संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
इस प्रकार ये तीनों लोक सत् आत्माका स्वरूपभूत होने- से सत् हैं, अन्यथा इनका कोई अस्तित्व नहीं है।
चिन्मय परमात्मामें अवयव और अवयवी—इन दोनों शब्दोंके अर्थ खरगोशके सींगकी भाँति असत् हैं। सम्पूर्ण पदार्थ-समूहोंके अधिष्ठानभूत चेतन आकाशमय परमात्मामें इस भूताकाशजनित वायु आदि जगत्रूपी मलकी प्रतीति होती है; परंतु जब असङ्ग भूताकाशसे ही उसके कार्यभूत वायु आदिका सम्बन्ध नहीं है, तब चेतन महाकाश- स्वरूप परमात्मामें इस प्रपञ्चकी सत्ता, असत्ता तथा तू, मैं आदि भावोंके सम्बन्ध कैसे हो सकते हैं? संसारमें जितने कार्य हैं, उन सबके समस्त कारण-समूहोंका आदिकारण ब्रह्मा है। चित्तसे उत्पन्न मनोरथजनित सारे संकल्प-विकल्प असत् होते हैं, अतः चित्त स्वभावसे ही किसीका कारण नहीं है। वह अकारणरूप ही है और वही ब्रह्मा है। यदि हम कहें कि 'चेत्य जगत्के असत् होनेपर चेतन भी असत् हो जायगा; क्योंकि वह अपने स्वरूपभूत चेत्यसे पृथक् नहीं है', तो यह ठीक नहीं। चेतनकी असत्ता तो वाणीमात्रसे भी सिद्ध नहीं की जा सकती; क्योंकि चेतन आत्मा अनुभवसे सिद्ध है। जो है, उसका अवश्य उदय होता है, जैसे बीजसे अङ्कुरका। यह बात प्रत्यक्ष देखी गयी है। (अतः यह सिद्धान्त स्थिर हुआ कि परमात्माकी सत्तासे ही जगत्की सत्ता है, स्वतन्त्र नहीं।)
महर्षि वसिष्ठ जब इतनी बात कह चुके, तब दिन बीत गया। सूर्य अस्ताचलको चले गये। मुनियोंकी वह सभा सायंकालिक नित्यकर्म करनेके लिये स्नान करनेके उद्देश्यसे महर्षिको नमस्कार करके उठ गयी। फिर जब रात बीती, तब प्रातः कालके सूर्यकी किरणोंके साथ-साथ वह मुनिमण्डली पुनः सभामवनमें आकर बैठ गयी। (सर्ग १४)
जगत्के अत्यन्ताभावका प्रतिपादन, मण्डपोपाख्यानका आरम्भ, राजा पद्म तथा रानी लीलाका परस्पर अनुराग, लीलाका सरस्वतीकी आराधना करके वर पाना और रणभूमिमें पतिके मारे जानेसे अत्यन्त व्याकुल होना
जैसे समुद्रके भीतर जलके स्पन्द (हलन-चलन आदि) जलके स्वभावसे च्युत हुए बिना ही लहरोंके वेगके रूपमें प्रकट होते हैं, उसी प्रकार चेतन परमात्मा- में दृश्यजगत्की प्रतीतियाँ होती रहती हैं। जैसे स्वप्न और संकल्प (मनोरथ) में प्रतीत होनेवाले घट-पट आदि पदार्थ अनुभवमें आनेपर भी वास्तवमें हैं नहीं, उसी प्रकार चेतनाकाशरूपी परब्रह्म परमात्मामें दृष्टिगोचर होनेवाले ये पृथ्वी आदि जगत् इन्द्रियोंके अनुभवमें आनेपर भी वास्तवमें हैं नहीं। जैसे मरुभूमि सूर्यकी किरणोंके अन्तर्गत दीखनेवाली जलकी नदी (मृगतृष्णा) में कहीं भी जलका होना सम्भव नहीं है उसी प्रकार इस विज्ञानाकाशस्वरूप जगत्में मूर्तरूप होना कदापि सम्भव नहीं है। जिसमें मूर्त रूपका ग्रहण नहीं होता तथा जो सङ्कल्पकल्पित नगरके समान मिथ्या है, उस जगत्में जो दृश्यताकी प्रतीति होती है, वह मरुमरीचिकामें दृष्टिगोचर होनेवाली नदी- के समान भ्रान्तिरूप ही है। इस जगत्का जो दर्शनीय-सा दृश्य-वैभव है, उसे साक्षिभूत चैतन्यमयी तराजूके एक पलड़ेमें रक्खा जाय और दूसरी ओर स्वप्नको रखकर सार और असारका विवेचन करनेवाली बुद्धिरूप काँटेसे यदि तौला जाय तो वह दृश्य- वैभव स्वप्नकी भाँति कलनारहित (असत्य) होकर आकाशकी भाँति शून्यरूप अथवा चेतनाकाशमय ब्रह्मरूपमें ही स्थित होता है।
अज्ञानियोंकी जो समझ है, उसीमें 'जगत्' शब्दका ब्रह्मसे भिन्न अर्थ भासित होता है। वास्तवमें जगत्,