भारतकोश
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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

१२८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


कर्मोंके अनुसार देह-गेह एवं विभवसे सम्पन्न थे।) अनेक राजाओंसे घिरे हुए सभामण्डपमें सिंहासनपर बैठे हुए राजाकी वन्दीजन 'महाराजकी जय हो, हमारे राजाधिराज चिरजीवी हों' इत्यादि कहकर स्तुति करते थे। वे अपने अधीनस्थ जनपद तथा सेनाके कार्यकी देख-भाल करनेमें सादर जुटे हुए थे। पताकारूपिणी मञ्जरियोंसे व्याप्त राजधानीके जिस सुन्दर सभाभवनमें राजा बैठेथे, उसके पूर्व दरवाजेपर असंख्य मुनियों और महर्षियोंकी मण्डली विराज रही थी। दक्षिण द्वारपर असंख्य राजे-महाराजे विद्यमान थे। पश्चिम द्वारपर अगणित सुन्दरी ललनाओंका समूह शोभा पाता था और उत्तर द्वारपर असंख्य रथ, हाथी एवं घोड़ोंकी भीड़ लगी थी। राजाने गुप्तचरकी बातें सुनकर दक्षिण देशके युद्ध-की गतिविधिका निर्णय किया। पंक्तिबद्ध खड़े हुए अगणित भूपालोंकी प्रभासे उस राजभवनका सारा आँगन जगमगा रहा था। यज्ञमण्डपमें वेदमन्त्रोंका उच्चारण करते हुए ब्राह्मणोंकी वेदध्वनिसे श्रेष्ठ वाद्योंका मधुर घोष दब गया था। अनेक सामन्तनरेश आरम्भमें मन्द गतिसे चलनेवाले उत्तम कार्योंमें संलग्न थे। अनेक शिल्पियोंके सरदार वहाँ नाना नगरोंके निर्माणकी तैयारीमें लगे हुए थे। उस समय आकाशस्वरूपा लीला उस आकाशरूपिणी राजसभामें प्रविष्ट हुई। जैसे दूसरेके सङ्कल्पसे निर्मित हुई नगरीको दूसरा नहीं देखता, उसी प्रकार अपने आगे-आगे विचरती हुई लीलाको उस सभामें रहनेवाले लोगोंमेंसे किसीने नहीं देखा। वहाँ उसने अपने उन्हीं सब लोगोंको सभामें बैठे देखा, जो पहले देखे गये थे, मानो वे सब-के-सब राजाके साथ ही एक नगरसे दूसरे नगरमें चले आये हों। जो पहले जहाँपर बैठते थे, वे वहीं बैठे थे। वैसा ही उनका आचरण था। लीला जिन्हें पहले देख चुकी थी, उन्हीं बालकों, उन्हीं मन्त्रियों, उन्हीं सामन्त-नरेशों, उन्हीं विद्वानों, उन्हीं विदूषकों तथा उन्हीं पहले-वाले सेवकोंसे मिलते-जुलते भृत्योंको भी देखा।

तदनन्तर उसने कुछ दूसरे पण्डितों और सुहृदोंको भी देखा, जो सर्वथा नये थे—पहले कभी देखनेमें नहीं आये थे; कुछ व्यवहार भी पहलेसे भिन्न दिखायी दिये। बहुत-से पुरवासी तथा अन्य लोग भी अपरिचित दृष्टिगोचर हुए। पहलेकी सारी जनता और समस्त पुरवासियोंको भी वहाँ देखकर सुन्दरी लीला चिन्ताके वशीभूत हो गयी। वह सोचने लगी—'क्या उस नगरमें रहनेवाले सब-के-सब मर गये।' फिर सरस्वतीदेवीकी कृपासे बोध प्राप्त हुआ। उसकी समाधि टूट गयी और वह क्षणभरमें पहलेके अन्तःपुरमें अवस्थित हो गयी। उसने वहाँ आधीरातके समय सब लोगोंको पूर्ववत् सोते देखा। फिर उसने नींदमें पड़ी हुई सखियोंको उठाया और कहा—'मुझे बड़ा दुःख हो रहा है, अतः तुमलोग सभाभवनमें मुझे स्थान दो। यदि मैं पतिदेवके सिंहासनके पास बैठूँ और समस्त सभासदोंको वहाँ पूर्ववत् उपस्थित देखूँ, तभी जीवित रह सकती हूँ, अन्यथा नहीं।'

रानीके यों कहनेपर सारा-का-सारा राजपरिवार

उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाका सरस्वतीसे कृत्रिम और अकृत्रिम सृष्टिके विषयमें पूछना * १२१


जाग उठा और क्रमशः सब लोग अपने-अपने सर्वस्व-भूत कार्य-कलापमें जुट गये। जैसे सूर्यकी किरणें लोगोंको अपने-अपने व्यवहारमें लगानेके लिये पृथ्वीपर आती हैं, वैसे ही समूह-के-समूह छड़ीदार राजसेवक पुरवासी सभासदोंको बुलानेके लिये चारों ओर चल दिये। दूसरे-दूसरे सेवक आदरपूर्वक सभाभवनकी उसी तरह सफाई करने लगे, जैसे शरद्-ऋतुके दिन मेघोंसे मलिन हुए आकाशको स्वच्छ कर देते हैं। जैसे महाप्रलयके बाद जब त्रिलोकीकी पुनः सृष्टि होती है, तब सारे लोकपाल अपनी-अपनी दिशाओंमें अधिष्ठित हो जाते हैं, उसी तरह निर्दोष मन्त्री और सामन्तगण उस सभाभवनमें अपने-अपने स्थानपर आ बैठे। राजाके सिंहासनके पास ही रानी लीला एक नूतन सुवर्णमय विचित्र आसनपर विराजमान हुई। उसने पहलेकी ही भाँति यथास्थान बैठे हुए पूर्वपरिचित समस्त नरेशों, गुरुजनों, श्रेष्ठ पुरुषों, मित्रों, सदस्यों, सुहृदों, सम्बन्धियों और बन्धु-बान्धवोंको देखा। राजाके राष्ट्रमें निवास करनेवाले सभी लोगोंको वहाँ पूर्ववत् ही देखकर रानीको बड़ी प्रसन्नता हुई। (सर्ग १७)


लीलाका सरस्वतीसे कृत्रिम और अकृत्रिम सृष्टिके विषयमें पूछना और सरस्वतीका इस विषयको समझानेके लिये लीलाके जीवनसे मिलते-जुलते एक ब्राह्मण-दम्पतिके जीवनका वृत्तान्त सुनाना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर रानी लीला सभाभवनसे उठ गयी और अन्तःपुरमें प्रवेश करके रनिवासके पूर्वोक्त मण्डपमें फूलोंसे ढके हुए पतिके पास जा पहुँची तथा मन-ही-मन इस प्रकार विचार करने लगी—'अहो ! यह तो बड़ी विचित्र माया है। ये हमारे पुरवासी मनुष्य इस बाह्य प्रदेशमें और उस अन्तर-देशमें भी विद्यमान हैं। ताल, तमाल और हिंताल आदि वृक्षोंसे घिरे हुए ये पर्वत जैसे वहाँ हैं, उसी तरह यहाँ भी हैं। यह बड़ी ही आश्चर्यजनक माया फैली हुई है। जैसे दर्पणमें पर्वत उसके भीतर और बाहर भी स्थित प्रतीत होता है, उसी प्रकार चेतन-आकाशरूपी दर्पणमें भीतर और बाहर भी यह सृष्टि प्रतीत हो रही है। उनमेंसे कौन सृष्टि भ्रान्तिमयी है और कौन वास्तविक, इस संदेहको मैं वागीश्वरी देवीकी पूजा करके उन्हींसे पूछती हूँ, जिससे उनके उपदेशसे संशयका निवारण हो जाय।' ऐसा निश्चय करके रानीने उस समय देवीका पूजन किया और देखा—देवी सरस्वती कुमारीरूप

१२२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

धारण करके सामने आ गयी हैं। तब लीला परमार्थ-महाशक्तिस्वरूपा देवीको सिंहासनपर विराजमान करके स्वयं उनके सामने पृथ्वीपर खड़ी हो गयी और इस प्रकार पूछने लगी।

लीलाने कहा—परमेश्वरि ! मैं आपके सामने विनम्र होकर जो कुछ पूछ रही हूँ, उसे बताइये। यह त्रिलोकीका प्रतिबिम्ब-वैभव बाहर भी स्थित है और भीतर भी। इनमेंसे कौन कृत्रिम (झूठा) है और कौन अकृत्रिम (सच्चा) ? देवि अम्बिके ! जैसे मैं यहाँ खड़ी हूँ और आप यहाँ बैठी हैं, देवेश्वरि ! इसीको मैं सच्ची सृष्टि समझती हूँ। परंतु जहाँ इस समय मेरे पतिदेव विराजमान हैं, उस सृष्टिको मैं कृत्रिम समझती हूँ; क्योंकि वह सूना है। उससे देश, काल और व्यवहारकी पूर्ति (सिद्धि) नहीं होती।

देवीने कहा—बेटी ! अकृत्रिम सृष्टिसे कदापि कृत्रिम सृष्टि नहीं उत्पन्न होती। कहीं भी कारणसे विलक्षण (सर्वथा भिन्न) कार्यका उदय नहीं होता।

लीलाने कहा—माताजी ! मुझे तो कारणसे कार्य सर्वथा विलक्षण दिखायी देता है। मिट्टीका लोंदा जल धारण करनेमें असमर्थ है; किंतु उसीसे उत्पन्न हुआ घड़ा जलका आधार बन जाता है।

देवीने कहा—सुमुखि ! बताओ तो सही—इस सृष्टिके अन्तर्गत जो पृथ्वी आदि तत्त्व हैं, उनमेंसे कौन-सा तत्त्व तुम्हारे पतिकी सृष्टिका कारण है ?

