भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१२६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

है । उसके मनमें जो शरीर स्थित होता है अर्थात् उसमें जैसे शरीरका संस्कार रहता है, उसी या वैसे ही इस शरीरको वह आत्मीयभावसे देखता है । उसे जान पड़ता है कि 'मैं इस पिताका पुत्र हूँ। इतने वर्षोंकी मेरी अवस्था हो गयी । ये मेरे मनोरम भाई-बन्धु हैं। यह मेरा रमणीय घर है । जब मेरा जन्म हुआ, तब मैं बालक था और अब बढ़कर ऐसा हो गया हूँ।'

स्वप्नमें द्रष्टा और दृश्यरूपसे जो विभिन्न पदार्थ कल्पित होते हैं, उन सबमें अदृश्यरूपसे जो चेतन स्थित होता है, वही उन स्वप्नगत पदार्थोंका बाध होनेपर एक-रस चेतनरूपसे पुनः दृष्टिगोचर ( अनुभवका विषय ) होता है। अतः कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ था—बिना उत्पन्न हुए ही स्वप्नावस्थामें उन वस्तुओंके दर्शन हुए थे ।

इस तरह जैसे स्वप्नमें वह चेतन ही द्रष्टा, दृश्य आदिके रूपमें उदित होता है, उसी प्रकार परलोकमें भी उदित होता है और जैसे परलोकमें उदित होता है, उसी तरह इस लोकमें भी वह चेतन ही द्रष्टा, दृश्य आदिके रूपमें आविर्भूत होता है। इसलिये स्वप्न, परलोक और इहलोक—इनमें थोड़ा-सा भी भेद नहीं है । ये सब-के-सब असत् होते हुए भी भ्रमवश सत्-से प्रतीत होते हैं—ठीक उसी तरह जैसे जलमें उठनेवाली तरङ्गोंका एक दूसरेसे भेद नहीं होता और वे सब असत् होती हुई ही सत्-सी प्रतीत होती हैं । चूँकि जलमें लहरोंके समान चेतनमें ही यह जगत् भ्रमवश प्रतीत हो रहा है, अतः यह कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ—यह सिद्धान्त स्थिर हुआ ।

( सर्ग २० )


लीला और सरस्वतीका संवाद—सब कुछ चिन्मात्र ब्रह्म ही है, इसका प्रतिपादन

श्रीसरस्वतीजीने कहा—जैसे आँख खोलनेपर प्राणीको सारे रूप अच्छी तरह दिखायी देने लगते हैं, उसी प्रकार मृत्युरूपी मूर्च्छाके दूर होनेपर जीवको शीघ्र ही सम्पूर्ण लोकोंका पूर्णतः भान होने लगता है । जैसे स्वप्नमें अपनेको अपने ही मरणकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार जीवको, संसारमें जिसका अनुभव या दर्शन नहीं हुआ है, ऐसा कार्य भी इस तरह तत्काल याद आने लगता है कि इसे मैंने किया है। चिन्मय आकाशरूप परमात्माके भीतर मायारूपी आकाशमें इस तरहकी अनन्त भ्रान्तियाँ भासित होती हैं । यह जगत् नामकी नगरी जो बिना दीवालके ही प्रतीत होती है, वास्तवमें कल्पनामात्र है ( सत्य नहीं ) । यह जगत्, यह सृष्टि इत्यादि रूपसे स्मृति ( वासना ) ही विस्तार-को प्राप्त हो रही है । कृशाङ्गी लीले ! यह त्रिभुवन आदि दृश्य-प्रपञ्च कुछ लोगोंके अनुभवमें आकर उनकी स्मृतिमें स्थित है और कुछ लोगोंके अनुभवमें आये बिना ही उनकी स्मृतिमें विद्यमान है । विश्वका अत्यन्त विस्मृत हो जाना ही मोक्ष कहलाता है । उस अवस्थामें किसीके लिये भी कोई प्रिय और अप्रिय नहीं रह जाते । अहंता और जगत्की आधारभूत अविद्याका अत्यन्त अभाव हुए बिना मोक्ष स्वाभाविक रूपसे विद्यमान होता हुआ भी उदित नहीं होता । जैसे रज्जुमें जो सर्पका भ्रम होता है, वह वास्तविक नहीं है; तो भी जबतक उसमें 'सर्प' शब्द और उसके अर्थकी सम्भावनाका पूर्णरूपसे बाध नहीं हो जाता, तबतक वह शान्त होनेपर भी शान्त नहीं होता । यह जो विशाल संसार है, परब्रह्म ही है—यह निश्चित सिद्धान्त है । अविद्याका अभाव हो जानेपर भी यदि अनुवृत्तिवश इसकी प्रतीति होती है तो उसे प्रतीतिमात्र ही समझना चाहिये । वह वास्तवमें नहीं है ( जैसे स्वप्नसे जागनेपर स्वप्नके संसारकी आकृति प्रतीत हो तो भी वह मिथ्या ही है, वास्तविक नहीं ) । इसी प्रकार जगत्के उदित होनेपर