष्ठानका विचार तथा जगत्की ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं-रघुनन्दन ! यह जगत् न तो कभी परब्रह्मसे उत्पन्न होता है और न उसमें लीन ही होता है। इस प्रकार केवल यह सद्ब्रह्म ही सदा अपने आपमें प्रतिष्ठित है। ब्रह्ममें जो शून्य-शब्दार्थकी कल्पना की गयी है अर्थात् उसे जो शून्य कहा गया है, वह अशून्यकी अपेक्षासे है। वास्तवमें ब्रह्म अशून्यरूप (सत्) है। उसमें शून्यता और अशून्यताकी कल्पनाएँ कैसे सम्भव हैं। चेतन आकाशरूप इस ब्रह्मका प्रकाश केवल अपने अनुभवका ही विषय है। जो बुद्धि आदिके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थित है, उसका वही अनुभव करता है, दूसरा नहीं (क्योंकि वह स्वानुभवैकवेद्य है)। निष्कल होनेके कारण सौम्य (शान्त) आकारवाले महासागरके जलमें जिस प्रकार बड़ी-बड़ी लहरें विद्यमान होती हैं, उसी प्रकार निराकार ब्रह्ममें उसीके समान यह विश्व स्थित है। पूर्णसे पूर्णका ही प्रसार होता है; जो पूर्णमें स्थित है, वह पूर्ण ही है। अतः विश्व कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ और जो उत्पन्न हुआ है, वह तत्स्वरूप (ब्रह्मरूप) ही है। वह परमाणुसे भी अधिक सूक्ष्म, अत्यन्त अणुसे भी अधिक अणु, परम शुद्ध, सूक्ष्म, शान्त और आकाशके मध्यभागसे भी बढ़कर निर्मल है। दिशा, काल और परिमाणसे उसका स्वरूप सीमित नहीं है; अतएव वह अत्यन्त विस्तृत (सर्वव्यापक) है। उसका
सं० यो० व० अं० ५-
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आदि-अन्त नहीं है। वह स्वयं प्रकाशस्वरूप है, दूसरे किसी प्रकाशसे प्रकाशित होने योग्य नहीं है।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! अनन्त चेतनस्वरूप उस परमात्मतत्त्वका कैसा रूप है—इस विषयको आप फिर मुझसे कहिये, जिससे उसका भलीभाँति बोध हो जाय।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! महाप्रलय होनेपर सम्पूर्ण कारणोंका भी कारण परब्रह्म परमात्मा ही शेष रहता है। उसका वर्णन किया जाता, है, सुनो। समाधिमें निरोधके द्वारा जब मनकी वृत्तियोंका क्षय हो जाता है, तब मनके अपने स्वरूपका नाश करके जो अनिर्वचनीय स्वप्रकाश सद्रूप अवशिष्ट रहता है, वही उस अनन्त चिन्मय परमार्थ-वस्तुका रूप है। जब दृश्य जगत् नहीं रहता और दृश्यके अभावसे द्रष्टा भी विलीन हुआ-सा प्रतीत होता है, उस समय जो द्रष्टा, दृश्य और दर्शन—इस त्रिपुटीके लयका प्रकाशक साक्षीरूपसे अवशिष्ट रहता है, वह चिन्मय ब्रह्म ही उस परमार्थ-वस्तुका स्वरूप है। जीवरूपा चित्-सत्ताका जो अचिन्तनीय चिन्मय निर्मल एव शान्त स्वरूप है, वही उस परमार्थ वस्तु या परमा त्माका रूप है। आकाशका जो रहस्य (व्यापकत्व) है, शिलाका जो तात्त्विक रूप घनत्व है तथा वायुका जो गूढ़ रूप अन्तर-बाहरमें परिपूर्ण होना है, वही