लीला बोली—देवि ! मेरे पतिकी वह स्मृति ही उस रूपमें वृद्धिको प्राप्त हुई है, अतः मैं स्मृतिको ही उस सृष्टिका कारण समझती हूँ। उसीसे यह सृष्टि हुई है, ऐसा मेरा निश्चय है।

देवीने कहा—अबले ! स्मृति तो आकाशकी भाँति शून्यरूप है। जैसे स्मृति शून्य है, उसी प्रकार उससे उत्पन्न तुम्हारे पतिकी सृष्टि भी शून्य ही है। वह उस रूपमें अनुभवमें आनेपर भी शून्यके अतिरिक्त कुछ नहीं है।

लीलाने कहा—देवि ! जैसे आपने मेरे पतिकी सृष्टिको स्मृतिमात्र—शून्यरूप बताया है, उसी तरह मैं इस सृष्टिको भी स्मृतिमात्र एवं शून्यरूप ही समझती हूँ। समाधिमें देखी गयी वह सृष्टि ही मेरी ऐसी मान्यतामें उदाहरण है।

देवीने कहा—बेटी ! ठीक ऐसी ही बात है। वह सृष्टि असत् होनेपर भी (उसका आश्रयभूत चेतन आत्मा ही) तुम्हारे पतिके उन-उन भावोंसे उस रूपमें प्रकाशित होता है। इसी तरह यहाँ यह सृष्टि भी मिथ्या ही है (तथापि उसका आश्रय-भूत चेतन आत्मा) जीवके विभिन्न भावोंके अनुसार इस रूपमें भासित होता है।

लीला बोली—देवि ! जैसे इस सृष्टिसे मेरे पतिकी भ्रमरूप अमूर्त सृष्टि हुई, वह प्रकार मुझे बताइये; जिससे मेरा यह जगत्रूपी भ्रम दूर हो जाय।

देवीने कहा—जिस प्रकार पूर्व सृष्टिकी स्मृतिसे उत्पन्न हुई यह भ्रमरूपिणी सृष्टि खम-भ्रमके तुल्य प्रतीत होती है, उस प्रकार मैं तुमसे इस विषयका प्रतिपादन करती हूँ, सुनो। चिन्मय आकाशमें कहीं (अज्ञानसे आवृत भागमें और उसके भी) किसी एक देशमें (विधाताके अन्तःकरणके एक अंशमें) संसाररूपी मण्डप है, उस मण्डपके किसी एक आकाशरूपी कमरेके भीतर एक कोनेमें पर्वतरूपी मिट्टीके ढेलेके नीचे एक छोटा-सा गढ्ढा है, जो पर्वतसम्बन्धी छोटा-सा गाँव है। नदी, पर्वत और वनोंसे घिरे हुए उस ग्रामके भीतर एक धर्मपरायण नीरोग अग्निहोत्री ब्राह्मण अपने स्त्री-पुत्रोंके साथ रहते थे। उन्हें वहाँ गायका दूध सुलभ था। वे राजाके भयसे सर्वथा मुक्त थे तथा वहाँ आनेवाले सभी प्राणियोंका वे आतिथ्य-सत्कार करते थे।

बेटी ! वे ब्राह्मण धन-सम्पत्ति, वेश-भूषा, अवस्था, कर्म,

उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाका सरस्वतीसे कृत्रिम और अकृत्रिम सृष्टिके विषयमें पूछना * १६३

विद्या, विभव और चेष्टाओंकी दृष्टिसे साक्षात् वसिष्ठ मुनिके समान थे। उनका नाम भी वसिष्ठ ही था। उन्हें चाँद-जैसी भार्या प्राप्त थी, जिसका नाम अरुन्धती था। एक दिन उन ब्रह्मर्षिने, जो उस पर्वतके शिखरपर हरी-हरी घासोंसे ढकी हुई समतल भूमिपर बैठे हुए थे, नीचे एक राजाको देखा, जो अपने सारे परिवारके साथ शिकार खेलनेकी इच्छासे जा रहे थे। वे अपनी उस विशाल सेनाके महान् घोषसे मानो मेरु पर्वतको भी विदीर्ण कर देना चाहते थे। उस सेनाके महान् कोलाहलसे दिग्भ्रम-सा हो जानेके कारण सभी दिशाओंके प्राणियोंके समुदाय भाग रहे थे—जलके भँवरके समान एक-एक स्थानपर चक्कर काट रहे थे। उन भूपालको देखकर ब्राह्मणने मन-ही-मन यह विचार किया—'अहो ! राजाका पद बड़ा

ही रमणीय है। उस पदपर प्रतिष्ठित मनुष्य सम्पूर्ण सौभाग्योंसे उद्भासित हो उठता है। कब ऐसा समय आयेगा जब कि मैं भी पैदल, रथ, हाथी और घोड़ोंसे

संकुल चतुरंगिणी सेना, पताका, छत्र और चँवरसे सम्पन्न हो दस दिशारूपी कुञ्जोंको परिपूर्ण करनेवाला राजा होऊँगा।' उसी दिनसे ब्राह्मणके मनमें इस तरहका संकल्प होने लगा। वे जबतक जीवित रहे, प्रतिदिन आलस्य छोड़कर स्वधर्म-पालनमें लगे रहे। तत्पश्चात् उनके शरीरको जर्जर बना देनेके लिये जर्जरित अङ्गवाली जरावस्था बड़े आदरके साथ उन ब्राह्मण देवताके पास आयी। जब वे मृत्युके निकट पहुँच गये, तब उनकी पत्नीको बड़ी चिन्ता हुई। उस कल्याणमयी ब्राह्मणपत्नीने तुम्हारी ही भाँति मेरी आराधना की। अमरत्वको अत्यन्त दुर्लभ मानकर उसने मुझसे यह वर माँगा—'देवि !

मरनेपर मेरे पतिका जीव अपने मण्डपसे बाहर न जाय।' अतः मैंने उसके उसी वरको स्वीकार कर लिया। तदनन्तर कालवश ब्राह्मणका शरीर छूट गया। फिर उसी घरके आकाशमें वह ब्राह्मणका जीवात्मा स्थित रहा। पूर्व-जन्मके सुदृढ़ एवं महान् संकल्पसे वह ब्राह्मणीका पति स्वयं सर्वशक्तिशाली राजा बन गया। उसने अपने प्रभावसे

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भूमण्डलपर विजय प्राप्त कर ली। उसका प्रताप स्वर्ग-लोकतक फैल गया और उसने कृपा करके पाताललोकका भी पालन किया। इस प्रकार वह त्रिलोकविजयी नरेश हो गया। वह याचकोंको मुँहमॉँगा दान देनेके लिये कल्पवृक्षके समान था, धर्मरूपी चन्द्रमाके पूर्ण विकासके लिये पूर्णिमाकी रात्रिके सदृश था। उधर उस ब्राह्मणके मृत्युमुखमें पहुँच जानेपर उसकी पत्नी ब्राह्मणी शोकसे अत्यन्त कृश हो गयी। उड़दकी सूखी छीमीके समान उसके हृदयके दो टुकड़े हो गये। पतिके साथ ही मरकर अपने शरीरको दूर छोड़ वह आतिवाहिक देह (मानस-शरीर) के द्वारा पतिके पास जा पहुँची। जैसे नदी गर्तमें गिरती है, उसी प्रकार पतिका अनुसरण करके उनके पास जा वह वासन्ती लताके समान शोक-रहित हो गयी। उस पर्वत ग्राममें मरे हुए इस ब्राह्मणके घर हैं, भूमि-वृक्ष आदि स्थावर सम्पत्तियाँ हैं तथा मृत्युके बादसे उसका जीव उस पर्वतीय ग्रामके गृह-मण्डपमें विद्यमान है।
(सर्ग १८-१९)


लीला और सरस्वतीका संवाद—जगत्‌की असत्ता एवं अजातवादकी स्थापना

देवी सरस्वती ने कहा—कल्याणि ! वही ब्राह्मण अब राजा होकर तुम्हारा पति हुआ है और जो अरुन्धती नामवाली ब्राह्मणी थी, वह तुम हो। तुम्हीं दोनों सुन्दर दम्पति यहाँपर राज्य करते हो। तुम्हारे पूर्वजन्मका यही सारा सृष्टिक्रम है, जिसे मैंने कह सुनाया। ब्रह्मरूप आकाशमें जीवभावकी भ्रान्ति होनेसे ही यह सब कुछ प्रतीत होता है। इसलिये कौन सृष्टि भ्रमरूप है और कौन भ्रमसे रहित है ? सुतरां सारी सृष्टि ही अनर्गल अनर्थ-बोधके सिवा दूसरा कुछ नहीं है।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! देवी सरस्वतीका यह वचन सुनकर लीलाके सुन्दर नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। वह इस प्रकार बोली।

लीलाने कहा—देवि ! आपकी बात तो सत्य ही होगी। मैं उसे मिथ्या कहनेका साहस नहीं कर सकती; परंतु ऐसी विरुद्ध बात कैसे सम्भव हो सकती है ?

उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीला और सरस्वतीका संवाद—जगत्‌की असत्ता एवं अजातवादकी स्थापना * १२५


कहाँ ब्राह्मणका जीव अपने घरमें है और कहाँ इतने बड़े विशाल प्रदेशमें हमलोग स्थित हैं। (फिर वे ब्राह्मण-दम्पति और हमलोग एक कैसे हो सकते हैं?) मेरे स्वामी जहाँ स्थित हैं वैसा वह दूसरा लोक, वह विस्तृत भूमि, वे विशाल पर्वत और वे दसों दिशाएँ एक घरके भीतर कैसे प्रतीत हो सकती हैं ? सर्वेश्वरेश्वरि ! यदि कोई कहे कि एक सरसोंके दानेके भीतर मतवाला ऐरावत हाथी बँधा हुआ है, परमाणुके भीतर बैठे हुए एक मच्छरने सिंह-समूहोंके साथ युद्ध किया, सुमेरु पर्वत कमलगड्ढेके भीतर रक्खा हुआ है तो जैसे ये सारी बातें असम्भव होनेके कारण असमञ्जस प्रतीत होती हैं—ठीक नहीं लगतीं, उसी प्रकार उस घरके अन्दर ये विशाल भूलोक और पर्वत हैं, यह कथन भी असम्भव एवं असंगत ही जान पड़ता है।

देवी सरस्वती बोलीं—सुन्दरि ! मैं यह झूठ नहीं कह रही हूँ। तुम ध्यान देकर यथावत् रूपसे इस विषयको सुनो। दूसरोंके द्वारा तोड़ी जानेवाली धर्मकी जिस मर्यादाको मैं स्वयं ही स्थापित करती हूँ, उसीका यदि मैं भेदन करूँ तो दूसरा कौन पालन करेगा ? उस पर्वतीय गाँवके ब्राह्मणका वह जीवात्मा अपने उसी घरके आकाशमें चिदाकाशरूप होकर ही इस कल्पित महान् राष्ट्रको देख रहा है। कल्याणि ! जैसे स्वप्नमें जाग्रत्‌कालकी स्मृति लुप्त हो जाती है और दूसरी स्मृति उदित होती है, उसी प्रकार तुम दोनोंकी पूर्वजन्मकी स्मृति नष्ट हो गयी है और उससे विपरीत दूसरी स्मृति उदित हुई है। यही उस शरीरका मरण है। जैसे स्वप्नमें तीनों लोकोंका दीखना, संकल्पमें त्रिलोकीका उदय होना तथा मरु-मरीचिकामें जलका होना असत्य हैं, फिर भी वहाँ उन वस्तुओंकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार ब्राह्मणके घरके भीतर पर्वत, वन और नगरोंसहित भूमिका होना यद्यपि असत् है तो भी वहाँ इन सबकी प्रतीति होती है। जो असत्यसे उत्पन्न हुआ है, वह असत् है, जो स्मृतिसे उत्पन्न हुआ है, वह भी असत् है—जैसे मृगतृष्णाकी नदीमें जलका होना मिथ्या है; फिर उस जलमें जो तरङ्गकी प्रतीति होती है, वह सत् कैसे हो सकती है !

