संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
महान् शव रक्खा था। उस शवके पास ही बैठी हुई लीलाका स्थूलशरीर था, जिसका चित्त समाधि-अवस्था-में आरूढ़ था। शोकके कारण रात्रि बड़ी प्रतीत होनेसे वहाँके लोग कुछ-कुछ प्रगाढ़ निद्रासे युक्त थे। वह अन्तःपुर धूप, चन्दन, कपूर और केसरकी सुगन्धसे भरा था। उसे देखकर लीलाको पतिके दूसरे संसारमें जानेकी इच्छा हुई (अर्थात् राजा पद्म मृत्युके पश्चात् जहाँ उत्पन्न हुए थे, वहाँ जानेके लिये वह उत्कण्ठित हुई) तब वे दोनों देवियाँ विभिन्न लोकों, पर्वतों और आकाशको लाँघकर भूतलपर पहुँचीं, जो पर्वतमालाओं तथा समुद्रोंसे घिरा हुआ था। तत्पश्चात् मेरुपर्वतसे अलंकृत जम्बूद्वीपमें गयीं, जिसका भीतरी भाग नौ खण्डोंमें विभक्त है। जम्बूद्वीपके भीतर भारतवर्षमें लीलाके पतिका राज्य था। वहीं वे दोनों जा पहुँचीं। इसी समय जो भूमण्डलका मण्डन था, उस राज्यमें किसी राजाने आक्रमण किया। अपने सहायभूत सामन्तोंके कारण उस आक्रमणकारी भूपालकी शक्ति बहुत बढ़ी-चढ़ी थी। उस राजाके साथ संग्राम छिड़नेपर उसे देखनेके लिये आये हुए तीनों लोकोंके प्राणियोंसे वहाँका आकाश ठसाठस भर गया। उक्त दोनों देवियाँ निश्शङ्क होकर वहाँ आ गयीं। उन्होंने उस आकाशको आकाशचारी प्राणियोंके समुदायसे इस तरह आक्रान्त देखा, मानो वहाँ मेघोंकी घटा घिर आयी हो। स्वर्गलोकमें स्थान पाने योग्य शूरवीरोंको लानेके लिये व्यग्र हुए इन्द्रके भट वहाँके आकाशको उद्भासित कर रहे थे।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! 'शूर' शब्दसे किस तरहके योद्धाका प्रतिपादन किया जाता है? कौन स्वर्गका अलंकार है अथवा कौन डिम्बाहव (बच्चोंका युद्ध) कहलाता है?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन! जो शास्त्रोक्त सदाचारसे युक्त स्वामीके लिये रणभूमिमें युद्ध करता है, वह चाहे मरे या विजयी हो दोनों अवस्थाओंमें शूर कहा गया है। वही स्वर्गलोकका भागी होता है। पूर्वोक्त विधिसे विपरीत अत्याचारी स्वामीके लिये युद्ध करके जो रणभूमिमें किसी प्राणीके द्वारा अङ्गोंके कट जानेसे मृत्युको प्राप्त होता है, वह डिम्बाहवमें मारा गया कहलाता है। ऐसा मनुष्य नरकगामी होता है। जिसका आचरण शास्त्रके अनुकूल नहीं है, उसके लिये जो मनुष्य युद्ध करता है, वह यदि संग्राममें मारा जाय तो उसे सदा बने रहनेवाले नरककी प्राप्ति होती है। यथासम्भव शास्त्रकी आज्ञा और लोकाचारका पालन करनेवाला जो व्यक्ति रणभूमि में (धर्म) युद्ध करता है तथा वैसे ही सदाचारी स्वामीका भक्त होता है, वह शूर कहलाता है। शुद्ध-बुद्धिवाले रघुनन्दन! जो गौ, ब्राह्मण तथा मित्रकी रक्षाके लिये प्राण देता है अथवा शरणागतकी रक्षाके लिये यत्न करते हुए मारा जाता है, वह शूरवीर स्वर्गलोकका अलंकार है। * राजाके लिये अपना देश सदा ही रक्षणीय होता
* गोरर्थे ब्राह्मणस्यार्थे मित्रस्यार्थे च सन्मते।
शरणागतयत्नेन स मृतः स्वर्गभूषणम् ॥
(उत्पत्ति० ३१। २८)