उस चेत्य-भिन्न (दृश्यरहित) चेतन आकाशस्वरूप परमात्माका स्वरूप है वेदन (बुद्धि-वृत्ति) का, प्रकाश (पदार्थोंकी स्फुरणा) का, दृश्य (विषय) का और तम (अज्ञान)-का साक्षीभूत जो अनादि-अनन्त वेदन (ज्ञान) है, वही उस परमात्माका रूप है। ज्ञेय, ज्ञान, और ज्ञाता—सामने प्रतीत होनेवाली यह त्रिपुटी जहाँ उदित होती है, जिसमें स्थित रहती है और जिसमें ही लीन हो जाती है, वही उस परमात्माका परम दुर्लभ रूप है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जो 'इदम्' रूपसे प्रत्यक्ष दिखायी दे रहा है और जिसका आप ब्रह्ममें अभाव कहते हैं, वह यह दृश्य-जगत् महाप्रलय होनेपर कहाँ स्थित होता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे वन्ध्याके पुत्र और आकाशमें वन कभी नहीं होते, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण दृश्यजगत् तीनों कालोंमें कभी अस्तित्वमें नहीं आता। जगत् न कभी उत्पन्न हुआ है और न उसका कभी नाश ही होता है। जिसकी पहले सत्ता ही नहीं है, उसकी उत्पत्ति कैसी, और उसके विनाशकी चर्चा कैसी !
श्रीरामजीने पूछा—वन्ध्यापुत्र और आकाश-वृक्षकी कल्पना तो की ही जाती है। वह कल्पना जैसे उत्पत्ति और विनाशसे युक्त है, उसी प्रकार यह जगत् भी जन्म और नाशसे युक्त क्यो नहीं होगा ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—जैसे सोनेके कड़ेमें सुस्पष्ट दिखायी देनेवाला यह कटकत्व वास्तवमे हैं नहीं, सुवर्ण ही उसकेरूपमे भासित होता है, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें जगत् नामकी कोई वस्तु नहीं है (जिसे हम जगत् कहते हैं, वह ब्रह्म ही है)। जैसे आकाशमें जो शून्यता है वह आकाशसे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्ममें प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेपर भी यह जगत् उससे भिन्न नहीं है। जैसे कालिमा काजलसे भिन्न नहीं है और जैसे शीतलता बर्फसे पृथक् नहीं है, उसी तरह परमपद-परमात्मामें पृथक् प्रतीत होनेवाला जगत् नहीं है। जैसे शीतलता चन्द्रमासे और हिमसे अलग नही होती, उसी प्रकार यह सृष्टि भी ब्रह्मसे पृथक् नहीं है। जैसे मरुभूमिमें प्रतीत होनेवाली मृग-तृष्णाके नदीमें जल नहीं है तथा जैसे नेत्रदोषसे प्रतीत होनेवाले द्वितीय चन्द्रमामें चन्द्रत्व नहीं है, उसी प्रकार निर्मल परमात्मामें प्रत्यक्ष दीखनेपर भी जगत् नामकी कोई वस्तु नहीं है। स्वप्नमें—स्वप्न देखनेवाले पुरुषके अन्तःकरणमें जो स्वाप्निक जगत्की भ्रान्ति होती है, वह जैसे संवित् (ज्ञान) का विकासमात्र है, उसी तरह सृष्टिके
उत्पत्ति-प्रकरण ] * ब्रह्ममें जगत्का अध्यारोप; जीव एवं जगत्के रूपमें ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन * १०९
