संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
धारण करके सामने आ गयी हैं। तब लीला परमार्थ-महाशक्तिस्वरूपा देवीको सिंहासनपर विराजमान करके स्वयं उनके सामने पृथ्वीपर खड़ी हो गयी और इस प्रकार पूछने लगी।
लीलाने कहा—परमेश्वरि ! मैं आपके सामने विनम्र होकर जो कुछ पूछ रही हूँ, उसे बताइये। यह त्रिलोकीका प्रतिबिम्ब-वैभव बाहर भी स्थित है और भीतर भी। इनमेंसे कौन कृत्रिम (झूठा) है और कौन अकृत्रिम (सच्चा) ? देवि अम्बिके ! जैसे मैं यहाँ खड़ी हूँ और आप यहाँ बैठी हैं, देवेश्वरि ! इसीको मैं सच्ची सृष्टि समझती हूँ। परंतु जहाँ इस समय मेरे पतिदेव विराजमान हैं, उस सृष्टिको मैं कृत्रिम समझती हूँ; क्योंकि वह सूना है। उससे देश, काल और व्यवहारकी पूर्ति (सिद्धि) नहीं होती।
देवीने कहा—बेटी ! अकृत्रिम सृष्टिसे कदापि कृत्रिम सृष्टि नहीं उत्पन्न होती। कहीं भी कारणसे विलक्षण (सर्वथा भिन्न) कार्यका उदय नहीं होता।
लीलाने कहा—माताजी ! मुझे तो कारणसे कार्य सर्वथा विलक्षण दिखायी देता है। मिट्टीका लोंदा जल धारण करनेमें असमर्थ है; किंतु उसीसे उत्पन्न हुआ घड़ा जलका आधार बन जाता है।
देवीने कहा—सुमुखि ! बताओ तो सही—इस सृष्टिके अन्तर्गत जो पृथ्वी आदि तत्त्व हैं, उनमेंसे कौन-सा तत्त्व तुम्हारे पतिकी सृष्टिका कारण है ?
लीला बोली—देवि ! मेरे पतिकी वह स्मृति ही उस रूपमें वृद्धिको प्राप्त हुई है, अतः मैं स्मृतिको ही उस सृष्टिका कारण समझती हूँ। उसीसे यह सृष्टि हुई है, ऐसा मेरा निश्चय है।
देवीने कहा—अबले ! स्मृति तो आकाशकी भाँति शून्यरूप है। जैसे स्मृति शून्य है, उसी प्रकार उससे उत्पन्न तुम्हारे पतिकी सृष्टि भी शून्य ही है। वह उस रूपमें अनुभवमें आनेपर भी शून्यके अतिरिक्त कुछ नहीं है।
लीलाने कहा—देवि ! जैसे आपने मेरे पतिकी सृष्टिको स्मृतिमात्र—शून्यरूप बताया है, उसी तरह मैं इस सृष्टिको भी स्मृतिमात्र एवं शून्यरूप ही समझती हूँ। समाधिमें देखी गयी वह सृष्टि ही मेरी ऐसी मान्यतामें उदाहरण है।
देवीने कहा—बेटी ! ठीक ऐसी ही बात है। वह सृष्टि असत् होनेपर भी (उसका आश्रयभूत चेतन आत्मा ही) तुम्हारे पतिके उन-उन भावोंसे उस रूपमें प्रकाशित होता है। इसी तरह यहाँ यह सृष्टि भी मिथ्या ही है (तथापि उसका आश्रय-भूत चेतन आत्मा) जीवके विभिन्न भावोंके अनुसार इस रूपमें भासित होता है।
लीला बोली—देवि ! जैसे इस सृष्टिसे मेरे पतिकी भ्रमरूप अमूर्त सृष्टि हुई, वह प्रकार मुझे बताइये; जिससे मेरा यह जगत्रूपी भ्रम दूर हो जाय।
देवीने कहा—जिस प्रकार पूर्व सृष्टिकी स्मृतिसे उत्पन्न हुई यह भ्रमरूपिणी सृष्टि खम-भ्रमके तुल्य प्रतीत होती है, उस प्रकार मैं तुमसे इस विषयका प्रतिपादन करती हूँ, सुनो। चिन्मय आकाशमें कहीं (अज्ञानसे आवृत भागमें और उसके भी) किसी एक देशमें (विधाताके अन्तःकरणके एक अंशमें) संसाररूपी मण्डप है, उस मण्डपके किसी एक आकाशरूपी कमरेके भीतर एक कोनेमें पर्वतरूपी मिट्टीके ढेलेके नीचे एक छोटा-सा गढ्ढा है, जो पर्वतसम्बन्धी छोटा-सा गाँव है। नदी, पर्वत और वनोंसे घिरे हुए उस ग्रामके भीतर एक धर्मपरायण नीरोग अग्निहोत्री ब्राह्मण अपने स्त्री-पुत्रोंके साथ रहते थे। उन्हें वहाँ गायका दूध सुलभ था। वे राजाके भयसे सर्वथा मुक्त थे तथा वहाँ आनेवाले सभी प्राणियोंका वे आतिथ्य-सत्कार करते थे।
बेटी ! वे ब्राह्मण धन-सम्पत्ति, वेश-भूषा, अवस्था, कर्म,