भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाकी सत्य-संकल्पता तथा उसे अपने अनेक जन्मोंकी स्मृति * १३५

भार्या थी । दूध और मथानी मेरी शोभा बढ़ाते थे । मैं सारे पुत्रोंकी अकेली माता और अतिथियोंका सत्कार करनेवाली गृहिणी थी । देवताओं, ब्राह्मणों और संत-महात्माओंके प्रति मेरे मनमें बड़ी भक्ति थी । मैं मर्जनपात्र, चरुस्थाली तथा कलश आदि पात्रों एवं यज्ञके अन्य उपकरणोंको धो-पोंछकर साफ-सुथरा रखती थी । जमाई, बेटी, भाई, पिता और माताकी सदा सेवा-शुश्रूषा करती थी । जबतक मेरा शरीर रहा, तबतक घरकी ही सेवा-टहलमें मेरे दिन-रात बीतते थे । 'ओह ! इस काममें बहुत देर हो गयी, बड़ा विलम्ब हुआ' इत्यादि बातें कहती और निरन्तर कार्यमें व्यस्त रहती थी । 'मैं कौन हूँ, यह संसार कैसा है ?' इस बातकी चर्चा या इन प्रश्नोंपर विचार कभी स्वप्नमें भी मैंने नहीं किया । मेरे पति श्रोत्रिय होनेके साथ ही तत्त्व-विचारमें मूढ़ थे । मेरे ही समान उनकी भी घरमें आसक्ति बनी हुई थी । उनकी बुद्धि शुद्ध नहीं थी । समिधा, साग, गोबर और ईंधनके संग्रहमें ही मेरी एकमात्र निष्ठा थी । घरके पास खेतोंमें जो साग-सब्जीकी क्यारियाँ थीं, उन्हें सींचनेके लिये मैं जल्दी-जल्दी जलपात्र लेकर आनेके निमित्त नौकरोंको पुकारा करती थी । जलकी लहरोंके किनारे जो हरी-हरी घासें उगी होती थीं, उन्हें स्वयं लाकर मैं अपनी छोटी-सी बछियाको तृप्त किया करती थी । प्रतिक्षण घरके दरवाजेको लीपकर वहाँ चौक बनाती और उसमें भाँति-भाँतिके रंग भरकर सजा देती थी । घरके नौकरोंको शिक्षा देनेके लिये मैं कुछ दीनताके साथ नम्रतापूर्वक समझाती कि 'लोग तुम्हारी निन्दा करेंगे, इसलिये तुम्हें विनय और सदाचारसे रहना चाहिये ।' जैसे समुद्र अपनी तटभूमिको लङ्घन न करके निरन्तर मर्यादामें स्थित रहता है, उसी प्रकार मैं भी धर्म-मर्यादाके नियमसे कभी च्युत नहीं होती थी ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यों कहकर उस पर्वतीय ग्रामके भीतर भ्रमण करती हुई लीलाने अपने साथ विचरती हुई सरस्वती देवीको मन्द मुस्कान-के साथ वहाँकी एक-एक वस्तुको दिखाया । फिर वह इस प्रकार बोली—'देवि ! इस घरके आकाशमें ही वह मेरे पतिका जीव राजाके रूपमें रह रहा है । यहाँ अङ्गुष्ठमात्र गृहाकाशके भीतर ही स्थित परमार्थ वस्तु (परब्रह्म) को मैंने भ्रमसे करोड़ों योजन विस्तृत पति-का राज्य समझा था । जगदीश्वरि ! हम दोनों चेतन-आकाशरूप परमात्मा ही हैं । मेरे पतिदेवका राज्य, जो सहस्रों पर्वतोंसे भरा हुआ है आकाशमें ही स्थित है । यह बहुत बड़ी माया फैली हुई है । इसलिये देवि ! अपने पतिके नगरमें जानेकी पुनः मेरी इच्छा हो रही है । अतः चलिये, हम दोनों वहाँ चलें । जिन्होंने कहीं जानेका निश्चय कर लिया हो, उनके लिये वह स्थान क्या दूर है ?'

यों कहकर लीलाने देवीको प्रणाम किया और शीघ्र ही गृह-मण्डपमें प्रवेशकर सरस्वती देवीके साथ वह आकाशमें उड़ चली । भगवान् विष्णुकी अङ्गकान्ति-