बेटी ! उस पर्वतीय गृहके आकाशरूपी कोशमें स्थित तुम्हारा जो यह घर है तथा जो मैं हूँ और तुम हो—यह सब कुछ तुम केवल चिन्मय आकाशरूप ब्रह्म ही समझो। इस विषयको स्पष्टरूपसे समझने और समझानेके लिये स्वप्न, भ्रम, संकल्प और अपने-अपने अनुभवकी परम्पराएँ ही मुख्य प्रमाण (उदाहरण) हैं। ब्राह्मणके उस पर्वतीय घरके भीतर उस ब्राह्मणका जीव है। उस जीवाकाशमें (अर्थात् उस जीवात्माके संकल्पमें) समुद्र और वनोंसे परिपूर्ण यह पृथ्वी है। कृशाङ्गि ! उस ब्राह्मणके घरके भीतर इस नूतन सृष्टिमें जो यह नगर निर्मित हुआ है, यह यद्यपि मनमें बैठ गया है, तथापि ब्राह्मणका वह पहला घर आज भी मौजूद ही है—नष्ट नहीं हुआ। जैसे इस जगत्-सृष्टिकी प्रतीति आभासमात्र है, उसी प्रकार क्षण, कल्प आदिकी प्रतीति भी आभास-मात्र ही है, वास्तविक नहीं। परमात्मामें जो तू-मैं इत्यादि भावोंका अध्यास है, उसके अधीन जो अपने जन्मका भ्रम होता है, ऐसा भ्रम जिन लोगोंको है, उन्हीं पुरुषोंको क्षण, कल्प आदि सम्पूर्ण जगत्‌की प्रतीति होती है।

उत्तम व्रतका पालन करनेवाली लीले ! मरणकालकी मिथ्याभूत मूर्च्छाका अनुभव करके जब जीव पूर्वजन्मके सभी भावोंको भुला देता और दूसरे नूतन भावको देखने या अनुभव करने लगता है, तभी वह पलक मारते-मारते मनमें यह स्मरण करने लगता है कि मैं आधेय हूँ और इस आधारमें स्थित हूँ। यद्यपि वह उस समय (चेतन) आकाश (परमात्मा) में आकाश (चिदाकाश जीवात्मा)-रूपसे ही स्थित होता है (इसलिये उसमें आधाराधेय-भावकी कल्पना मिथ्या ही है), तथापि उसके चित्तमें वैसा संस्कार प्रकट होता है। उसे यह भान होता है कि हाथ, पैर आदि अवयवोंसे युक्त यह शरीर मेरा ही

१६—सरस्वती और लीलाका ज्ञानदेहके द्वारा आकाशमें गमन और उसका वर्णन

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है । उसके मनमें जो शरीर स्थित होता है अर्थात् उसमें जैसे शरीरका संस्कार रहता है, उसी या वैसे ही इस शरीरको वह आत्मीयभावसे देखता है । उसे जान पड़ता है कि 'मैं इस पिताका पुत्र हूँ। इतने वर्षोंकी मेरी अवस्था हो गयी । ये मेरे मनोरम भाई-बन्धु हैं। यह मेरा रमणीय घर है । जब मेरा जन्म हुआ, तब मैं बालक था और अब बढ़कर ऐसा हो गया हूँ।'

स्वप्नमें द्रष्टा और दृश्यरूपसे जो विभिन्न पदार्थ कल्पित होते हैं, उन सबमें अदृश्यरूपसे जो चेतन स्थित होता है, वही उन स्वप्नगत पदार्थोंका बाध होनेपर एक-रस चेतनरूपसे पुनः दृष्टिगोचर ( अनुभवका विषय ) होता है। अतः कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ था—बिना उत्पन्न हुए ही स्वप्नावस्थामें उन वस्तुओंके दर्शन हुए थे ।

इस तरह जैसे स्वप्नमें वह चेतन ही द्रष्टा, दृश्य आदिके रूपमें उदित होता है, उसी प्रकार परलोकमें भी उदित होता है और जैसे परलोकमें उदित होता है, उसी तरह इस लोकमें भी वह चेतन ही द्रष्टा, दृश्य आदिके रूपमें आविर्भूत होता है। इसलिये स्वप्न, परलोक और इहलोक—इनमें थोड़ा-सा भी भेद नहीं है । ये सब-के-सब असत् होते हुए भी भ्रमवश सत्-से प्रतीत होते हैं—ठीक उसी तरह जैसे जलमें उठनेवाली तरङ्गोंका एक दूसरेसे भेद नहीं होता और वे सब असत् होती हुई ही सत्-सी प्रतीत होती हैं । चूँकि जलमें लहरोंके समान चेतनमें ही यह जगत् भ्रमवश प्रतीत हो रहा है, अतः यह कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ—यह सिद्धान्त स्थिर हुआ ।

( सर्ग २० )


लीला और सरस्वतीका संवाद—सब कुछ चिन्मात्र ब्रह्म ही है, इसका प्रतिपादन

श्रीसरस्वतीजीने कहा—जैसे आँख खोलनेपर प्राणीको सारे रूप अच्छी तरह दिखायी देने लगते हैं, उसी प्रकार मृत्युरूपी मूर्च्छाके दूर होनेपर जीवको शीघ्र ही सम्पूर्ण लोकोंका पूर्णतः भान होने लगता है । जैसे स्वप्नमें अपनेको अपने ही मरणकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार जीवको, संसारमें जिसका अनुभव या दर्शन नहीं हुआ है, ऐसा कार्य भी इस तरह तत्काल याद आने लगता है कि इसे मैंने किया है। चिन्मय आकाशरूप परमात्माके भीतर मायारूपी आकाशमें इस तरहकी अनन्त भ्रान्तियाँ भासित होती हैं । यह जगत् नामकी नगरी जो बिना दीवालके ही प्रतीत होती है, वास्तवमें कल्पनामात्र है ( सत्य नहीं ) । यह जगत्, यह सृष्टि इत्यादि रूपसे स्मृति ( वासना ) ही विस्तार-को प्राप्त हो रही है । कृशाङ्गी लीले ! यह त्रिभुवन आदि दृश्य-प्रपञ्च कुछ लोगोंके अनुभवमें आकर उनकी स्मृतिमें स्थित है और कुछ लोगोंके अनुभवमें आये बिना ही उनकी स्मृतिमें विद्यमान है । विश्वका अत्यन्त विस्मृत हो जाना ही मोक्ष कहलाता है । उस अवस्थामें किसीके लिये भी कोई प्रिय और अप्रिय नहीं रह जाते । अहंता और जगत्की आधारभूत अविद्याका अत्यन्त अभाव हुए बिना मोक्ष स्वाभाविक रूपसे विद्यमान होता हुआ भी उदित नहीं होता । जैसे रज्जुमें जो सर्पका भ्रम होता है, वह वास्तविक नहीं है; तो भी जबतक उसमें 'सर्प' शब्द और उसके अर्थकी सम्भावनाका पूर्णरूपसे बाध नहीं हो जाता, तबतक वह शान्त होनेपर भी शान्त नहीं होता । यह जो विशाल संसार है, परब्रह्म ही है—यह निश्चित सिद्धान्त है । अविद्याका अभाव हो जानेपर भी यदि अनुवृत्तिवश इसकी प्रतीति होती है तो उसे प्रतीतिमात्र ही समझना चाहिये । वह वास्तवमें नहीं है ( जैसे स्वप्नसे जागनेपर स्वप्नके संसारकी आकृति प्रतीत हो तो भी वह मिथ्या ही है, वास्तविक नहीं ) । इसी प्रकार जगत्के उदित होनेपर

१७—लीलाका भूतलमें प्रवेश और उसके द्वारा अपने पूर्वजन्मके स्वजनोंके दर्शन, ज्येष्ठशर्माको माताके रूपमें लीलाका दर्शन न होनेका कारण

उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीला और सरस्वतीका संवाद—सब कुछ ब्रह्म ही है, इसका प्रतिपादन * १२७

भी कहीं कभी कुछ भी उदित नहीं हुआ, केवल चिन्मय आकाशरूप परमात्मा ही स्थित है।

इस तरह विचार करनेसे यह सिद्ध हुआ कि कभी कुछ उत्पन्न नहीं हुआ। जो कुछ जगत् आदि दृश्यरूपसे प्रतीत होता है, वह भी चिन्मय परमात्मा ही है। केवल चेतन आकाशरूप ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है।

लीला बोली—देवि ! जैसे प्रातःकालकी प्रभासे जगत्की रूप-सम्पत्ति सुस्पष्ट दिखायी देने लगती है, उसी प्रकार आपने मुझे यह बहुत ही उत्तम और अद्भुत दृष्टि प्रदान की है। इस समय जबतक मैं तीव्र अभ्यास न होनेके कारण इस दृष्टिमें सुदृढ़ स्थिति नहीं प्राप्त कर लेती, तबतक आप अपने उपदेशद्वारा इस दृश्यकौतुकका—इस संसारका बाध करती रहें। देवि ! वह ब्राह्मण अपनी ब्राह्मणीके साथ पूर्वसृष्टिके जिस गाँव और घरमें रहता था, उस सृष्टिके उसी पर्वतीय ग्राममें आप मुझे ले चलिये। मैं उसे देखना चाहती हूँ।

श्रीसरस्वतीजीने कहा—लीले ! चेत्यरहित चिन्मय परमात्मरूप जो परम पावन दृष्टि है, उसका अवलम्बन करके तुम इस आकारका—इस देहके अभिमानका त्यागकर निर्मल हो जाओ। ( तात्पर्य यह कि पूर्वसृष्टिकी उस वस्तुको देखनेके लिये इस शरीरको भूल जाना आवश्यक है।) इस प्रकार जब तुम देहाभिमानरूप मलसे रहित हो जाओगी, तब हम दोनों साथ-साथ रहकर बिना किसी रुकावटके उस सृष्टिको देखेंगे। यह शरीर उस सृष्टिके दर्शनरूपी गृहद्वारके लिये एक सुदृढ़ अर्गला ( रुकावट ) के रूपमें स्थित है।

बेटी ! ये तीनों लोक मायामय होनेके कारण अमूर्त हैं। मिथ्या आग्रह या अज्ञानके कारण ये तुम्हें मूर्तिमान् प्रतीत होते हैं, जैसे सुवर्णको लोग अँगूठीके रूपमें देखते हैं। जैसे अँगूठीका रूप धारण करनेवाले सुवर्णमें अँगूठीपना नहीं है, उसी प्रकार जगत्का रूप धारण किये हुए ब्रह्ममें जगत् नहीं है। यह जगत् आकाशकी भाँति शून्य ही है; इसके रूपमें यहाँ जो कुछ दिखायी देता है, वह ब्रह्म ही है। ब्रह्ममें भ्रमवश माया दृष्टिगोचर होती है। यह सारा प्रपञ्च झूठा ही है। केवल अद्वितीय ब्रह्म ही, जिसका अहं ( आत्मा )-रूपसे अनुभव होता है, परमार्थ सत्य है। इस विषयमें उपनिषदोंके वाक्य, गुरुजनोंके उपदेश और अपना अनुभव प्रमाण है। जो ब्रह्म है, वही ब्रह्मको देखता है। जो ब्रह्म नहीं है, वह कदापि ब्रह्मको नहीं देख सकता। ब्रह्मका ही जो ऐसा स्वभाव है ( जो उसकी आवृत्त सत्ता है ), वही सृष्टि आदिके नामसे प्रसिद्ध है। जबतक अभ्यासयोगके द्वारा तुम्हारी भेदबुद्धि शान्त नहीं हो जाती, तबतक अब्रह्मरूप होनेके कारण निश्चय ही तुम ब्रह्मको नहीं देख सकती। ब्रह्मज्ञानका बारंबार अभ्यास करनेके कारण ब्रह्ममें अद्वैतभावसे जिनकी दृढ़ स्थिति हो गयी है, ऐसे हमलोग ही उस परमपदका साक्षात्कार करते हैं। जब अपने संकल्प ( मनोरथ ) से निर्मित हुआ नगर भी अपने इस शरीरसे प्राप्त नहीं हो सकता, तब दूसरेके संकल्पसे निर्मित नगरको दूसरा शरीर कैसे प्राप्त करेगा। अतः कार्यको समझनेवाली स्त्रियोंमें श्रेष्ठ लीले ! तुम इस देहाध्याससे रहित होकर चेतन ब्रह्ममय आकाशरूपिणी हो जाओ। तब तत्काल ही उस ग्रामका दर्शन करोगी। अतः शीघ्र वही कार्य करो।

लीलाने कहा—देवि ! आपने कहा है कि ब्राह्मण और ब्राह्मणीके जगत्में हम दोनों साथ-साथ चलेंगी; परंतु माताजी ! मैं यह पूछती हूँ कि हम दोनोंका साथ-साथ चलना कैसे हो सकता है। मैं तो इस शरीरको यहीं स्थापित करके शुद्ध सत्त्वका अनुसरण करनेवाले

१२८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

चित्तके द्वारा उस उत्तम आकाशमय लोकमें चली जाऊँगी। परंतु आप अपने इसी शरीरसे वहाँ कैसे जायेंगी ?

