संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
भूमण्डलपर विजय प्राप्त कर ली। उसका प्रताप स्वर्ग-लोकतक फैल गया और उसने कृपा करके पाताललोकका भी पालन किया। इस प्रकार वह त्रिलोकविजयी नरेश हो गया। वह याचकोंको मुँहमॉँगा दान देनेके लिये कल्पवृक्षके समान था, धर्मरूपी चन्द्रमाके पूर्ण विकासके लिये पूर्णिमाकी रात्रिके सदृश था। उधर उस ब्राह्मणके मृत्युमुखमें पहुँच जानेपर उसकी पत्नी ब्राह्मणी शोकसे अत्यन्त कृश हो गयी। उड़दकी सूखी छीमीके समान उसके हृदयके दो टुकड़े हो गये। पतिके साथ ही मरकर अपने शरीरको दूर छोड़ वह आतिवाहिक देह (मानस-शरीर) के द्वारा पतिके पास जा पहुँची। जैसे नदी गर्तमें गिरती है, उसी प्रकार पतिका अनुसरण करके उनके पास जा वह वासन्ती लताके समान शोक-रहित हो गयी। उस पर्वत ग्राममें मरे हुए इस ब्राह्मणके घर हैं, भूमि-वृक्ष आदि स्थावर सम्पत्तियाँ हैं तथा मृत्युके बादसे उसका जीव उस पर्वतीय ग्रामके गृह-मण्डपमें विद्यमान है।
(सर्ग १८-१९)
लीला और सरस्वतीका संवाद—जगत्की असत्ता एवं अजातवादकी स्थापना
देवी सरस्वती ने कहा—कल्याणि ! वही ब्राह्मण अब राजा होकर तुम्हारा पति हुआ है और जो अरुन्धती नामवाली ब्राह्मणी थी, वह तुम हो। तुम्हीं दोनों सुन्दर दम्पति यहाँपर राज्य करते हो। तुम्हारे पूर्वजन्मका यही सारा सृष्टिक्रम है, जिसे मैंने कह सुनाया। ब्रह्मरूप आकाशमें जीवभावकी भ्रान्ति होनेसे ही यह सब कुछ प्रतीत होता है। इसलिये कौन सृष्टि भ्रमरूप है और कौन भ्रमसे रहित है ? सुतरां सारी सृष्टि ही अनर्गल अनर्थ-बोधके सिवा दूसरा कुछ नहीं है।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! देवी सरस्वतीका यह वचन सुनकर लीलाके सुन्दर नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। वह इस प्रकार बोली।
लीलाने कहा—देवि ! आपकी बात तो सत्य ही होगी। मैं उसे मिथ्या कहनेका साहस नहीं कर सकती; परंतु ऐसी विरुद्ध बात कैसे सम्भव हो सकती है ?