प्रारम्भिक कालमें ब्रह्ममें ही इस जगत्का विकास हुआ है। अतः यह उससे भिन्न नहीं है। जैसे द्रवत्व (तरलता) जलरूप ही है, स्पन्दन ( कम्पन ) वायुरूप ही है और जैसे आभास प्रकाशरूप ही है, उसी प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंमें प्रतीत होनेवाला जगत् ब्रह्म-रूप ही है। जिस प्रकार स्वप्न देखनेवाले पुरुषके भीतरका चैतन्य ही ग्राम नगर आदि-जैसा प्रतीत होता है, उसी प्रकार परमात्मामें उसका अपना चिन्मय स्वरूप ही जगत्-सा भासित होता है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! यदि यह दृश्यरूपी विश्व उत्पन्न होकर भी स्वप्नगत जगत्के समान मिथ्या ही है, तो इसकी इतनी सुदृढ़ प्रतीति कैसे हो रही है—यह बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! यह जगत् सर्वात्मक ( ब्रह्ममय ) ही है, ब्रह्मसे भिन्न कदापि नहीं। जगत्-रूपमें जो इसकी प्रतीति होती है, वह सर्वथा असत् है। रघुनन्दन ! यह प्रसिद्ध परमात्मा एक ही है। उसके विषयमें द्वितीय होनेकी कोई कल्पना नहीं है। उस अद्वितीय परमात्मामें यह जगत् जिस प्रकार उत्पन्न हुआ है, वह तुम्हें आगे चलकर बताऊँगा। प्रिय श्रीराम ! उसीसे ये सारे दृश्य-पदार्थ विस्तारको प्राप्त हुए हैं। वह परमात्मा ही यह व्यष्टि और समष्टिरूप जगत् है। दृश्य वस्तुओंके दर्शन और मननीय वस्तुके मननके जो-जो प्रकार हैं, उनके रूपमें वह स्वयं ही उदित और विलीन होता रहता है—उसीके आविर्भाव और तिरोभाव होते रहते हैं।
( सर्ग १०-११ )
ब्रह्ममें जगत्का अध्यारोप, जीव एवं जगत्के रूपमें ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे सुषुप्ति ही स्वप्नवत् प्रतीत होती है, उसी प्रकार ब्रह्म ही इस सृष्टिके रूपमें प्रतीतिक विषय हो रहा है। एक पुरुषकी वासना-मात्रका कार्य होनेसे स्वप्नकी घनी ( सुदृढ़ ) प्रतीति नहीं होती; परंतु यह प्रपञ्च समष्टिकी वासनाका कार्य होनेके कारण इसकी सुदृढ़ एवं क्रमबद्ध प्रतीति होती है। सर्वात्मक ब्रह्म ही इस प्रपञ्चका अधिष्ठान है। असीम प्रकाशस्वरूप जो अनन्त चैतन्यमणि ( ब्रह्म ) है, उसका सत्तामात्र रूप ही यह सम्पूर्ण विश्व है।
पञ्चभूतोंकी जो तन्मात्राएँ हैं, वे ही जगत्का बीज हैं। पञ्चतन्मात्राओंका बीज आदिमाया शक्ति है, जिसका परमात्मासे व्यवधान-रहित ( साक्षात् ) सम्बन्ध है तथा वही जगत्की स्थितिमें हेतु है। इस प्रकार वह चिन्मय, अजन्मा एवं सबका आदिभूत परमात्मा ही मायाद्वारा जगत्का बीज होता है। मायाके हट जानेपर वही अपने विशुद्ध रूपसे सदा अनुभवमें आता है। इसलिये यह जगद्-वैभव चिन्मय परमात्मरूप ही है।