देवी सरस्वतीने कहा—बेटी ! जैसे तुम्हारा संकल्परूपमय आकाश, वृक्ष आदि सांकल्पिक सत्तासे सत् होता हुआ भी वास्तवमें शून्यरूप ही है, उसी तरह शुद्ध सत्त्वगुणका कार्यभूत जो मेरा शरीर है, यह चेतन परमात्माका ही प्रकाश है—इसके रूपमें चेतन परमात्मा-की ही प्रतीति होती है। अतः इसका उससे भेद नहीं है। ऐसा जो मेरा यह दिव्य शरीर है, इसका त्याग करके मैं नहीं जाऊँगी। जैसे वायु गन्धको प्राप्त होती है, उसी तरह मैं इसी शरीरसे ब्राह्मण-ब्राह्मणीके उस देशमें पहुँच सकती हूँ। भद्रे ! ये देह आदि परब्रह्मसे परिपूर्ण होकर ही स्थित हैं, अतः अपनी उत्कृष्ट महिमामें स्थित परब्रह्म ही हैं। इस सत्यको हमलोग बिना किसी विघ्न-बाधाके देखते हैं, किंतु तुम ऐसा नहीं देखती (क्योंकि तुम्हें अभी दृढ़ तत्त्वज्ञान नहीं हुआ है)।

जैसे सुवर्णमें कटकत्व, जलमें तरङ्गत्व और स्वप्नके नगर एवं संकल्प-कल्पित पुर आदिमें सत्यत्व नहीं है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दरूप ब्रह्ममें कल्पनातीत अनामय आत्मस्वभावसे पृथक् कोई वस्तु नहीं है। जो कुछ भी यह दृश्य प्रपञ्च भासित हो रहा है, वह सब ब्रह्मका ही निर्मल विकास है। जैसे परम उत्तम चन्द्रकान्तमणिकी भ्रमवश काचके समान प्रतीति होती है, वैसे ही ब्रह्मके विशुद्ध विकासकी भ्रान्तिवश दृश्यरूप-से प्रतीति हो रही है।

लीलाने पूछा—देवि ! कृपया यह बताइये कि इतने दीर्घकालसे किसने हमलोगोंको द्वैत और अद्वैतके द्विविध विकल्पोंद्वारा भ्रममें डाल रखा है।

श्रीसरस्वतीजीने कहा—चञ्चले ! तुम चिरकालसे अविचारद्वारा व्याकुल होकर भटक रही हो। अविचार स्वभावसे उत्पन्न होता है और विचारसे उसका नाश हो जाता है। विचारद्वारा अविचारका पलक मारते-मारते नाश हो जाता है। यह अविचाररूप अविद्या विचार या विवेकसे बाधित होकर ब्रह्मसत्ता हो जाती है—ब्रह्मके सत्-स्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये अविद्याका अस्तित्व नहीं है। अतः न तो कहीं अविचार है न अविद्या है, न बन्धन है और न मोक्ष ही है। यह जगत् शुद्ध बोधस्वरूप (चिन्मय ब्रह्म) ही है। चूँकि इतने समयतक तुमने इसका विचार नहीं किया, इसलिये तुम्हें बोध नहीं हुआ। तुम भ्रान्त एवं व्याकुल ही बनी रह गयीं। आजसे तुम्हारे चित्तमें वासनाका क्षयरूप बीज पड़ गया है। इसलिये अब तुम विवेकशालिनी, प्रबुद्ध एवं विमुक्त हो। एकमात्र ब्रह्मके चिन्तनरूप उत्तम निर्विकल्प समाधिके मनमें आरूढ़ होनेपर जब द्रष्टा, दृश्य और दृष्टिका अत्यन्ता-मात्र हो जायगा तथा हृदयमें यह वासना-क्षयरूप बीज कुछ अङ्कुरित हो जायगा, तब राग-द्वेष आदि दृष्टियाँ क्रमशः उदित नहीं होंगी, संसारकी उत्पत्ति भी निर्मूल हो जायगी और निर्विकल्प समाधि पूर्णतः स्थिरताको प्राप्त होगी। इस तरह निर्विकल्प समाधिके स्थिर होने-पर कुछ कालके अनन्तर मायाकाश और उसके कार्योंके अधिष्ठान-स्वरूप निर्मल आत्माके साक्षात्कारसे तुम भ्रान्ति-ज्ञानरूप कालिमाके कलङ्कसे शून्य होकर सम्पूर्ण प्राणियोंकी भ्रान्तियोंका, उनकी कार्यभूत वासनाओंका और उनकी कारणभूत अविद्याका जहाँ अन्त हो जाता है, उस मोक्षरूप परम पुरुषार्थमें प्रतिष्ठित हो जाओगी।

(सर्ग २१)

१८—लीलाकी सत्य-सङ्कल्पता, उसे अपने अनेक जन्मोंकी स्मृति, लीला और सरस्वतीका आकाशमें भ्रमण तथा परम व्योम—परमात्माकी अनादि-अनन्त सत्ताका प्रतिपादन

उत्पत्ति-प्रकरण ] * वासनाओंके क्षयका उपाय और ब्रह्मचिन्तनके अभ्यासका निरूपण * १२९

वासनाओंके क्षयका उपाय और ब्रह्मचिन्तनके अभ्यासका निरूपण

श्रीसरस्वतीजीने कहा —लीले ! यद्यपि स्वप्नावस्थामें स्वप्नके शरीरका अनुभव होता है, तथापि यह स्वप्न है— ऐसा ज्ञान होनेसे जैसे स्वप्न-शरीर वास्तविक नहीं रहता, मिथ्या ठहरता है, उसी तरह यद्यपि इस स्थूल शरीरका पहले अनुभव होता है, तथापि इसे स्वप्नवत् मान लेनेपर वासनाओंका क्षय होनेसे यह भी 'असत्' (बाधित) ही हो जाता है। जैसे स्वप्नके ज्ञानसे स्वप्नावस्थाका शरीर शान्त हो जाता है, उसी प्रकार जाग्रत्-अवस्थाके शरीरको भी स्वप्नवत् समझ लेनेपर वासनाओंके क्षीण होनेसे यह शान्त हो जाता है। जैसे स्वप्न-शरीरका और मनोरथ-कल्पित कल्पनामय शरीरका अन्त होनेपर इस जाग्रत्-शरीरका भान होता है, उसी प्रकार जगद्-भावना (स्थूल शरीरमें अहं-भावना) का अन्त होनेपर आतिवाहिक (सूक्ष्म) शरीरका उदय (अनुभव) होता ही है। जैसे स्वप्नावस्थाके वासनाबीजसे रहित होनेपर सुषुप्ति अवस्था उदित (प्राप्त) होती है, उसी तरह जाग्रत्-अवस्था भी जब वासनाबीजसे रहित हो जाती है, तब जीवन्मुक्तिकी प्राप्ति होती है। जिसमें वासनाएँ सुप्त अथवा विलीन हो जाती हैं, उस प्रगाढ़ निद्राका नाम सुषुप्ति है। जिस अवस्थामें वासनाओंका सर्वथा क्षय हो जाता है, उसे 'तुरीया' कहते हैं। जाग्रत्-अवस्थामें भी परम पदका अनुभव होनेपर (वासनाओंका समूल नाश हो जानेके कारण) तुर्यावस्था होती ही है। जीवित पुरुषोंके जीवनकी वह अवस्था, जिसमें वासनाओंका सर्वथा क्षय हो जाता है, जीवन्मुक्ति कहलाती है। अज्ञानी बद्ध जीव इसका अनुभव नहीं कर पाते।

लीले ! जब पूर्ण अभ्यास करनेसे तुम्हारा यह अहंभाव शान्त हो जायगा, तब तुम्हारी स्वाभाविक चैतन्यरूपता, जो इस दृश्य-प्रपञ्चकी चरम अवधिभूत है, उदित एवं विकसित हो जायगी। जब आतिवाहिकता (शरीरकी सूक्ष्मता) का ज्ञान सदाके लिये स्थायी हो जायगा, तब तुम संकल्पदोषसे रहित पावन लोकोंका साक्षात्कार कर सकोगी। अतः सती साध्वी लीले ! तुम वासनाको क्षीण करनेका प्रयत्न करो। जब तुम्हारी वासना-शून्य स्थिति अत्यन्त दृढ़ हो जायगी, तब तुम जीवन्मुक्त हो जाओगी। जबतक तुम्हारा यह शीतल (शान्तिप्रद) ज्ञानरूपी चन्द्रमा पूर्णताको नहीं प्राप्त हो जाता, तबतक तुम इस शरीरको यहाँ स्थापित करके लोकान्तरोंके दर्शन करो। मैंने तुमसे जो बात कही है, यह बालकोंसे लेकर सिद्ध पुरुषोंतकमें प्रसिद्ध, सबके अनुभवसे सिद्ध एव यथार्थ है। यह शरीर न तो मरता है और न जीता ही है। स्वप्न और संकल्पसम्बन्धी भ्रममें मरण और जीवनकी चर्चा ही क्या है? बेटी ! जैसे मनोरथकल्पित पुरुषमें जीवन और मरण असत्य ही प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार इस स्थूलशरीरमें भी जीवन-मरण मिथ्या ही हैं।

लीला बोली—देवि ! आपने मुझे यहाँ उस निर्मल ज्ञानका उपदेश दिया है, जिसके श्रवणमात्रसे ही दृश्य-रूपी हैजेकी बीमारी शान्त हो जाती है। अब इस विषयमें मेरा एक उपकार और कीजिये। कृपया मुझे यह बताइये कि वह अभ्यास क्या है, कैसा है, अथवा कैसे वह पुष्ट होता है और उसके पुष्ट हो जानेपर क्या होता है।

श्रीसरस्वतीजीने कहा—बेटी ! जिस पुरुषके द्वारा जिस-जिस साधनसे जब-जब जो भी कार्य किया जाता है, वह अभ्यासके बिना कभी सिद्ध नहीं होता। सच्चिदानन्दघन परमात्माका चिन्तन करना, जिज्ञासुओंके प्रति उसका वर्णन करना, आपसमें एक-दूसरेको ब्रह्मके तत्त्वका बोध कराते रहना तथा उस एकमात्र ब्रह्मके ही परायण हो जाना—इसे ही विद्वान् लोग ब्रह्मविषयक अभ्यास समझते हैं। जो विरक्त महात्मा पुरुष मुक्तिके लिये अपने अन्तःकरणमें भोग-वासनाओंके क्षीण होनेकी भावना करते

