संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
चित्तके द्वारा उस उत्तम आकाशमय लोकमें चली जाऊँगी। परंतु आप अपने इसी शरीरसे वहाँ कैसे जायेंगी ?
देवी सरस्वतीने कहा—बेटी ! जैसे तुम्हारा संकल्परूपमय आकाश, वृक्ष आदि सांकल्पिक सत्तासे सत् होता हुआ भी वास्तवमें शून्यरूप ही है, उसी तरह शुद्ध सत्त्वगुणका कार्यभूत जो मेरा शरीर है, यह चेतन परमात्माका ही प्रकाश है—इसके रूपमें चेतन परमात्मा-की ही प्रतीति होती है। अतः इसका उससे भेद नहीं है। ऐसा जो मेरा यह दिव्य शरीर है, इसका त्याग करके मैं नहीं जाऊँगी। जैसे वायु गन्धको प्राप्त होती है, उसी तरह मैं इसी शरीरसे ब्राह्मण-ब्राह्मणीके उस देशमें पहुँच सकती हूँ। भद्रे ! ये देह आदि परब्रह्मसे परिपूर्ण होकर ही स्थित हैं, अतः अपनी उत्कृष्ट महिमामें स्थित परब्रह्म ही हैं। इस सत्यको हमलोग बिना किसी विघ्न-बाधाके देखते हैं, किंतु तुम ऐसा नहीं देखती (क्योंकि तुम्हें अभी दृढ़ तत्त्वज्ञान नहीं हुआ है)।
जैसे सुवर्णमें कटकत्व, जलमें तरङ्गत्व और स्वप्नके नगर एवं संकल्प-कल्पित पुर आदिमें सत्यत्व नहीं है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दरूप ब्रह्ममें कल्पनातीत अनामय आत्मस्वभावसे पृथक् कोई वस्तु नहीं है। जो कुछ भी यह दृश्य प्रपञ्च भासित हो रहा है, वह सब ब्रह्मका ही निर्मल विकास है। जैसे परम उत्तम चन्द्रकान्तमणिकी भ्रमवश काचके समान प्रतीति होती है, वैसे ही ब्रह्मके विशुद्ध विकासकी भ्रान्तिवश दृश्यरूप-से प्रतीति हो रही है।
लीलाने पूछा—देवि ! कृपया यह बताइये कि इतने दीर्घकालसे किसने हमलोगोंको द्वैत और अद्वैतके द्विविध विकल्पोंद्वारा भ्रममें डाल रखा है।
श्रीसरस्वतीजीने कहा—चञ्चले ! तुम चिरकालसे अविचारद्वारा व्याकुल होकर भटक रही हो। अविचार स्वभावसे उत्पन्न होता है और विचारसे उसका नाश हो जाता है। विचारद्वारा अविचारका पलक मारते-मारते नाश हो जाता है। यह अविचाररूप अविद्या विचार या विवेकसे बाधित होकर ब्रह्मसत्ता हो जाती है—ब्रह्मके सत्-स्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये अविद्याका अस्तित्व नहीं है। अतः न तो कहीं अविचार है न अविद्या है, न बन्धन है और न मोक्ष ही है। यह जगत् शुद्ध बोधस्वरूप (चिन्मय ब्रह्म) ही है। चूँकि इतने समयतक तुमने इसका विचार नहीं किया, इसलिये तुम्हें बोध नहीं हुआ। तुम भ्रान्त एवं व्याकुल ही बनी रह गयीं। आजसे तुम्हारे चित्तमें वासनाका क्षयरूप बीज पड़ गया है। इसलिये अब तुम विवेकशालिनी, प्रबुद्ध एवं विमुक्त हो। एकमात्र ब्रह्मके चिन्तनरूप उत्तम निर्विकल्प समाधिके मनमें आरूढ़ होनेपर जब द्रष्टा, दृश्य और दृष्टिका अत्यन्ता-मात्र हो जायगा तथा हृदयमें यह वासना-क्षयरूप बीज कुछ अङ्कुरित हो जायगा, तब राग-द्वेष आदि दृष्टियाँ क्रमशः उदित नहीं होंगी, संसारकी उत्पत्ति भी निर्मूल हो जायगी और निर्विकल्प समाधि पूर्णतः स्थिरताको प्राप्त होगी। इस तरह निर्विकल्प समाधिके स्थिर होने-पर कुछ कालके अनन्तर मायाकाश और उसके कार्योंके अधिष्ठान-स्वरूप निर्मल आत्माके साक्षात्कारसे तुम भ्रान्ति-ज्ञानरूप कालिमाके कलङ्कसे शून्य होकर सम्पूर्ण प्राणियोंकी भ्रान्तियोंका, उनकी कार्यभूत वासनाओंका और उनकी कारणभूत अविद्याका जहाँ अन्त हो जाता है, उस मोक्षरूप परम पुरुषार्थमें प्रतिष्ठित हो जाओगी।
(सर्ग २१)