संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाका सरस्वतीसे कृत्रिम और अकृत्रिम सृष्टिके विषयमें पूछना * १२१
जाग उठा और क्रमशः सब लोग अपने-अपने सर्वस्व-भूत कार्य-कलापमें जुट गये। जैसे सूर्यकी किरणें लोगोंको अपने-अपने व्यवहारमें लगानेके लिये पृथ्वीपर आती हैं, वैसे ही समूह-के-समूह छड़ीदार राजसेवक पुरवासी सभासदोंको बुलानेके लिये चारों ओर चल दिये। दूसरे-दूसरे सेवक आदरपूर्वक सभाभवनकी उसी तरह सफाई करने लगे, जैसे शरद्-ऋतुके दिन मेघोंसे मलिन हुए आकाशको स्वच्छ कर देते हैं। जैसे महाप्रलयके बाद जब त्रिलोकीकी पुनः सृष्टि होती है, तब सारे लोकपाल अपनी-अपनी दिशाओंमें अधिष्ठित हो जाते हैं, उसी तरह निर्दोष मन्त्री और सामन्तगण उस सभाभवनमें अपने-अपने स्थानपर आ बैठे। राजाके सिंहासनके पास ही रानी लीला एक नूतन सुवर्णमय विचित्र आसनपर विराजमान हुई। उसने पहलेकी ही भाँति यथास्थान बैठे हुए पूर्वपरिचित समस्त नरेशों, गुरुजनों, श्रेष्ठ पुरुषों, मित्रों, सदस्यों, सुहृदों, सम्बन्धियों और बन्धु-बान्धवोंको देखा। राजाके राष्ट्रमें निवास करनेवाले सभी लोगोंको वहाँ पूर्ववत् ही देखकर रानीको बड़ी प्रसन्नता हुई। (सर्ग १७)
लीलाका सरस्वतीसे कृत्रिम और अकृत्रिम सृष्टिके विषयमें पूछना और सरस्वतीका इस विषयको समझानेके लिये लीलाके जीवनसे मिलते-जुलते एक ब्राह्मण-दम्पतिके जीवनका वृत्तान्त सुनाना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर रानी लीला सभाभवनसे उठ गयी और अन्तःपुरमें प्रवेश करके रनिवासके पूर्वोक्त मण्डपमें फूलोंसे ढके हुए पतिके पास जा पहुँची तथा मन-ही-मन इस प्रकार विचार करने लगी—'अहो ! यह तो बड़ी विचित्र माया है। ये हमारे पुरवासी मनुष्य इस बाह्य प्रदेशमें और उस अन्तर-देशमें भी विद्यमान हैं। ताल, तमाल और हिंताल आदि वृक्षोंसे घिरे हुए ये पर्वत जैसे वहाँ हैं, उसी तरह यहाँ भी हैं। यह बड़ी ही आश्चर्यजनक माया फैली हुई है। जैसे दर्पणमें पर्वत उसके भीतर और बाहर भी स्थित प्रतीत होता है, उसी प्रकार चेतन-आकाशरूपी दर्पणमें भीतर और बाहर भी यह सृष्टि प्रतीत हो रही है। उनमेंसे कौन सृष्टि भ्रान्तिमयी है और कौन वास्तविक, इस संदेहको मैं वागीश्वरी देवीकी पूजा करके उन्हींसे पूछती हूँ, जिससे उनके उपदेशसे संशयका निवारण हो जाय।' ऐसा निश्चय करके रानीने उस समय देवीका पूजन किया और देखा—देवी सरस्वती कुमारीरूप