१३० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

हैं, वे ही भव्य ( कल्याणके भागी ) पुरुष भूमण्डलमें विजयी होते—उत्कृष्ट पद पाते हैं । जिनकी बुद्धि उदारता ( परिग्रह-त्याग )-रूपी सौन्दर्य और वैराग्यके रससे रञ्जित हो आनन्दका स्पन्दन करनेवाली है, वे ही उत्तम अभ्यासी कहे गये हैं । जो लोग युक्ति तथा शास्त्रोंके ज्ञाताके द्वारा जाननेमें आनेवाली लौकिक ज्ञेय वस्तुओंके अत्यन्ताभावकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करते हैं, वे ब्रह्माभ्यासी कहे गये हैं। यह दृश्य जगत् सृष्टिके आरम्भमें ही उत्पन्न नहीं हुआ, इसलिये कभी भी इसका अस्तित्व है ही नहीं। जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह मैं ही हूँ—मुझ सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मासे यह भिन्न नहीं है, ऐसे अभ्यासको बोध ( ब्रह्मज्ञान ) का अभ्यास कहा गया है । दृश्यकी उत्पत्ति कभी हुई ही नहीं, इस बोधसे राग-द्वेष आदिका क्षय हो जानेपर ब्रह्मचिन्तनके बलसे उत्पन्न हुई जो परमात्मरति है, वह ब्रह्माभ्यास है। जैसे शरद् ऋतुमें हिमके समान शीतल ओस-जलके अभिषेकसे सब ओर फैला हुआ भारी कुहरा मिट जाता है, उसी प्रकार चित्तमें पूर्वोक्त रीतिसे अभ्यासमें लाये हुए विवेक-बोधरूपी जलके निरन्तर सिञ्चनसे, जो सम्पूर्ण तापोंको शान्त करनेवाला होनेके कारण हिमके समान शीतल है, संसाररूपी कृष्णपक्षकी अँधेरी रातमें उत्पन्न हुई मोहमयी गाढ निद्रा सर्वथा गल जाती (मिट जाती) है।

महर्षि वाल्मीकि कहते हैं—जब मुनिवर वसिष्ठ इस प्रकार यह प्रसङ्ग सुना चुके, तब दिन बीत गया, सूर्य अस्त हो गये, मुनियोंकी वह सभा वसिष्ठजीको नमस्कार करके सायंकालिक कृत्य करनेके लिये चली गयी और रात बीतनेपर सूर्यकी किरणोंके साथ ही फिर सभा-स्थानमें आ गयी।

( सर्ग २२ )


सरस्वती और लीलाका ज्ञानदेहके द्वारा आकाशमें गमन और उसका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! वे दोनों श्रेष्ठ देवियाँ सरस्वती और लीला उस आधी रातके समय जब कि समस्त परिजन सो गये थे, पूर्वोक्तरूपसे बातचीत करके अन्तःपुरके मण्डपमें जो मुरझाये नहीं थे, ऐसे फूलोंकी मालारूपी वस्त्रसे ढके हुए राजाके शवके पास ही एक आसनपर बैठ गयीं। वे समाधिमें स्थित हो ऐसी निश्चल हो गयीं मानो रत्नके बने हुए खंभेमें खुदी हुई दो मूर्तियाँ हों अथवा दीवालमें अङ्कित किये गये दो सुन्दर चित्र हों । निर्विकल्प समाधि लग जानेसे वे बाह्यज्ञानसे शून्य हो गयीं । पहले उन दोनोंको 'मैं जगत्' इस भ्रमरूप दृश्यकी अनुत्पत्तिका बोध हुआ, अर्थात् उन्होंने भी अनुभव किया कि जगत्‌की कभी उत्पत्ति हुई ही नहीं । जब ऐसा अनुभव हुआ, तब उन्हें इस दृश्य-प्रपञ्चके अत्यन्ताभावका निश्चयात्मक ज्ञान हो गया । फिर तो उन दोनोंकी दृष्टिसे यह दृश्य-रूपी पिशाच पूर्णतया ओझल हो गया—किसी आड़में छिप गया हो, ऐसी बात नहीं । उसकी सत्ता है ही नहीं, इसलिये वह सर्वथा अदृश्य हो गया । निष्पाप रघुनन्दन ! जैसे हमलोगोंकी दृष्टिमें खरगोशके सींग नहीं हैं और न होनेके कारण ही वे दीखते नहीं, उसी तरह यह दृश्य-पिशाच न होनेके कारण ही उनके लिये सर्वथा तिरोहित हो गया । जो वस्तु पहलेसे ही नहीं है, वह वर्तमानमें भी अस्तित्वशून्य ही है । इस जगत्‌की यही स्थिति है । यह प्रतीत हो तो मृगतृष्णामें जलकी प्रतीतिके समान असत् है और यदि प्रतीत न हो तो खरगोशके सींगकी भाँति असत् है । तात्पर्य यह कि किसी भी दशामें इसकी सत्ता नहीं है ।

ज्ञानकी देवी सरस्वती अपने उसी ज्ञानमय शरीरसे विचरण करने लगीं । परंतु मानवी रानी लीलाने मानव-देहके अभिमानका त्याग करके ध्यान और ज्ञानके अनुरूप दिव्य शरीरका आश्रय ले उसीके द्वारा तीव्र गतिसे आकाशमें विचरना आरम्भ किया । उन दोनोंने उद्बुद्ध

उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाका भूतलमें प्रवेश और उसके द्वारा अपने पूर्वजन्मके स्वजनोंके दर्शन * १३१

हुए पूर्वसंकल्पजनित संस्कार-ज्ञानसे गृहाकाशमें ही एक बित्ता ऊँचे उठकर आकाश-गमनमें समर्थ चिन्मय आकृतियाँ धारण कर लीं । दोनों ही चेतन आकाश ( ब्रह्म )-रूपिणी हो गयीं । यद्यपि वे उसी घरमें बैठी रहीं, तथापि चिन्मय चित्तके संकल्पसे कोटि योजन विस्तृत दूर-से-दूर आकाशस्थलमें उड़ने लगीं—उड़नेका अनुभव करने लगीं । यद्यपि ये दोनों सखियाँ वास्तवमें चेतन आभासमय शरीरवाली थीं, तो भी पूर्वसंकल्पित दृश्यके अनुसंधानमें लगे रहनेवाले चित्तके साथ अभिन्नताको प्राप्त हुए अपने स्वभावके कारण वे एक दूसरेके शरीरको देखती और परस्पर स्नेहमग्न होती थीं ।

तदनन्तर वे दोनों देवियाँ यथाशक्ति यत्र-तत्र विश्राम करती हुई धीमी चालसे आगे बढ़ने लगीं । उन्होंने शून्यमें ही देखा आकाशमण्डल बड़े-बड़े भुवनों और वहाँके निवासियोंके निर्माण कार्यसे अत्यन्त भर गया है—अवकाशशून्य हो रहा है । ऊपर-ऊपरका आकाश भिन्न-भिन्न भुवनोंसे अलग-अलग घिरा हुआ था । वे सुन्दर विमानोंसे सुशोभित भुवन विचित्र आभूषणोंके समान प्रतीत होते थे । उसमें कहींपर वज्र, चक्र, शूल, खड्ग और शक्ति आदि अस्त्र-शस्त्रोंके अधिष्ठाता देवता मूर्तिमान् होकर विचर रहे थे । उनसे युक्त वह लोक बिना भीतके ही भवनोंसे विभूषित था और वहाँ नारद, तुम्बुरु आदि गन्धर्व गीत गाते थे । कहीं मेघोंके मार्गमें ( पुष्कर और आवर्तक आदि ) महामेघोंके वृष्टि-सम्बन्धी महान् आयोजनसे वहाँ सब ओर हलचल मची थी और कहींपर प्रलयकालके मेघ चित्रलिखितकी भाँति निश्चेष्ट एवं नीरव दिखायी देते थे । कहीं उठते हुए कज्जलगिरिके समान सुन्दर मेघोंकी घटा घिरी आ रही थी । कहीं सुवर्ण-द्रवके समान मनोहर सूर्यके तापको दूर करनेवाले बादल छा रहे थे और कहीं दिशाओंके दाहसे उत्पन्न हुई गर्मी फैल रही थी । कहीं शून्यता रूपी जलसे परिपूर्ण आकाश प्रशान्त महासागरके समान शोभा पाता था । कहीं विमानोंपर बैठे हुए देवताओंकी बहुरंगी प्रभासे आकाशकी रूप-रेखा चितकबरी-सी जान पड़ती थी ! कहीं वह शान्त, समाधिस्थ तथा परम पदमें विश्रान्त मुनियोंकी मण्डलीसे घिरा हुआ था और कहीं जिन्होंने क्रोधको दूरसे ही त्याग दिया है, उन साधु महात्माओंके चित्तके समान वह सुन्दर एव सम था । कहीं रुद्रपुर, कहीं ब्रह्मपुर और कहीं मायानिर्मित पुर वहाँ दृष्टिगोचर होते थे । कहीं सिद्धोंके समुदाय विचर रहे थे । कहीं यह आकाश ज्ञानी पुरुषके हृदयकी भाँति दृश्यभ्रमसे अत्यन्त शून्य, उज्ज्वल, आवरणरहित, आनन्दमय, कोमल, शान्त, स्वच्छ एवं विस्तृत था ।

जहाँ गूलरके फलके भीतर रहनेवाले छोटे छोटे मच्छरों-के समान त्रिभुवनवासी प्राणियोंका समुदाय घूम रहा था, उस आकाशको बहुत ऊँचेतक लाँघकर वे दोनों ललनाएँ फिर भूतलपर जानेको उद्यत हुईं । ( सर्ग २३-२४ )


लीलाका भूतलमें प्रवेश और उसके द्वारा अपने पूर्वजन्मके स्वजनोंके दर्शन, ज्येष्ठशर्माकी माताके रूपमें लीलाका दर्शन न होनेका कारण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! आकाशसे किसी पर्वतीय ग्रामको जाती हुई उन दोनों स्त्रियोंने उसी भूतलको देखा, जो ज्ञानकी देवी सरस्वतीके मनमें था—जिसे वे लीलाको दिखाना चाहती थीं । सागर, बड़े-बड़े पर्वत, लोकपाल, स्वर्ग, आकाश और भूतलसे परिवेष्टित जगत्‌के मध्यभागका अवलोकन करके मानव-कन्या रानी लीलाने तुरंत ही अपने मन्दिरके आधारभूत पर्वतीय ग्रामका वह स्थान देखा ।

इस प्रकार वे दोनों सुन्दरियाँ, जहाँ राजा पद्म रहते थे, उस ब्रह्माण्डमण्डलसे निकलकर दूसरे ब्रह्माण्डमें

२३२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जा पहुँचीं, जहाँ वसिष्ठ नामक ब्राह्मणका घर था। वे दोनों ही स्त्रियाँ सिद्ध थीं। उन्होंने दूसरे लोगोंसे अदृश्य रहकर ही ब्राह्मणके निवासभूत मण्डपको, जो उनका अपना ही घर था, देखा। वह घर गृहस्वामीके वियोगसे हतप्रभ हो गया था। उसके मुख अर्थात् द्वारकी कान्ति करुणासे व्याप्त थी और उसका विनाश निकट था।

रघुनन्दन ! सुन्दरी लीला चिरकालतक सुन्दर ज्ञान-का अभ्यास करनेके कारण देवताकी भाँति सत्यसंकल्प और सत्यकाम हो गयी थी। (वह जो चाहती, वही हो जाता था।) उसने सोचा, ये मेरे बन्धुजन मुझको और इन देवी सरस्वतीको साधारण स्त्रीके रूपमें देखें। उसके ऐसा संकल्प करते ही उस घरके लोगोंने वहाँ दो दिव्याङ्गनाओंको देखा, जो उस घरको अपनी प्रभासे उद्भासित कर रही थीं। वे दोनों लक्ष्मी और पार्वतीकी जोड़ी-सी जान पड़ती थीं। तदनन्तर ज्येष्ठशर्माने घरके अन्य लोगोंके साथ यह कहकर कि 'आप दोनों वन-देवियोंको नमस्कार है' उन दोनोंके लिये पुष्पाञ्जलि छोड़ी।

