भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१३६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


के समान नीले मेघपथको लाँघकर वे प्रवह आदि सात वायुओंके लोकमें जा पहुँचीं। फिर वहाँसे सौरमार्ग तथा चन्द्रमार्गको लाँघती हुई वे ध्रुवमार्गसे भी ऊपर पहुँच गयीं। इसके बाद साध्योंके मार्गसे ऊपर उठकर सिद्धोंकी भूमिको भी लाँघ गयीं और खर्गमण्डलको भी लाँघकर अत्यन्त दूर जानेपर लीलाको कुछ बोध हुआ। फिर उसने पीछे फिरकर पार किये हुए आकाश-स्थलका अवलोकन किया। वहाँसे नीचे देखनेपर चन्द्रमा, सूर्य और तारा आदि कुछ भी नहीं दिखायी देते थे। केवल अन्धकार-ही-अन्धकार था।

तब लीलाने पूछा—देवि ! बताओ, सूर्य आदिका तेज नीचे कहाँ चला गया ? पत्थरके मध्यभागकी भाँति सुदृढ़ एवं घनीभूत होनेके कारण मुट्ठीमें लेने योग्य यह अन्धकार कहाँसे आ गया ?

श्रीसरस्वती देवीने कहा—बेटी ! तुम इतनी दूर आकाश-मार्गमें आ गयी हो कि यहाँसे सूर्य आदि तेज भी नहीं दिखायी देते।

लीला बोली—देवि ! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है। क्या हम दोनों आकाश-मार्गमें इतनी दूर आ गयीं जहाँसे नीचे सूर्यदेव भी परमाणुके कणकी भाँति तनिक भी दिखायी नहीं देते ? माताजी ! इससे आगे दूसरा मार्ग कौन और कैसा होगा और उसमें कैसे जाना होगा ? देवि ! यह सब मुझे बताइये।

श्रीसरस्वती देवीने कहा—बेटी ! इसके बाद आगे तुम्हें ब्रह्माण्ड-सम्पुटके ऊपरी कपालमें जाना है।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे दो भ्रमरियाँ पर्वतकी चट्टानोंसे बनी हुई घनीभूत मण्डपवाली दीवालपर पहुँच जायें, उसी प्रकार आपसमें उपर्युक्त बातें करती हुई वे दोनों देवियाँ ब्रह्माण्ड-सम्पुटके ऊपरवाले कपालतक पहुँच गयीं। साथ ही जैसे कोई आकाशसे निकले, उसी तरह वे वहाँसे अनायास ही बाहर निकल गयीं। जो वस्तु सत्यताके दृढ़ निश्चयसे युक्त होती है, वही वज्रके समान ठोस और भारी होती है और जो इससे भिन्न कल्पित दीवार आदि वस्तु है, वह मिथ्यात्व-बुद्धिसे बाधित हो जाती है। लीलाका विज्ञान आवरणशून्य था। इसलिये वह ब्रह्माण्ड-सम्पुटके ऊपरवाले कपालको मिथ्यात्व-बुद्धिसे बाधित करके उससे बाहर निकल गयी। ब्रह्माण्डके पार जानेपर उसे अत्यन्त प्रकाशमान जल आदिका आवरण दिखायी दिया, जो सब ओर व्याप्त था। उस आवरण-समुदायमें जो जलका आवरण है, उसमें ब्रह्माण्डकी अपेक्षा दसगुना जल विद्यमान है। उसके बाद उससे भी दसगुना अग्निमय आवरण है। फिर उससे भी दसगुनी वायु और उससे भी दसगुने आकाशके आवरण हैं। तदनन्तर विशुद्ध चिन्मय आकाश है। उस परम व्योम (चेतनाकाश) रूप परब्रह्म परमात्मामें आदि, मध्य और अन्तकी कोई कल्पनाएँ नहीं उदित होतीं (वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण एवं अपरिच्छिन्न है)। वह अद्वितीय, सर्वव्यापी, शान्त, आदि अथवा कारणसे रहित, भ्रमशून्य, अनादि, अनन्त, मध्यरहित तथा अपनी ही महिमामें प्रतिष्ठित है। उस निर्मल चेतनाकाशस्वरूप परमात्मामें यदि एक कल्पतक बड़े भारी वेगसे ऊपरसे नीचेको पत्थरकी शिला गिरती रहे और नीचेसे पक्षिराज गरुड़ भी अपना सारा बल लगाकर ऊपरको उड़े तथा उनके बीचमें सबको मापनेमें समर्थ वायु समान वेगसे दोनों ओर बहे तो यह भी उन दोनोंका संयोग नहीं करा सकती।

(सर्ग २७-२९)