संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाका सरस्वतीसे कृत्रिम और अकृत्रिम सृष्टिके विषयमें पूछना * १६३
विद्या, विभव और चेष्टाओंकी दृष्टिसे साक्षात् वसिष्ठ मुनिके समान थे। उनका नाम भी वसिष्ठ ही था। उन्हें चाँद-जैसी भार्या प्राप्त थी, जिसका नाम अरुन्धती था। एक दिन उन ब्रह्मर्षिने, जो उस पर्वतके शिखरपर हरी-हरी घासोंसे ढकी हुई समतल भूमिपर बैठे हुए थे, नीचे एक राजाको देखा, जो अपने सारे परिवारके साथ शिकार खेलनेकी इच्छासे जा रहे थे। वे अपनी उस विशाल सेनाके महान् घोषसे मानो मेरु पर्वतको भी विदीर्ण कर देना चाहते थे। उस सेनाके महान् कोलाहलसे दिग्भ्रम-सा हो जानेके कारण सभी दिशाओंके प्राणियोंके समुदाय भाग रहे थे—जलके भँवरके समान एक-एक स्थानपर चक्कर काट रहे थे। उन भूपालको देखकर ब्राह्मणने मन-ही-मन यह विचार किया—'अहो ! राजाका पद बड़ा
ही रमणीय है। उस पदपर प्रतिष्ठित मनुष्य सम्पूर्ण सौभाग्योंसे उद्भासित हो उठता है। कब ऐसा समय आयेगा जब कि मैं भी पैदल, रथ, हाथी और घोड़ोंसे
संकुल चतुरंगिणी सेना, पताका, छत्र और चँवरसे सम्पन्न हो दस दिशारूपी कुञ्जोंको परिपूर्ण करनेवाला राजा होऊँगा।' उसी दिनसे ब्राह्मणके मनमें इस तरहका संकल्प होने लगा। वे जबतक जीवित रहे, प्रतिदिन आलस्य छोड़कर स्वधर्म-पालनमें लगे रहे। तत्पश्चात् उनके शरीरको जर्जर बना देनेके लिये जर्जरित अङ्गवाली जरावस्था बड़े आदरके साथ उन ब्राह्मण देवताके पास आयी। जब वे मृत्युके निकट पहुँच गये, तब उनकी पत्नीको बड़ी चिन्ता हुई। उस कल्याणमयी ब्राह्मणपत्नीने तुम्हारी ही भाँति मेरी आराधना की। अमरत्वको अत्यन्त दुर्लभ मानकर उसने मुझसे यह वर माँगा—'देवि !
मरनेपर मेरे पतिका जीव अपने मण्डपसे बाहर न जाय।' अतः मैंने उसके उसी वरको स्वीकार कर लिया। तदनन्तर कालवश ब्राह्मणका शरीर छूट गया। फिर उसी घरके आकाशमें वह ब्राह्मणका जीवात्मा स्थित रहा। पूर्व-जन्मके सुदृढ़ एवं महान् संकल्पसे वह ब्राह्मणीका पति स्वयं सर्वशक्तिशाली राजा बन गया। उसने अपने प्रभावसे