उस समय ज्येष्ठशर्मा आदि बोले—वनदेवियो ! आप दोनोंकी जय। निश्चय ही आप हमारे दुःखोंका नाश करनेके लिये आयी हैं; क्योंकि प्रायः दूसरोंका संकटसे उद्धार करना ही सत्पुरुषोंका अपना कार्य होता है।

ज्येष्ठशर्मा आदिके ऐसा कहनेके पश्चात् वे दोनों देवियाँ बड़े आदरसे बोलीं—'तुम सब लोग अपना वह दुःख बताओ, जिससे यह सारा जनसमुदाय दुखी दिखायी देता है।' तब उन ज्येष्ठशर्मा आदिने उन दोनों देवियोंसे क्रमशः ब्राह्मणदम्पतीके मरणरूप अपना सारा दुःख निवेदन किया।

ज्येष्ठशर्मा आदि बोले—देवियो ! यहाँ दो ब्राह्मण पति-पत्नी रहते थे, जिनका आपसमें बड़ा स्नेह था। वे यहाँ पधारे हुए सभी लोगोंका आतिथ्य-सत्कार करते थे। हमारी इस कुल-परम्पराके प्रवर्तक भी वे ही थे। द्विजातियोंकी मर्यादाके तो वे स्तम्भ ही थे। वे ही दोनों हमारे माता-पिता थे। इस समय पुत्रों, बन्धु-बान्धवों और पशुओंसहित इस घरको त्यागकर वे दोनों स्वर्गलोकको चले गये हैं, इससे हमें तीनों लोक सूने दिखायी देते हैं। इसलिये देवियो ! आप दोनों पहले हमारे इस शोकका निवारण करें, क्योंकि महात्माओंके दर्शन कभी निष्फल नहीं होते।

पुत्र ज्येष्ठशर्मा जब ऐसा कह चुका, तब माता लीलाने अपने हाथसे उसके मस्तकका स्पर्श किया। उसके उस स्पर्शसे ज्येष्ठशर्माके दुःख-दुर्भाग्यरूपी संकटका तत्काल निवारण हो गया। घरके सभी लोग उन दोनों देवियोंके दर्शनसे अमृत पीनेवाले देवताओंके समान दुःखसे मुक्त हो दिव्य शोभासे सम्पन्न हो गये।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! माता लीलाने अपने पुत्र ज्येष्ठशर्माको उसकी माताके रूपमें ही उसे क्यों नहीं दर्शन दिया ? आप पहले मेरे इस मोह (संदेह) का ही निराकरण कीजिये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा - रघुनन्दन ! मनुष्य जैसी भावना करता है, उसके अनुसार ही इन पदार्थोंका

**८—ब्रह्ममें जगत्‌का अध्यारोप, जीव एवं जगत्‌के रूपमें ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन ... १०९**

उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाकी सत्य-संकल्पता तथा उसे अपने अनेक जन्मोंकी स्मृति * १३३

अभ्यासजनित स्वरूप दिखायी देता है, किसी भी पदार्थका वास्तवमें कोई एक रूप नहीं है। लीलाने तो यह यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लिया था कि पृथ्वी आदि भूतोंका अस्तित्व कदापि नहीं है। चेतन आकाशरूप जो ब्रह्म है, वही कल्पनाद्वारा मिथ्या प्रपञ्चरूपसे प्रकट हो भासित हो रहा है (उसका ज्येष्ठशर्माके प्रति पुत्र-सम्बन्धी-स्नेह नहीं रह गया था, इसलिये उसे अपनी माताके रूपमें लीलाका दर्शन नहीं हुआ) सर्वत्र सभी रूपोंमें केवल एक चेतनाकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही विराजमान है—जिसे ऐसा बोध प्राप्त हो गया है, उस मुनिके लिये कौन, किस प्रकार, कब और किस निमित्त-से पुत्र, मित्र एवं कलत्र हो सकते हैं। दृश्य-प्रपञ्च तो सृष्टिके आदिमें ही उत्पन्न नहीं हुआ। जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह अजन्मा ब्रह्म ही है। ऐसे यथार्थ ज्ञानवाले लोगोंको राग-द्वेषसे युक्त दृष्टि कैसे प्राप्त हो सकती है।

(सर्ग २५-२६)


लीलाकी सत्य-संकल्पता, उसे अपने अनेक जन्मोंकी स्मृति, लीला और सरस्वतीका आकाशमें भ्रमण तथा परम व्योम—परमात्माकी अनादि-अनन्त सत्ताका प्रतिपादन

**श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—**रघुनन्दन ! उस पर्वतके तट-प्रान्तमें बसेहुए ग्रामके भीतर उस ब्राह्मणके गृहरूपी आकाश-में ही खड़ी हुई वे दोनों स्त्रियाँ सहसा अदृश्य हो गयीं। उस घरके लोगोंने समझा कि दोनों वनदेवियोंने हमपर बड़ी भारी कृपा की है, अतः उनका सारा दुःख मिट गया और वे अपने-अपने काम-धंधोंमें लग गये। तत्पश्चात् उस मण्डपाकाशमें दूसरोंकी दृष्टिसे तिरोहित हुई लीलासे, जो वहाँ मुस्कराती हुई चुपचाप खड़ी थी, सरस्वतीने कहा—

**श्रीसरस्वतीजी बोलीं—**बेटी ! तुमने ज्ञातव्य वस्तुको पूर्णरूपसे जान लिया है, द्रष्टव्य पदार्थोंको देख लिया है। इस प्रकारकी यह ब्रह्मसत्ता है। बताओ, अब और क्या पूछती हो ?

**लीलाने पूछा—**देवि ! मेरे मृत-पतिको जीव जहाँपर राज्य करता है, वहाँपर मुझे उन लोगोंने क्यों नहीं देखा ? और यहाँ मेरे पुत्रने कैसे देख लिया ?

**श्रीसरस्वतीजीने कहा—**सुन्दरी ! मैं लीला हूँ—ऐसा जो तुम्हारा दृढ़ संस्कार था, वह पहले नष्ट नहीं हुआ था; क्योंकि उस संस्कारको मिटानेके लिये तुमने वैसा अभ्यास नहीं किया। जबतक वह संस्कार बना था, तबतक तुम्हारी सत्य-संकल्पता प्रकट नहीं हुई थी। अब वह संस्कार मिट जानेसे तुम सत्य-संकल्प हो गयी हो। इसलिये जब तुमने यह अभिलाषा की कि मेरा पुत्र मुझे देखे, तब तुम्हारा वह मनोरथ तत्काल सफल हुआ। इस समय यदि तुम अपने पतिके समीप जाओ तो उसके साथ भी तुम्हारा सारा व्यवहार पहलेकी ही भाँति होने लगेगा।

**लीला बोलीं—**देवि ! इसी मण्डपके आकाशमें मेरे पतिदेव ब्राह्मण उत्पन्न हुए और इसीमें मृत्युको प्राप्त होकर राजा हो गये। अन्य भूमण्डलरूप उनका वह संसार भी यहीं है। इसमें जो उनकी राजधानीका

१३४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

नगर है, उसमें मैं उनकी राजमहिषीके रूपमें स्थित हूँ। यहीं उस अन्तःपुरमें मेरे पति राजा पद्मकी मृत्यु हुई और इसी अन्तःपुरके आकाशमें वह नगर है, जिसमें वे पुनः राजा हुए हैं। ब्रह्माजीसे उत्पन्न होनेके पश्चात् आजतक विभिन्न योनियोंमें जो मेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं, उनमेंसे आठ सौ जन्मोंको तो मैं इस समय पुनः देख-सी रही हूँ, उनकी सारी बातोंका स्पष्टरूपसे स्मरण कर रही हूँ। देवि! पहले किसी दूसरे संसार-मण्डलमें मैं लोकान्तररूपी कमलकी भ्रमरी—विद्याधर-राजकी धर्मपत्नी हुई थी। उन दिनों मेरा हृदय दुर्वासनाओंसे दूषित था। इसलिये उसके बाद मैं मनुष्ययोनिमें उत्पन्न हुई, तदनन्तर दूसरे संसार-मण्डलमें मैं नागराजकी भार्या हुई। इसके बाद कदम्ब, कुन्द, जम्बीर और करञ्जोंके वनमें निवास करनेवाली तथा वृक्षोंके पत्तोंको ही वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाली काली-कलूटी भीलनी हुई।

तदनन्तर पुरुषत्वरूपी फल देनेवाले कर्मोंके परिणाममें-से मैं सौ वर्षोंतक सौराष्ट्र देशमें श्रीसम्पन्न राजा होकर रही। फिर राजा-शरीरसे बने हुए दुष्कर्म-दोषके कारण ताड़ वृक्षके नीचे किसी नदीके कछारमें नौ वर्षोंतक नेवलीकी योनिमें रही। उस समय मेरे सारे अङ्ग कुष्ठ-रोगसे नष्टप्राय हो गये थे। देवि! उसके बाद मैं सौराष्ट्र देशमें आठ वर्षोंतक गौका शरीर धारण करके रही। उस योनिमें दुर्जन, दुष्ट, अज्ञ और बालक ग्वालों-की मारने-पीटने आदि क्रीड़ाओंका साधन बनी रही। फिर क्रमशः पक्षिणी, भ्रमरी, मनोहर नेत्रवाली हरिणी, मछली, पुलिन्द जातिकी स्त्री सारसी और राजहंसी हुई। इस प्रकार नाना प्रकारके शत-शत दुःखोंसे संकुल अनेकानेक योनियोंमें मैंने भ्रमण किया है। तराजूके पलड़ेकी भाँति कभी ऊँचे उठने और कभी नीचे गिरनेसे मेरे सारे अङ्ग व्याकुल होते रहे हैं। मैं संसाररूपी विशाल सरिताकी चञ्चल तरङ्ग बनकर उठती और विलीन

होती रही हूँ। जैसे वातप्रमी जातिकी हरिणीकी गतिको रोकना कठिन है, उसी प्रकार मैं दुर्निवार्य आवागमन-की परम्परामें पड़कर क्रमशः विभिन्न योनियोंमें भटकती आयी हूँ।

इस प्रकार परस्पर वार्तालाप करती हुई वे दोनों सुन्दरी ललनाएँ मनोहारिणी गतिसे उस घरके बाहर निकलीं। उस समय गाँवके लोग उन्हें नहीं देख पाते थे, परंतु वे दोनों अपने सामनेके पर्वतको अच्छी तरह देख रही थीं।

लीला बोलीं—देवि! इस देशको देखकर मैं आपकी कृपासे अपने पूर्वजन्मकी उन सभी विविध चेष्टाओंका स्मरण करती हूँ, जो यहाँ घटित हुई हैं; मैं यहाँ बूढ़ी ब्राह्मणीके रूपमें रहती थी। मेरे सारे अङ्ग उभरी हुई नस-नाड़ियोंसे व्याप्त दिखायी देते थे। मैं बहुत दुबली-पतली थी। मेरा शरीर गौर और बाल सफेद थे। मेरी हथेली सूखे कुशों-के अग्रभागसे छिन्न-भिन्न होती रहनेके कारण रूखी हो गयी थी। मैं अपने पतिदेवके कुलकी वृद्धि करनेवाली

उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाकी सत्य-संकल्पता तथा उसे अपने अनेक जन्मोंकी स्मृति * १३५