जैसे स्वप्नमें बिना बनाये ही नगर बन जाता है उसी प्रकार महाकाशरूपी महान् वनमें जगद्रूपी वृक्ष बारंबार उत्पन्न होकर नष्ट हो जाता है। जैसे स्वप्न देखनेवाला पुरुष अपने लिये नगरका निर्माण-सा कर लेता है, उसी प्रकार यह चेतन आत्मा भी पृथ्वी आदिकी सृष्टि कर लेता है। वास्तवमें उस समय भी वह अहङ् चेतन आत्मा ही रहता है। जगत्का बीज हैं पञ्चतन्मात्राएँ और उनका बीज है अविनाशी चेतन आत्मा। जो बीज है, उसीको फल समझो ( क्योंकि उपादान कारण और कार्यमें भेद नहीं है )। इसलिये सारा जगत् ब्रह्ममय ही है। जो स्वरूप कल्पित है, वह सत्य कैसे हो सकता है। यदि पञ्चभूतोंकी तन्मात्राएँ ब्रह्मस्वरूपा हैं तो उनके कार्यरूप स्थूल पाँच महाभूतोंको भी ब्रह्म ही समझो। इससे यह सिद्ध हुआ कि सदासे दृढ़मूल यह त्रिलोकी ब्रह्म ही है।
इस प्रकार यह जगत् न कभी उत्पन्न होता है न उत्पन्न हुआ दिखायी देता है। जैसे स्वप्न एवं मनोरथ-
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द्वारा निर्मित पुर असत् होता हुआ भी सत्-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार ब्रह्माकाशरूपी परम व्योममय चिन्मय आत्मामें जीवाकाशत्व असत् होता हुआ भी सत्-सा प्रतीत होता है, अर्थात् उस ब्रह्ममय महाकाशसे अविभक्त होनेपर भी विभक्त-सा दीखता है । चिदात्मा परमेश्वरमें कल्पित समष्टि-जीवाकाश अत्यन्त विस्तृत होता हुआ भी 'मैं चिनगारीकी भाँति अत्यन्त सूक्ष्म तेजका कण हूँ' ऐसी भावना करनेसे वह अपनेको वैसा ही ( अणुरूप ही ) अनुभव करने लगता है । आकाशमें आत्मरूपसे जिस स्थूलताका चिन्तन करता है, भावनाद्वारा अपनेको वैसा ही स्थूल समझने लगता है । जैसे संकल्पसे कल्पित चन्द्रमा सत् नहीं है, वैसे ही भावनाद्वारा भावित वह रूप भी सत् नहीं है, तथापि सत्-सा प्रतीत होता है । जैसे स्वप्न देखनेवाला मनुष्य सपनेमें अपनेको पथिकके रूपमें देखता है, उसी प्रकार वह चित्तकी कल्पनासे अपनेमें लिङ्ग देह और भावी स्थूल शरीरकी प्रतीतिको भी धारण करता है । जैसे पर्वत बाहर स्थित होनेपर भी दर्पणके भीतर स्थित हुआ-सा प्रतीत होता है, जैसे कुएँके जलमें प्रतिबिम्बित हुआ शरीर वही व्यवहारकर्ता-सा जान पड़ता है, जैसे दूरतक सुनायी देने योग्य शब्द भी सम्पुट ( गुफा आदि ) में अवरुद्ध होकर उसके भीतर ही रह जाता है, बाहर नहीं फैलने पाता तथा जैसे स्वप्न और मनोरथविषयक संवित् देहके भीतर ही स्वप्न आदि देखती है—वे विषय बाहर होनेपर भी अपने बाह्य रूपको त्यागकर ही शरीरके भीतर अन्तःकरणमें भासित होते हैं, उसी प्रकार आगकी चिनगारीके समान अणु उपाधिमें स्वरूपतः कल्पित जो सूक्ष्मशरीर है, उसके भीतर स्थित हुआ यह जीवात्मा वासनामय देहादि-व्यवहारका अनुभव करता है ।
