संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * लीला और सरस्वतीका संवाद—सब कुछ ब्रह्म ही है, इसका प्रतिपादन * १२७
भी कहीं कभी कुछ भी उदित नहीं हुआ, केवल चिन्मय आकाशरूप परमात्मा ही स्थित है।
इस तरह विचार करनेसे यह सिद्ध हुआ कि कभी कुछ उत्पन्न नहीं हुआ। जो कुछ जगत् आदि दृश्यरूपसे प्रतीत होता है, वह भी चिन्मय परमात्मा ही है। केवल चेतन आकाशरूप ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है।
लीला बोली—देवि ! जैसे प्रातःकालकी प्रभासे जगत्की रूप-सम्पत्ति सुस्पष्ट दिखायी देने लगती है, उसी प्रकार आपने मुझे यह बहुत ही उत्तम और अद्भुत दृष्टि प्रदान की है। इस समय जबतक मैं तीव्र अभ्यास न होनेके कारण इस दृष्टिमें सुदृढ़ स्थिति नहीं प्राप्त कर लेती, तबतक आप अपने उपदेशद्वारा इस दृश्यकौतुकका—इस संसारका बाध करती रहें। देवि ! वह ब्राह्मण अपनी ब्राह्मणीके साथ पूर्वसृष्टिके जिस गाँव और घरमें रहता था, उस सृष्टिके उसी पर्वतीय ग्राममें आप मुझे ले चलिये। मैं उसे देखना चाहती हूँ।
श्रीसरस्वतीजीने कहा—लीले ! चेत्यरहित चिन्मय परमात्मरूप जो परम पावन दृष्टि है, उसका अवलम्बन करके तुम इस आकारका—इस देहके अभिमानका त्यागकर निर्मल हो जाओ। ( तात्पर्य यह कि पूर्वसृष्टिकी उस वस्तुको देखनेके लिये इस शरीरको भूल जाना आवश्यक है।) इस प्रकार जब तुम देहाभिमानरूप मलसे रहित हो जाओगी, तब हम दोनों साथ-साथ रहकर बिना किसी रुकावटके उस सृष्टिको देखेंगे। यह शरीर उस सृष्टिके दर्शनरूपी गृहद्वारके लिये एक सुदृढ़ अर्गला ( रुकावट ) के रूपमें स्थित है।
बेटी ! ये तीनों लोक मायामय होनेके कारण अमूर्त हैं। मिथ्या आग्रह या अज्ञानके कारण ये तुम्हें मूर्तिमान् प्रतीत होते हैं, जैसे सुवर्णको लोग अँगूठीके रूपमें देखते हैं। जैसे अँगूठीका रूप धारण करनेवाले सुवर्णमें अँगूठीपना नहीं है, उसी प्रकार जगत्का रूप धारण किये हुए ब्रह्ममें जगत् नहीं है। यह जगत् आकाशकी भाँति शून्य ही है; इसके रूपमें यहाँ जो कुछ दिखायी देता है, वह ब्रह्म ही है। ब्रह्ममें भ्रमवश माया दृष्टिगोचर होती है। यह सारा प्रपञ्च झूठा ही है। केवल अद्वितीय ब्रह्म ही, जिसका अहं ( आत्मा )-रूपसे अनुभव होता है, परमार्थ सत्य है। इस विषयमें उपनिषदोंके वाक्य, गुरुजनोंके उपदेश और अपना अनुभव प्रमाण है। जो ब्रह्म है, वही ब्रह्मको देखता है। जो ब्रह्म नहीं है, वह कदापि ब्रह्मको नहीं देख सकता। ब्रह्मका ही जो ऐसा स्वभाव है ( जो उसकी आवृत्त सत्ता है ), वही सृष्टि आदिके नामसे प्रसिद्ध है। जबतक अभ्यासयोगके द्वारा तुम्हारी भेदबुद्धि शान्त नहीं हो जाती, तबतक अब्रह्मरूप होनेके कारण निश्चय ही तुम ब्रह्मको नहीं देख सकती। ब्रह्मज्ञानका बारंबार अभ्यास करनेके कारण ब्रह्ममें अद्वैतभावसे जिनकी दृढ़ स्थिति हो गयी है, ऐसे हमलोग ही उस परमपदका साक्षात्कार करते हैं। जब अपने संकल्प ( मनोरथ ) से निर्मित हुआ नगर भी अपने इस शरीरसे प्राप्त नहीं हो सकता, तब दूसरेके संकल्पसे निर्मित नगरको दूसरा शरीर कैसे प्राप्त करेगा। अतः कार्यको समझनेवाली स्त्रियोंमें श्रेष्ठ लीले ! तुम इस देहाध्याससे रहित होकर चेतन ब्रह्ममय आकाशरूपिणी हो जाओ। तब तत्काल ही उस ग्रामका दर्शन करोगी। अतः शीघ्र वही कार्य करो।
लीलाने कहा—देवि ! आपने कहा है कि ब्राह्मण और ब्राह्मणीके जगत्में हम दोनों साथ-साथ चलेंगी; परंतु माताजी ! मैं यह पूछती हूँ कि हम दोनोंका साथ-साथ चलना कैसे हो सकता है। मैं तो इस शरीरको यहीं स्थापित करके शुद्ध सत्त्वका अनुसरण करनेवाले