भार्या थी । दूध और मथानी मेरी शोभा बढ़ाते थे । मैं सारे पुत्रोंकी अकेली माता और अतिथियोंका सत्कार करनेवाली गृहिणी थी । देवताओं, ब्राह्मणों और संत-महात्माओंके प्रति मेरे मनमें बड़ी भक्ति थी । मैं मर्जनपात्र, चरुस्थाली तथा कलश आदि पात्रों एवं यज्ञके अन्य उपकरणोंको धो-पोंछकर साफ-सुथरा रखती थी । जमाई, बेटी, भाई, पिता और माताकी सदा सेवा-शुश्रूषा करती थी । जबतक मेरा शरीर रहा, तबतक घरकी ही सेवा-टहलमें मेरे दिन-रात बीतते थे । 'ओह ! इस काममें बहुत देर हो गयी, बड़ा विलम्ब हुआ' इत्यादि बातें कहती और निरन्तर कार्यमें व्यस्त रहती थी । 'मैं कौन हूँ, यह संसार कैसा है ?' इस बातकी चर्चा या इन प्रश्नोंपर विचार कभी स्वप्नमें भी मैंने नहीं किया । मेरे पति श्रोत्रिय होनेके साथ ही तत्त्व-विचारमें मूढ़ थे । मेरे ही समान उनकी भी घरमें आसक्ति बनी हुई थी । उनकी बुद्धि शुद्ध नहीं थी । समिधा, साग, गोबर और ईंधनके संग्रहमें ही मेरी एकमात्र निष्ठा थी । घरके पास खेतोंमें जो साग-सब्जीकी क्यारियाँ थीं, उन्हें सींचनेके लिये मैं जल्दी-जल्दी जलपात्र लेकर आनेके निमित्त नौकरोंको पुकारा करती थी । जलकी लहरोंके किनारे जो हरी-हरी घासें उगी होती थीं, उन्हें स्वयं लाकर मैं अपनी छोटी-सी बछियाको तृप्त किया करती थी । प्रतिक्षण घरके दरवाजेको लीपकर वहाँ चौक बनाती और उसमें भाँति-भाँतिके रंग भरकर सजा देती थी । घरके नौकरोंको शिक्षा देनेके लिये मैं कुछ दीनताके साथ नम्रतापूर्वक समझाती कि 'लोग तुम्हारी निन्दा करेंगे, इसलिये तुम्हें विनय और सदाचारसे रहना चाहिये ।' जैसे समुद्र अपनी तटभूमिको लङ्घन न करके निरन्तर मर्यादामें स्थित रहता है, उसी प्रकार मैं भी धर्म-मर्यादाके नियमसे कभी च्युत नहीं होती थी ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यों कहकर उस पर्वतीय ग्रामके भीतर भ्रमण करती हुई लीलाने अपने साथ विचरती हुई सरस्वती देवीको मन्द मुस्कान-के साथ वहाँकी एक-एक वस्तुको दिखाया । फिर वह इस प्रकार बोली—'देवि ! इस घरके आकाशमें ही वह मेरे पतिका जीव राजाके रूपमें रह रहा है । यहाँ अङ्गुष्ठमात्र गृहाकाशके भीतर ही स्थित परमार्थ वस्तु (परब्रह्म) को मैंने भ्रमसे करोड़ों योजन विस्तृत पति-का राज्य समझा था । जगदीश्वरि ! हम दोनों चेतन-आकाशरूप परमात्मा ही हैं । मेरे पतिदेवका राज्य, जो सहस्रों पर्वतोंसे भरा हुआ है आकाशमें ही स्थित है । यह बहुत बड़ी माया फैली हुई है । इसलिये देवि ! अपने पतिके नगरमें जानेकी पुनः मेरी इच्छा हो रही है । अतः चलिये, हम दोनों वहाँ चलें । जिन्होंने कहीं जानेका निश्चय कर लिया हो, उनके लिये वह स्थान क्या दूर है ?'

यों कहकर लीलाने देवीको प्रणाम किया और शीघ्र ही गृह-मण्डपमें प्रवेशकर सरस्वती देवीके साथ वह आकाशमें उड़ चली । भगवान् विष्णुकी अङ्गकान्ति-

१३६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


के समान नीले मेघपथको लाँघकर वे प्रवह आदि सात वायुओंके लोकमें जा पहुँचीं। फिर वहाँसे सौरमार्ग तथा चन्द्रमार्गको लाँघती हुई वे ध्रुवमार्गसे भी ऊपर पहुँच गयीं। इसके बाद साध्योंके मार्गसे ऊपर उठकर सिद्धोंकी भूमिको भी लाँघ गयीं और खर्गमण्डलको भी लाँघकर अत्यन्त दूर जानेपर लीलाको कुछ बोध हुआ। फिर उसने पीछे फिरकर पार किये हुए आकाश-स्थलका अवलोकन किया। वहाँसे नीचे देखनेपर चन्द्रमा, सूर्य और तारा आदि कुछ भी नहीं दिखायी देते थे। केवल अन्धकार-ही-अन्धकार था।

तब लीलाने पूछा—देवि ! बताओ, सूर्य आदिका तेज नीचे कहाँ चला गया ? पत्थरके मध्यभागकी भाँति सुदृढ़ एवं घनीभूत होनेके कारण मुट्ठीमें लेने योग्य यह अन्धकार कहाँसे आ गया ?

श्रीसरस्वती देवीने कहा—बेटी ! तुम इतनी दूर आकाश-मार्गमें आ गयी हो कि यहाँसे सूर्य आदि तेज भी नहीं दिखायी देते।

लीला बोली—देवि ! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है। क्या हम दोनों आकाश-मार्गमें इतनी दूर आ गयीं जहाँसे नीचे सूर्यदेव भी परमाणुके कणकी भाँति तनिक भी दिखायी नहीं देते ? माताजी ! इससे आगे दूसरा मार्ग कौन और कैसा होगा और उसमें कैसे जाना होगा ? देवि ! यह सब मुझे बताइये।

श्रीसरस्वती देवीने कहा—बेटी ! इसके बाद आगे तुम्हें ब्रह्माण्ड-सम्पुटके ऊपरी कपालमें जाना है।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे दो भ्रमरियाँ पर्वतकी चट्टानोंसे बनी हुई घनीभूत मण्डपवाली दीवालपर पहुँच जायें, उसी प्रकार आपसमें उपर्युक्त बातें करती हुई वे दोनों देवियाँ ब्रह्माण्ड-सम्पुटके ऊपरवाले कपालतक पहुँच गयीं। साथ ही जैसे कोई आकाशसे निकले, उसी तरह वे वहाँसे अनायास ही बाहर निकल गयीं। जो वस्तु सत्यताके दृढ़ निश्चयसे युक्त होती है, वही वज्रके समान ठोस और भारी होती है और जो इससे भिन्न कल्पित दीवार आदि वस्तु है, वह मिथ्यात्व-बुद्धिसे बाधित हो जाती है। लीलाका विज्ञान आवरणशून्य था। इसलिये वह ब्रह्माण्ड-सम्पुटके ऊपरवाले कपालको मिथ्यात्व-बुद्धिसे बाधित करके उससे बाहर निकल गयी। ब्रह्माण्डके पार जानेपर उसे अत्यन्त प्रकाशमान जल आदिका आवरण दिखायी दिया, जो सब ओर व्याप्त था। उस आवरण-समुदायमें जो जलका आवरण है, उसमें ब्रह्माण्डकी अपेक्षा दसगुना जल विद्यमान है। उसके बाद उससे भी दसगुना अग्निमय आवरण है। फिर उससे भी दसगुनी वायु और उससे भी दसगुने आकाशके आवरण हैं। तदनन्तर विशुद्ध चिन्मय आकाश है। उस परम व्योम (चेतनाकाश) रूप परब्रह्म परमात्मामें आदि, मध्य और अन्तकी कोई कल्पनाएँ नहीं उदित होतीं (वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण एवं अपरिच्छिन्न है)। वह अद्वितीय, सर्वव्यापी, शान्त, आदि अथवा कारणसे रहित, भ्रमशून्य, अनादि, अनन्त, मध्यरहित तथा अपनी ही महिमामें प्रतिष्ठित है। उस निर्मल चेतनाकाशस्वरूप परमात्मामें यदि एक कल्पतक बड़े भारी वेगसे ऊपरसे नीचेको पत्थरकी शिला गिरती रहे और नीचेसे पक्षिराज गरुड़ भी अपना सारा बल लगाकर ऊपरको उड़े तथा उनके बीचमें सबको मापनेमें समर्थ वायु समान वेगसे दोनों ओर बहे तो यह भी उन दोनोंका संयोग नहीं करा सकती।

(सर्ग २७-२९)

उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाद्वारा ब्रह्माण्डोंका निरीक्षण, शूरके लक्षण तथा डिम्बाहवकी परिभाषा * १३७


लीलाद्वारा ब्रह्माण्डोंका निरीक्षण, दोनों देवियोंका भारतवर्षमें लीलाके पतिके राज्यमें जाना और वहाँ युद्धका आयोजन देखना; शूरके लक्षण तथा डिम्बाहवकी परिभाषा

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर लीलाने उस अपरिमित चेतन आकाशस्वरूप परमात्मामें इस जगत्‌की ही भाँति फैले हुए अनन्त ब्रह्माण्डोंको देखा । जैसे धूप निकलनेपर जंगलेके छेदसे जो किरणें घरमें आती हैं, उनके अन्तर्गत आकाशमें असंख्य त्रसरेणु दृष्टिगोचर होते हैं, उसी प्रकार लीलाने उन सभी ब्रह्माण्डोंमें सृष्टियोंको देखा, जो स्वयं-प्रकाश अधिष्ठानभूत चैतन्यसे भासित थीं । अविद्यारूपी जलसे भरे हुए महाकाशरूपी महासागरमें महाचैतन्यके स्फुरणरूप द्रवीभावसे प्रकट हुए असंख्य ब्रह्माण्डरूपी बुद्बुदोंको लीलाने लक्ष्य किया ।

जिसकी दृष्टि अज्ञानसे दूषित है, उसी पुरुषका असीम एवं महान् चेतन आकाशस्वरूप परमात्मामें सम्पूर्ण आवरणोंसे युक्त ये ब्रह्माण्ड प्रतीत होते हैं । सारे ही पदार्थ परतन्त्र होनेके कारण वेगपूर्वक इधर-उधर भाग रहे हैं ( उनमें परस्पर आकर्षण होनेके कारण वे गिरते नहीं।) ब्रह्माण्डमें जो महापृथ्वीरूप भाग है, वह उसका अधोभाग है और उससे भिन्न जो आकाश है, वह उसका ऊपरी भाग है । जैसे गोल मिट्टीके ढेलेमें दसों दिशाओंकी ओरसे सटी हुई चींटियोंके जो पैर होते हैं, वे ही उनके लिये अधोभाग हैं और जिस ओर उनकी पीठ रहती है, वही ऊपरका भाग है, उसी प्रकार दसों दिशाओंमें संलग्न जो पैर हैं, वे ही नीचेके भाग कहलाते हैं और आकाशकी ओर जो पीठ या सिर होते हैं, उन्हें ऊर्ध्वभागमें स्थित बताया गया है—यह बड़े-बड़े विद्वानोंका कथन है । किन्हीं-किन्हीं ब्रह्माण्डोंके भीतरकी भूमि वृक्षों और वल्मीकोंके समूहसे व्याप्त है ( उसमें मनुष्य नहीं हैं ) और उन ब्रह्माण्डोंका निर्मल आकाश देवता, किन्नर तथा दैत्योंसे युक्त विभिन्न लोकोंसे वेष्टित है । जैसे पका हुआ

