संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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वासनाओंके क्षयका उपाय और ब्रह्मचिन्तनके अभ्यासका निरूपण
श्रीसरस्वतीजीने कहा —लीले ! यद्यपि स्वप्नावस्थामें स्वप्नके शरीरका अनुभव होता है, तथापि यह स्वप्न है— ऐसा ज्ञान होनेसे जैसे स्वप्न-शरीर वास्तविक नहीं रहता, मिथ्या ठहरता है, उसी तरह यद्यपि इस स्थूल शरीरका पहले अनुभव होता है, तथापि इसे स्वप्नवत् मान लेनेपर वासनाओंका क्षय होनेसे यह भी 'असत्' (बाधित) ही हो जाता है। जैसे स्वप्नके ज्ञानसे स्वप्नावस्थाका शरीर शान्त हो जाता है, उसी प्रकार जाग्रत्-अवस्थाके शरीरको भी स्वप्नवत् समझ लेनेपर वासनाओंके क्षीण होनेसे यह शान्त हो जाता है। जैसे स्वप्न-शरीरका और मनोरथ-कल्पित कल्पनामय शरीरका अन्त होनेपर इस जाग्रत्-शरीरका भान होता है, उसी प्रकार जगद्-भावना (स्थूल शरीरमें अहं-भावना) का अन्त होनेपर आतिवाहिक (सूक्ष्म) शरीरका उदय (अनुभव) होता ही है। जैसे स्वप्नावस्थाके वासनाबीजसे रहित होनेपर सुषुप्ति अवस्था उदित (प्राप्त) होती है, उसी तरह जाग्रत्-अवस्था भी जब वासनाबीजसे रहित हो जाती है, तब जीवन्मुक्तिकी प्राप्ति होती है। जिसमें वासनाएँ सुप्त अथवा विलीन हो जाती हैं, उस प्रगाढ़ निद्राका नाम सुषुप्ति है। जिस अवस्थामें वासनाओंका सर्वथा क्षय हो जाता है, उसे 'तुरीया' कहते हैं। जाग्रत्-अवस्थामें भी परम पदका अनुभव होनेपर (वासनाओंका समूल नाश हो जानेके कारण) तुर्यावस्था होती ही है। जीवित पुरुषोंके जीवनकी वह अवस्था, जिसमें वासनाओंका सर्वथा क्षय हो जाता है, जीवन्मुक्ति कहलाती है। अज्ञानी बद्ध जीव इसका अनुभव नहीं कर पाते।
लीले ! जब पूर्ण अभ्यास करनेसे तुम्हारा यह अहंभाव शान्त हो जायगा, तब तुम्हारी स्वाभाविक चैतन्यरूपता, जो इस दृश्य-प्रपञ्चकी चरम अवधिभूत है, उदित एवं विकसित हो जायगी। जब आतिवाहिकता (शरीरकी सूक्ष्मता) का ज्ञान सदाके लिये स्थायी हो जायगा, तब तुम संकल्पदोषसे रहित पावन लोकोंका साक्षात्कार कर सकोगी। अतः सती साध्वी लीले ! तुम वासनाको क्षीण करनेका प्रयत्न करो। जब तुम्हारी वासना-शून्य स्थिति अत्यन्त दृढ़ हो जायगी, तब तुम जीवन्मुक्त हो जाओगी। जबतक तुम्हारा यह शीतल (शान्तिप्रद) ज्ञानरूपी चन्द्रमा पूर्णताको नहीं प्राप्त हो जाता, तबतक तुम इस शरीरको यहाँ स्थापित करके लोकान्तरोंके दर्शन करो। मैंने तुमसे जो बात कही है, यह बालकोंसे लेकर सिद्ध पुरुषोंतकमें प्रसिद्ध, सबके अनुभवसे सिद्ध एव यथार्थ है। यह शरीर न तो मरता है और न जीता ही है। स्वप्न और संकल्पसम्बन्धी भ्रममें मरण और जीवनकी चर्चा ही क्या है? बेटी ! जैसे मनोरथकल्पित पुरुषमें जीवन और मरण असत्य ही प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार इस स्थूलशरीरमें भी जीवन-मरण मिथ्या ही हैं।
लीला बोली—देवि ! आपने मुझे यहाँ उस निर्मल ज्ञानका उपदेश दिया है, जिसके श्रवणमात्रसे ही दृश्य-रूपी हैजेकी बीमारी शान्त हो जाती है। अब इस विषयमें मेरा एक उपकार और कीजिये। कृपया मुझे यह बताइये कि वह अभ्यास क्या है, कैसा है, अथवा कैसे वह पुष्ट होता है और उसके पुष्ट हो जानेपर क्या होता है।
श्रीसरस्वतीजीने कहा—बेटी ! जिस पुरुषके द्वारा जिस-जिस साधनसे जब-जब जो भी कार्य किया जाता है, वह अभ्यासके बिना कभी सिद्ध नहीं होता। सच्चिदानन्दघन परमात्माका चिन्तन करना, जिज्ञासुओंके प्रति उसका वर्णन करना, आपसमें एक-दूसरेको ब्रह्मके तत्त्वका बोध कराते रहना तथा उस एकमात्र ब्रह्मके ही परायण हो जाना—इसे ही विद्वान् लोग ब्रह्मविषयक अभ्यास समझते हैं। जो विरक्त महात्मा पुरुष मुक्तिके लिये अपने अन्तःकरणमें भोग-वासनाओंके क्षीण होनेकी भावना करते