भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीला और सरस्वतीका संवाद—जगत्‌की असत्ता एवं अजातवादकी स्थापना * १२५


कहाँ ब्राह्मणका जीव अपने घरमें है और कहाँ इतने बड़े विशाल प्रदेशमें हमलोग स्थित हैं। (फिर वे ब्राह्मण-दम्पति और हमलोग एक कैसे हो सकते हैं?) मेरे स्वामी जहाँ स्थित हैं वैसा वह दूसरा लोक, वह विस्तृत भूमि, वे विशाल पर्वत और वे दसों दिशाएँ एक घरके भीतर कैसे प्रतीत हो सकती हैं ? सर्वेश्वरेश्वरि ! यदि कोई कहे कि एक सरसोंके दानेके भीतर मतवाला ऐरावत हाथी बँधा हुआ है, परमाणुके भीतर बैठे हुए एक मच्छरने सिंह-समूहोंके साथ युद्ध किया, सुमेरु पर्वत कमलगड्ढेके भीतर रक्खा हुआ है तो जैसे ये सारी बातें असम्भव होनेके कारण असमञ्जस प्रतीत होती हैं—ठीक नहीं लगतीं, उसी प्रकार उस घरके अन्दर ये विशाल भूलोक और पर्वत हैं, यह कथन भी असम्भव एवं असंगत ही जान पड़ता है।

देवी सरस्वती बोलीं—सुन्दरि ! मैं यह झूठ नहीं कह रही हूँ। तुम ध्यान देकर यथावत् रूपसे इस विषयको सुनो। दूसरोंके द्वारा तोड़ी जानेवाली धर्मकी जिस मर्यादाको मैं स्वयं ही स्थापित करती हूँ, उसीका यदि मैं भेदन करूँ तो दूसरा कौन पालन करेगा ? उस पर्वतीय गाँवके ब्राह्मणका वह जीवात्मा अपने उसी घरके आकाशमें चिदाकाशरूप होकर ही इस कल्पित महान् राष्ट्रको देख रहा है। कल्याणि ! जैसे स्वप्नमें जाग्रत्‌कालकी स्मृति लुप्त हो जाती है और दूसरी स्मृति उदित होती है, उसी प्रकार तुम दोनोंकी पूर्वजन्मकी स्मृति नष्ट हो गयी है और उससे विपरीत दूसरी स्मृति उदित हुई है। यही उस शरीरका मरण है। जैसे स्वप्नमें तीनों लोकोंका दीखना, संकल्पमें त्रिलोकीका उदय होना तथा मरु-मरीचिकामें जलका होना असत्य हैं, फिर भी वहाँ उन वस्तुओंकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार ब्राह्मणके घरके भीतर पर्वत, वन और नगरोंसहित भूमिका होना यद्यपि असत् है तो भी वहाँ इन सबकी प्रतीति होती है। जो असत्यसे उत्पन्न हुआ है, वह असत् है, जो स्मृतिसे उत्पन्न हुआ है, वह भी असत् है—जैसे मृगतृष्णाकी नदीमें जलका होना मिथ्या है; फिर उस जलमें जो तरङ्गकी प्रतीति होती है, वह सत् कैसे हो सकती है !

बेटी ! उस पर्वतीय गृहके आकाशरूपी कोशमें स्थित तुम्हारा जो यह घर है तथा जो मैं हूँ और तुम हो—यह सब कुछ तुम केवल चिन्मय आकाशरूप ब्रह्म ही समझो। इस विषयको स्पष्टरूपसे समझने और समझानेके लिये स्वप्न, भ्रम, संकल्प और अपने-अपने अनुभवकी परम्पराएँ ही मुख्य प्रमाण (उदाहरण) हैं। ब्राह्मणके उस पर्वतीय घरके भीतर उस ब्राह्मणका जीव है। उस जीवाकाशमें (अर्थात् उस जीवात्माके संकल्पमें) समुद्र और वनोंसे परिपूर्ण यह पृथ्वी है। कृशाङ्गि ! उस ब्राह्मणके घरके भीतर इस नूतन सृष्टिमें जो यह नगर निर्मित हुआ है, यह यद्यपि मनमें बैठ गया है, तथापि ब्राह्मणका वह पहला घर आज भी मौजूद ही है—नष्ट नहीं हुआ। जैसे इस जगत्-सृष्टिकी प्रतीति आभासमात्र है, उसी प्रकार क्षण, कल्प आदिकी प्रतीति भी आभास-मात्र ही है, वास्तविक नहीं। परमात्मामें जो तू-मैं इत्यादि भावोंका अध्यास है, उसके अधीन जो अपने जन्मका भ्रम होता है, ऐसा भ्रम जिन लोगोंको है, उन्हीं पुरुषोंको क्षण, कल्प आदि सम्पूर्ण जगत्‌की प्रतीति होती है।

उत्तम व्रतका पालन करनेवाली लीले ! मरणकालकी मिथ्याभूत मूर्च्छाका अनुभव करके जब जीव पूर्वजन्मके सभी भावोंको भुला देता और दूसरे नूतन भावको देखने या अनुभव करने लगता है, तभी वह पलक मारते-मारते मनमें यह स्मरण करने लगता है कि मैं आधेय हूँ और इस आधारमें स्थित हूँ। यद्यपि वह उस समय (चेतन) आकाश (परमात्मा) में आकाश (चिदाकाश जीवात्मा)-रूपसे ही स्थित होता है (इसलिये उसमें आधाराधेय-भावकी कल्पना मिथ्या ही है), तथापि उसके चित्तमें वैसा संस्कार प्रकट होता है। उसे यह भान होता है कि हाथ, पैर आदि अवयवोंसे युक्त यह शरीर मेरा ही

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