सं० यो० व० अं० ६—

अखरोटका फल छिलकेसे ढका रहता है, उसी प्रकार कुछ ब्रह्माण्ड तत्काल कल्पित जरायुज, उद्भिज्ज, अण्डज और स्वेदज—चार प्रकारके प्राणियों तथा ग्राम, नगर और पर्वतोंसे युक्त होकर उत्पन्न हुए हैं । स्थितिकालमें सम्पूर्ण पदार्थ चेतन परब्रह्म परमात्मामें रहते हैं । सृष्टिकालमें उससे उत्पन्न होते हैं और प्रलयकालमें सब उसीमें लीन हो जाते हैं । अतः सम्पूर्ण दिशाओं, कालों और वस्तुओंमें वही है । उससे अतिरिक्त कोई नहीं है। वही नित्य, सर्वमय आत्मा है । उस परम प्रकाशके सागर शुद्ध बोधमय चेतन आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें ब्रह्माण्ड नामक तरङ्गें निरन्तर उठती और विलीन होती रहती हैं । किन्हीं ब्रह्माण्डोंमें महाप्रलयकी प्राप्ति होनेपर जैसे सूर्यका ताप लगनेसे हिमकण गल जाते हैं, उसी प्रकार सूर्य, अग्नि, विद्युत् और पर्वत भी गलने लगते हैं । कुछ ब्रह्माण्डोंके आदिपुरुष ( सृष्टिकर्ता ) ब्रह्मा हैं । कुछके आदिस्रष्टा और पालक भगवान् विष्णु हैं । कुछ ब्रह्माण्डोंके प्रजापति दूसरे ( रुद्र एवं दुर्गा आदि हैं ) तथा कुछ ब्रह्माण्डोंमें जो जीव जन्तु हैं, उनका कोई भी नाथ ( रक्षक या नियन्त्रण करनेवाला ) नहीं होता । इसी तरह कुछ ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि और प्रजापति विचित्र ही हैं । महामते ! जगत्‌के वर्णनके विषयमें हमारी बुद्धिका जो सम्पूर्ण वैभव था, उसे हम दिखला चुके । उसके बाद जो जगत् है, वह हमारी बुद्धिका विषय नहीं है । अतः उसका वर्णन करनेमें हम असमर्थ हैं ।

अपने पूर्वजन्मके संसारसे निकलकर पूर्वोक्त रीतिसे अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंकी विचित्रताको देखती हुई उन दोनों स्त्रियोंने किसी ब्रह्माण्डमें प्रवेश करके वहाँके अन्तःपुरको देखा और फिर वहाँ वे शीघ्र ही बाहर निकल आयीं । उस अन्तःपुरमें पुष्पराशिसे आच्छादित महाराज पद्मका

१३८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


महान् शव रक्खा था। उस शवके पास ही बैठी हुई लीलाका स्थूलशरीर था, जिसका चित्त समाधि-अवस्था-में आरूढ़ था। शोकके कारण रात्रि बड़ी प्रतीत होनेसे वहाँके लोग कुछ-कुछ प्रगाढ़ निद्रासे युक्त थे। वह अन्तःपुर धूप, चन्दन, कपूर और केसरकी सुगन्धसे भरा था। उसे देखकर लीलाको पतिके दूसरे संसारमें जानेकी इच्छा हुई (अर्थात् राजा पद्म मृत्युके पश्चात् जहाँ उत्पन्न हुए थे, वहाँ जानेके लिये वह उत्कण्ठित हुई) तब वे दोनों देवियाँ विभिन्न लोकों, पर्वतों और आकाशको लाँघकर भूतलपर पहुँचीं, जो पर्वतमालाओं तथा समुद्रोंसे घिरा हुआ था। तत्पश्चात् मेरुपर्वतसे अलंकृत जम्बूद्वीपमें गयीं, जिसका भीतरी भाग नौ खण्डोंमें विभक्त है। जम्बूद्वीपके भीतर भारतवर्षमें लीलाके पतिका राज्य था। वहीं वे दोनों जा पहुँचीं। इसी समय जो भूमण्डलका मण्डन था, उस राज्यमें किसी राजाने आक्रमण किया। अपने सहायभूत सामन्तोंके कारण उस आक्रमणकारी भूपालकी शक्ति बहुत बढ़ी-चढ़ी थी। उस राजाके साथ संग्राम छिड़नेपर उसे देखनेके लिये आये हुए तीनों लोकोंके प्राणियोंसे वहाँका आकाश ठसाठस भर गया। उक्त दोनों देवियाँ निश्शङ्क होकर वहाँ आ गयीं। उन्होंने उस आकाशको आकाशचारी प्राणियोंके समुदायसे इस तरह आक्रान्त देखा, मानो वहाँ मेघोंकी घटा घिर आयी हो। स्वर्गलोकमें स्थान पाने योग्य शूरवीरोंको लानेके लिये व्यग्र हुए इन्द्रके भट वहाँके आकाशको उद्भासित कर रहे थे।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! 'शूर' शब्दसे किस तरहके योद्धाका प्रतिपादन किया जाता है? कौन स्वर्गका अलंकार है अथवा कौन डिम्बाहव (बच्चोंका युद्ध) कहलाता है?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन! जो शास्त्रोक्त सदाचारसे युक्त स्वामीके लिये रणभूमिमें युद्ध करता है, वह चाहे मरे या विजयी हो दोनों अवस्थाओंमें शूर कहा गया है। वही स्वर्गलोकका भागी होता है। पूर्वोक्त विधिसे विपरीत अत्याचारी स्वामीके लिये युद्ध करके जो रणभूमिमें किसी प्राणीके द्वारा अङ्गोंके कट जानेसे मृत्युको प्राप्त होता है, वह डिम्बाहवमें मारा गया कहलाता है। ऐसा मनुष्य नरकगामी होता है। जिसका आचरण शास्त्रके अनुकूल नहीं है, उसके लिये जो मनुष्य युद्ध करता है, वह यदि संग्राममें मारा जाय तो उसे सदा बने रहनेवाले नरककी प्राप्ति होती है। यथासम्भव शास्त्रकी आज्ञा और लोकाचारका पालन करनेवाला जो व्यक्ति रणभूमि में (धर्म) युद्ध करता है तथा वैसे ही सदाचारी स्वामीका भक्त होता है, वह शूर कहलाता है। शुद्ध-बुद्धिवाले रघुनन्दन! जो गौ, ब्राह्मण तथा मित्रकी रक्षाके लिये प्राण देता है अथवा शरणागतकी रक्षाके लिये यत्न करते हुए मारा जाता है, वह शूरवीर स्वर्गलोकका अलंकार है। * राजाके लिये अपना देश सदा ही रक्षणीय होता


* गोरर्थे ब्राह्मणस्यार्थे मित्रस्यार्थे च सन्मते।
शरणागतयत्नेन स मृतः स्वर्गभूषणम् ॥
(उत्पत्ति० ३१। २८)

उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीला और सरस्वतीका आकाशमें विमानपर स्थित हो युद्धका दृश्य देखना * १३९


है। जो राजा एकमात्र उसीकी रक्षामें लगा रहता है, उसके लिये जो युद्धमें मारे जाते हैं, वे ही वीर हैं और उन्हींको वीरलोककी प्राप्ति होती है। जो प्रजाके प्रति उपद्रव करनेमें ही लगा रहता है, वह राजा हो या न हो, वैसे स्वामीके लिये जो युद्धमें प्राण देते हैं, वे निश्चय ही नरकगामी हैं। जो शास्त्रके प्रतिकूल आचरण करनेवाले हैं, वे राजा हों या न हों, उनके लिये जो युद्धमें अपने अङ्गोंको कटाकर मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे निस्संदेह नरकमें गिरते हैं। जो सदाचारी पुरुषोंके लिये तलवारकी धारको सहते हैं, वे शूरवीर कहे जाते हैं। शेष सभी लोग डिम्भाहवमें मारे गये कहलाते हैं।

( सर्ग ३०-३१ )


लीला और सरस्वतीका आकाशमें विमानपर स्थित हो युद्धका दृश्य देखना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर आकाशमें स्थित हुई सरस्वती-देवीसहित लीलाने भूतल-पर पतिदेवके द्वारा सुरक्षित, सैन्यबलसे सम्पन्न राष्ट्रमण्डलमें आमने-सामने दो सेनाएँ देखीं, जो एक दूसरेके प्रति क्षोभसे भरी हुई थीं। दोनों ही मतवाली दिखायी देती थीं। दोनों महान् आयोजनमें संलग्न एवं घनी थीं। उनमें उभय पक्षोंके दो राजा विद्यमान थे। दोनों सेनाएँ युद्धके लिये सुसज्जित थीं, कवच और शिरस्त्राण आदिसे संनद्ध थीं तथा प्रज्वलित अग्निके समान अद्भुत दिखायी देती थीं। पहले कौन प्रहार अथवा अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करता है, यह देखनेके लिये क्षुब्ध हुए असंख्य नेत्र उन्हें एकटक दृष्टिसे देख रहे थे। ऊपर उठी हुई चमचमाती तलवारोंकी धारें ही मानो धारावाहिक वृष्टि थीं, जिसे दोनों सेनाओंके सैनिक अपने अङ्गोंपर वहन करते थे। फरसे, भाले, भिन्दिपाल, ऋष्टि और मुद्गर आदि अस्त्र-शस्त्र वहाँ चमक रहे थे।

जिन्हें रोकना असम्भव था, ऐसी उन दोनों विशाल सेनाओंके तुमुल नादसे लोगोंको आपसकी बातचीत तक नहीं सुनायी देती थी। राजाकी आज्ञाके बिना कोई पहले प्रहार न कर बैठे, इस आशङ्कासे बहुत देरतक दोनों सेनाओंमें रणदुन्दुभि न बज सकी। अपने-अपने स्थानमें श्रेणीबद्ध होकर खड़े हुए सैनिक ही जिनके अङ्ग थे, उन सम्पूर्ण टुकड़ियोंसे भरी-पूरी होनेके कारण वे दोनों सेनाएँ मन्थरगतिसे आगे बढ़ रही थीं। उनमें असंख्य सैनिक अपने प्राणरूपी सर्वस्वको लुटा देनेके लिये उद्यत थे। सभी धनुर्धर वीर कानतक खींचे गये बाणसमूहोंकी धारावाहिक वृष्टि करनेके लिये उत्सुक थे। प्रहार करनेके आदेशकी परीक्षामें अगणित योद्धा वहाँ निश्चल खड़े थे।

तदनन्तर लीला और सरस्वती दोनों देवियाँ उस युद्धको देखनेके लिये वहीं रुके हुए एक सुन्दर, सुस्थिर एवं मनःकल्पित विमानपर आरूढ़ हुईं। इतनेमें ही दोनों सेनाओंमें आमने-सामने संघर्ष आरम्भ होनेपर शत्रु-पक्षकी सेनासे प्रलयकालिक समुद्रसे उठी हुई एक तरङ्गकी भाँति कोई निर्भय योद्धा निकला और आगे बढ़ा। वह प्रहार करना ही चाहता था कि लीलाके पतिने, जो पूर्वजन्ममें पद्म था और वर्तमान जन्ममें विदूरथके नामसे विख्यात था, उसके आक्रमणको सहनेमें असमर्थ होकर पर्वतके शिखरपर गिरायी हुई शिलाकी भाँति उस विपक्षी योद्धाकी छातीपर मुद्गरका प्रहार किया। फिर तो दोनों