मनोमय शरीरवाला जीव अपने मनोमय देहाकाशमें ही स्थूलताकी भावना करके स्थूल-देहधारी हो गया है । वह अपनी कल्पनाके भीतर ही स्थित हुए ब्रह्माण्डका दर्शन करता है । मनोमय शरीरधारी जीव मनको ही आत्मा समझता है । उस आत्मभूत चित्तसे अपने संकल्पके अनुसार अपने ही लिये गर्भरूपी गृह, देश, काल, कर्म तथा द्रव्य आदिकी कल्पनाओंकी भावना करता हुआ नाम आदिका निर्माता बनकर वह आतिवाहिक देहधारी जीव अपने द्वारा कल्पित विभिन्न नामोंसे उन-उन पदार्थोंको और अपनेको भी असत्य जगत्-रूपी भ्रममें बाँधता है । जैसे मिथ्याभूत स्वप्नमें झूठे ही अपना उड़ना प्रतीत होता है, उसी प्रकार असत्य जगत्-रूपी भ्रममें ही यह जीवात्मा मिथ्या विकासको प्राप्त होता जान पड़ता है । वह कभी उत्पन्न नहीं हुआ है । इस ब्रह्माण्डरूपी भ्रमके उदित होनेपर भी इसमें कभी कुछ उत्पन्न नहीं हुआ । उत्पन्न हुई कोई वस्तु दिखायी नहीं देती; केवल अनन्त, निर्मल ब्रह्माकाश ही सर्वत्र विद्यमान है । संकल्पद्वारा निर्मित नगरके समान यह दृश्य-प्रपञ्च सत्-सा प्रतीत होनेपर भी सत् नहीं है । स्वयं उदित हुआ यह प्रपञ्च उस चित्रके समान है, जिसका किसी चित्रकारने न तो निर्माण किया है और न उसमें रंग ही भरा है । यह बिना बनाये ही बनकर अनुभवमें आ रहा है और सत्य न होकर भी सत्य-सा स्थित है । महाकल्पके अन्तमें ब्रह्मा आदिके मुक्त हो जानेके कारण निश्चय ही वर्तमान कल्पके ब्रह्माको कोई पूर्वजन्मकी स्मृति नहीं रह जाती, अतः वह स्मृति इस जगत्की उत्पत्तिमें कारण नहीं हो सकती । इसलिये वर्तमान कल्पमें जैसे ब्रह्मा संकल्पमय हैं, वैसे ही उनसे उत्पन्न हुआ यह जगत् भी संकल्पजन्य ही माना गया है । इस पृथ्वी आदिकी सृष्टिके विषयमें जो इस तरह साक्षीका अनादिकालका अनुभव है, उसीको यदि कारण माना जाय तो साक्षिपेक्ष स्वप्नदृष्ट पृथ्वी आदि पदार्थ जैसे जागरण-अवस्थामें मिथ्या सिद्ध होते हैं उसी प्रकार अनादि साक्षीके संस्कारसे उत्पन्न जगत् भी मिथ्या ही सिद्ध होगा ।
जैसे जिस किसी भी देश या कालमें द्रवत्व जलसे
उत्पत्ति-प्रकरण] * भेदके निराकरणपूर्वक एकमात्र ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन * १११
भिन्न नहीं होता, उसी प्रकार किसी भी देश या कालमें यह सृष्टि परमात्मासे भिन्न नहीं है । इस प्रकार यह सृष्टि भ्रमसे ही प्रौढ ( सुदृढ या घनीभूत ) प्रतीत होती है । वास्तवमें यह विषमतारहित परमात्मा ही इसके रूपमें स्थित है । जो ब्रह्माण्ड प्रतीत होता है, वह अत्यन्त निर्मल चिन्मय ब्रह्म ही है ( उससे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं है )। इसी तरह यह दृश्य-जगत्, जो आत्मामें सर्वथा कल्पित भ्रमरूप है, शान्त, आधाररहित, आधेय-शून्य, अद्वैत तथा एकत्वके व्यवहारसे भी शून्य ब्रह्मरूप ही है । यद्यपि इस जगत् रूपी भ्रमकी प्रतीति होती है, तथापि उसके रूपमें कोई वस्तु उत्पन्न नहीं हुई है । चारों ओरसे शून्य जो निर्मल चेतनाकाश ( ब्रह्म ) प्रतिष्ठित है, वही सदा सर्वत्र अपने स्वरूपसे स्थित है । उसमें न सम्पूर्ण संसार है, न उसका कोई आधार है, न आधेय है; न दृश्य है न उसमें द्रष्टापन है; न ब्रह्माण्ड है न ब्रह्मा है और न कहीं कोई वितण्डावाद ही है । न जगत् है न पृथ्वी है । यह सम्पूर्ण दृश्य शान्तस्वरूप निर्मल ब्रह्म ही है । इस प्रकार परब्रह्म परमात्मा ही अपनेमें अपनेसे विकासको प्राप्त होता है ।
