संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * लीला और सरस्वतीका आकाशमें विमानपर स्थित हो युद्धका दृश्य देखना * १३९
है। जो राजा एकमात्र उसीकी रक्षामें लगा रहता है, उसके लिये जो युद्धमें मारे जाते हैं, वे ही वीर हैं और उन्हींको वीरलोककी प्राप्ति होती है। जो प्रजाके प्रति उपद्रव करनेमें ही लगा रहता है, वह राजा हो या न हो, वैसे स्वामीके लिये जो युद्धमें प्राण देते हैं, वे निश्चय ही नरकगामी हैं। जो शास्त्रके प्रतिकूल आचरण करनेवाले हैं, वे राजा हों या न हों, उनके लिये जो युद्धमें अपने अङ्गोंको कटाकर मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे निस्संदेह नरकमें गिरते हैं। जो सदाचारी पुरुषोंके लिये तलवारकी धारको सहते हैं, वे शूरवीर कहे जाते हैं। शेष सभी लोग डिम्भाहवमें मारे गये कहलाते हैं।
( सर्ग ३०-३१ )
लीला और सरस्वतीका आकाशमें विमानपर स्थित हो युद्धका दृश्य देखना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर आकाशमें स्थित हुई सरस्वती-देवीसहित लीलाने भूतल-पर पतिदेवके द्वारा सुरक्षित, सैन्यबलसे सम्पन्न राष्ट्रमण्डलमें आमने-सामने दो सेनाएँ देखीं, जो एक दूसरेके प्रति क्षोभसे भरी हुई थीं। दोनों ही मतवाली दिखायी देती थीं। दोनों महान् आयोजनमें संलग्न एवं घनी थीं। उनमें उभय पक्षोंके दो राजा विद्यमान थे। दोनों सेनाएँ युद्धके लिये सुसज्जित थीं, कवच और शिरस्त्राण आदिसे संनद्ध थीं तथा प्रज्वलित अग्निके समान अद्भुत दिखायी देती थीं। पहले कौन प्रहार अथवा अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करता है, यह देखनेके लिये क्षुब्ध हुए असंख्य नेत्र उन्हें एकटक दृष्टिसे देख रहे थे। ऊपर उठी हुई चमचमाती तलवारोंकी धारें ही मानो धारावाहिक वृष्टि थीं, जिसे दोनों सेनाओंके सैनिक अपने अङ्गोंपर वहन करते थे। फरसे, भाले, भिन्दिपाल, ऋष्टि और मुद्गर आदि अस्त्र-शस्त्र वहाँ चमक रहे थे।
जिन्हें रोकना असम्भव था, ऐसी उन दोनों विशाल सेनाओंके तुमुल नादसे लोगोंको आपसकी बातचीत तक नहीं सुनायी देती थी। राजाकी आज्ञाके बिना कोई पहले प्रहार न कर बैठे, इस आशङ्कासे बहुत देरतक दोनों सेनाओंमें रणदुन्दुभि न बज सकी। अपने-अपने स्थानमें श्रेणीबद्ध होकर खड़े हुए सैनिक ही जिनके अङ्ग थे, उन सम्पूर्ण टुकड़ियोंसे भरी-पूरी होनेके कारण वे दोनों सेनाएँ मन्थरगतिसे आगे बढ़ रही थीं। उनमें असंख्य सैनिक अपने प्राणरूपी सर्वस्वको लुटा देनेके लिये उद्यत थे। सभी धनुर्धर वीर कानतक खींचे गये बाणसमूहोंकी धारावाहिक वृष्टि करनेके लिये उत्सुक थे। प्रहार करनेके आदेशकी परीक्षामें अगणित योद्धा वहाँ निश्चल खड़े थे।
तदनन्तर लीला और सरस्वती दोनों देवियाँ उस युद्धको देखनेके लिये वहीं रुके हुए एक सुन्दर, सुस्थिर एवं मनःकल्पित विमानपर आरूढ़ हुईं। इतनेमें ही दोनों सेनाओंमें आमने-सामने संघर्ष आरम्भ होनेपर शत्रु-पक्षकी सेनासे प्रलयकालिक समुद्रसे उठी हुई एक तरङ्गकी भाँति कोई निर्भय योद्धा निकला और आगे बढ़ा। वह प्रहार करना ही चाहता था कि लीलाके पतिने, जो पूर्वजन्ममें पद्म था और वर्तमान जन्ममें विदूरथके नामसे विख्यात था, उसके आक्रमणको सहनेमें असमर्थ होकर पर्वतके शिखरपर गिरायी हुई शिलाकी भाँति उस विपक्षी योद्धाकी छातीपर मुद्गरका प्रहार किया। फिर तो दोनों