भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 172

उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाद्वारा ब्रह्माण्डोंका निरीक्षण, शूरके लक्षण तथा डिम्बाहवकी परिभाषा * १३७


लीलाद्वारा ब्रह्माण्डोंका निरीक्षण, दोनों देवियोंका भारतवर्षमें लीलाके पतिके राज्यमें जाना और वहाँ युद्धका आयोजन देखना; शूरके लक्षण तथा डिम्बाहवकी परिभाषा

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर लीलाने उस अपरिमित चेतन आकाशस्वरूप परमात्मामें इस जगत्‌की ही भाँति फैले हुए अनन्त ब्रह्माण्डोंको देखा । जैसे धूप निकलनेपर जंगलेके छेदसे जो किरणें घरमें आती हैं, उनके अन्तर्गत आकाशमें असंख्य त्रसरेणु दृष्टिगोचर होते हैं, उसी प्रकार लीलाने उन सभी ब्रह्माण्डोंमें सृष्टियोंको देखा, जो स्वयं-प्रकाश अधिष्ठानभूत चैतन्यसे भासित थीं । अविद्यारूपी जलसे भरे हुए महाकाशरूपी महासागरमें महाचैतन्यके स्फुरणरूप द्रवीभावसे प्रकट हुए असंख्य ब्रह्माण्डरूपी बुद्बुदोंको लीलाने लक्ष्य किया ।

जिसकी दृष्टि अज्ञानसे दूषित है, उसी पुरुषका असीम एवं महान् चेतन आकाशस्वरूप परमात्मामें सम्पूर्ण आवरणोंसे युक्त ये ब्रह्माण्ड प्रतीत होते हैं । सारे ही पदार्थ परतन्त्र होनेके कारण वेगपूर्वक इधर-उधर भाग रहे हैं ( उनमें परस्पर आकर्षण होनेके कारण वे गिरते नहीं।) ब्रह्माण्डमें जो महापृथ्वीरूप भाग है, वह उसका अधोभाग है और उससे भिन्न जो आकाश है, वह उसका ऊपरी भाग है । जैसे गोल मिट्टीके ढेलेमें दसों दिशाओंकी ओरसे सटी हुई चींटियोंके जो पैर होते हैं, वे ही उनके लिये अधोभाग हैं और जिस ओर उनकी पीठ रहती है, वही ऊपरका भाग है, उसी प्रकार दसों दिशाओंमें संलग्न जो पैर हैं, वे ही नीचेके भाग कहलाते हैं और आकाशकी ओर जो पीठ या सिर होते हैं, उन्हें ऊर्ध्वभागमें स्थित बताया गया है—यह बड़े-बड़े विद्वानोंका कथन है । किन्हीं-किन्हीं ब्रह्माण्डोंके भीतरकी भूमि वृक्षों और वल्मीकोंके समूहसे व्याप्त है ( उसमें मनुष्य नहीं हैं ) और उन ब्रह्माण्डोंका निर्मल आकाश देवता, किन्नर तथा दैत्योंसे युक्त विभिन्न लोकोंसे वेष्टित है । जैसे पका हुआ

सं० यो० व० अं० ६—

अखरोटका फल छिलकेसे ढका रहता है, उसी प्रकार कुछ ब्रह्माण्ड तत्काल कल्पित जरायुज, उद्भिज्ज, अण्डज और स्वेदज—चार प्रकारके प्राणियों तथा ग्राम, नगर और पर्वतोंसे युक्त होकर उत्पन्न हुए हैं । स्थितिकालमें सम्पूर्ण पदार्थ चेतन परब्रह्म परमात्मामें रहते हैं । सृष्टिकालमें उससे उत्पन्न होते हैं और प्रलयकालमें सब उसीमें लीन हो जाते हैं । अतः सम्पूर्ण दिशाओं, कालों और वस्तुओंमें वही है । उससे अतिरिक्त कोई नहीं है। वही नित्य, सर्वमय आत्मा है । उस परम प्रकाशके सागर शुद्ध बोधमय चेतन आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें ब्रह्माण्ड नामक तरङ्गें निरन्तर उठती और विलीन होती रहती हैं । किन्हीं ब्रह्माण्डोंमें महाप्रलयकी प्राप्ति होनेपर जैसे सूर्यका ताप लगनेसे हिमकण गल जाते हैं, उसी प्रकार सूर्य, अग्नि, विद्युत् और पर्वत भी गलने लगते हैं । कुछ ब्रह्माण्डोंके आदिपुरुष ( सृष्टिकर्ता ) ब्रह्मा हैं । कुछके आदिस्रष्टा और पालक भगवान् विष्णु हैं । कुछ ब्रह्माण्डोंके प्रजापति दूसरे ( रुद्र एवं दुर्गा आदि हैं ) तथा कुछ ब्रह्माण्डोंमें जो जीव जन्तु हैं, उनका कोई भी नाथ ( रक्षक या नियन्त्रण करनेवाला ) नहीं होता । इसी तरह कुछ ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि और प्रजापति विचित्र ही हैं । महामते ! जगत्‌के वर्णनके विषयमें हमारी बुद्धिका जो सम्पूर्ण वैभव था, उसे हम दिखला चुके । उसके बाद जो जगत् है, वह हमारी बुद्धिका विषय नहीं है । अतः उसका वर्णन करनेमें हम असमर्थ हैं ।

अपने पूर्वजन्मके संसारसे निकलकर पूर्वोक्त रीतिसे अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंकी विचित्रताको देखती हुई उन दोनों स्त्रियोंने किसी ब्रह्माण्डमें प्रवेश करके वहाँके अन्तःपुरको देखा और फिर वहाँ वे शीघ्र ही बाहर निकल आयीं । उस अन्तःपुरमें पुष्पराशिसे आच्छादित महाराज पद्मका