जैसे तरल होनेके कारण जल ही अपनेमें आवर्त रूपसे प्रतीत होता है, उसी प्रकार चित्-रूप होनेके कारण आत्मा ही अपनेमें जगत्-सा प्रतीत होता है । जगत् इससे कोई भिन्न पदार्थ नहीं है । असत् होता हुआ ही यह प्रतीतिका विषय होता और यहाँ सत्-सा अनुभवमें आता है । अन्तमें ( महाप्रलयके समय ) यह असत् होता हुआ ही नष्ट होता है । जैसे स्वप्नमें जो अपना मरण दिखायी देता है, वह जाग्रत्कालमें असत् ही सिद्ध होता है, उसी प्रकार अज्ञान अवस्थामें प्रतीत होनेवाला यह दृश्य-प्रपञ्च ज्ञान होनेपर असत् ही सिद्ध होता है । ( अथवा प्रलयकालमें जो इसका संहार होता है, वह स्वप्नावस्थामें प्रतीत होनेवाले अपने ही मरणके समान मिथ्या है । ) अथवा ब्रह्मका अपना ही स्वरूप होनेके कारण यह दृश्य-प्रपञ्च सन्मात्र, अनामय, अखण्डित ( परिपूर्ण ), अनादि, अनन्त तथा चेतन आकाशरूप ब्रह्म ही है । ( उससे अतिरिक्त इसकी सत्ता ही नहीं है । ) (सर्ग १२-१३)
भेदके निराकरणपूर्वक एकमात्र ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन तथा जगत्की पृथक् सत्ताका खण्डन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार अहंता आदि दृश्यसमूहभूत जगत् वास्तवमें कोई वस्तु नहीं है । कभी उत्पन्न न होनेके कारण इसका अस्तित्व है ही नहीं और जिसका अस्तित्व है, वह तो परब्रह्म परमात्मा ही है । यदि स्वप्नमें दिखायी देनेवाला पर्वत अविनाशी हो तो यह जगत् उसीके समान अविनाशी है । यदि स्वप्नमें प्रतीत होनेवाला नगर स्थिर हो तो उसी तरह यह जगत् भी स्थिर है । ( तात्पर्य यह कि जैसे वे अविनाशी और स्थिर नहीं हैं, वही दशा इस जगत्की भी है ।) यदि चित्रकारका चित्त स्थिर हो और उसमें वासनामय स्थिर चित्र बने तो उस चित्रमें कल्पनाद्वारा अङ्कित सेनाके समान ही इस जगत्की आकृति है अर्थात् जैसे उस चित्रमें अङ्कित सेना अस्थिर एवं असत्य है, उसी तरह यह जगत् भी है । आदि-प्रजापतिकी भी, जो स्वयंभू नामसे पहले-पहल विख्यात हुआ, कोई कारण नहीं है; क्योंकि उसके पूर्वजन्मके कर्म शेष नहीं हैं । महाप्रलय होनेपर पूर्वकालके सभी प्रजापति मुक्त हो जाते हैं, अतः उनमें पूर्वजन्मका कर्म कैसे रह सकता है । ब्रह्म ही सबसे प्रथम होनेवाला हिरण्यगर्भ है । वही विराट् है और विराट् ही सृष्टिरूप है । इस तरह वह चिन्मय परमात्मा ही जीवाकाशरूपसे स्थित है, जिससे पृथ्वी आदि सत् प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है । ( तात्पर्य यह कि समस्त जगत् ब्रह्म ही है, ब्रह्मसे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं । )