भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१२८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


कर्मोंके अनुसार देह-गेह एवं विभवसे सम्पन्न थे।) अनेक राजाओंसे घिरे हुए सभामण्डपमें सिंहासनपर बैठे हुए राजाकी वन्दीजन 'महाराजकी जय हो, हमारे राजाधिराज चिरजीवी हों' इत्यादि कहकर स्तुति करते थे। वे अपने अधीनस्थ जनपद तथा सेनाके कार्यकी देख-भाल करनेमें सादर जुटे हुए थे। पताकारूपिणी मञ्जरियोंसे व्याप्त राजधानीके जिस सुन्दर सभाभवनमें राजा बैठेथे, उसके पूर्व दरवाजेपर असंख्य मुनियों और महर्षियोंकी मण्डली विराज रही थी। दक्षिण द्वारपर असंख्य राजे-महाराजे विद्यमान थे। पश्चिम द्वारपर अगणित सुन्दरी ललनाओंका समूह शोभा पाता था और उत्तर द्वारपर असंख्य रथ, हाथी एवं घोड़ोंकी भीड़ लगी थी। राजाने गुप्तचरकी बातें सुनकर दक्षिण देशके युद्ध-की गतिविधिका निर्णय किया। पंक्तिबद्ध खड़े हुए अगणित भूपालोंकी प्रभासे उस राजभवनका सारा आँगन जगमगा रहा था। यज्ञमण्डपमें वेदमन्त्रोंका उच्चारण करते हुए ब्राह्मणोंकी वेदध्वनिसे श्रेष्ठ वाद्योंका मधुर घोष दब गया था। अनेक सामन्तनरेश आरम्भमें मन्द गतिसे चलनेवाले उत्तम कार्योंमें संलग्न थे। अनेक शिल्पियोंके सरदार वहाँ नाना नगरोंके निर्माणकी तैयारीमें लगे हुए थे। उस समय आकाशस्वरूपा लीला उस आकाशरूपिणी राजसभामें प्रविष्ट हुई। जैसे दूसरेके सङ्कल्पसे निर्मित हुई नगरीको दूसरा नहीं देखता, उसी प्रकार अपने आगे-आगे विचरती हुई लीलाको उस सभामें रहनेवाले लोगोंमेंसे किसीने नहीं देखा। वहाँ उसने अपने उन्हीं सब लोगोंको सभामें बैठे देखा, जो पहले देखे गये थे, मानो वे सब-के-सब राजाके साथ ही एक नगरसे दूसरे नगरमें चले आये हों। जो पहले जहाँपर बैठते थे, वे वहीं बैठे थे। वैसा ही उनका आचरण था। लीला जिन्हें पहले देख चुकी थी, उन्हीं बालकों, उन्हीं मन्त्रियों, उन्हीं सामन्त-नरेशों, उन्हीं विद्वानों, उन्हीं विदूषकों तथा उन्हीं पहले-वाले सेवकोंसे मिलते-जुलते भृत्योंको भी देखा।

तदनन्तर उसने कुछ दूसरे पण्डितों और सुहृदोंको भी देखा, जो सर्वथा नये थे—पहले कभी देखनेमें नहीं आये थे; कुछ व्यवहार भी पहलेसे भिन्न दिखायी दिये। बहुत-से पुरवासी तथा अन्य लोग भी अपरिचित दृष्टिगोचर हुए। पहलेकी सारी जनता और समस्त पुरवासियोंको भी वहाँ देखकर सुन्दरी लीला चिन्ताके वशीभूत हो गयी। वह सोचने लगी—'क्या उस नगरमें रहनेवाले सब-के-सब मर गये।' फिर सरस्वतीदेवीकी कृपासे बोध प्राप्त हुआ। उसकी समाधि टूट गयी और वह क्षणभरमें पहलेके अन्तःपुरमें अवस्थित हो गयी। उसने वहाँ आधीरातके समय सब लोगोंको पूर्ववत् सोते देखा। फिर उसने नींदमें पड़ी हुई सखियोंको उठाया और कहा—'मुझे बड़ा दुःख हो रहा है, अतः तुमलोग सभाभवनमें मुझे स्थान दो। यदि मैं पतिदेवके सिंहासनके पास बैठूँ और समस्त सभासदोंको वहाँ पूर्ववत् उपस्थित देखूँ, तभी जीवित रह सकती हूँ, अन्यथा नहीं।'

रानीके यों कहनेपर सारा-का-सारा राजपरिवार