भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१४० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सेनाओंमें प्रलयकालीन समुद्रके समान वेगसे बलपूर्वक अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार आरम्भ हुआ। अग्नि-तुल्य तेजस्वी आयुधोंकी प्रभा चपलाकी चमकके समान सब ओर चकाचौंध पैदा करने लगी। चञ्चल अस्त्र-शस्त्रोंकी धारके अग्रभागसे आकाश रेखाङ्कित-सा प्रतीत होने लगा। घरघराते हुए रथोंके वेगसे जो लीकें बन गयी थीं, वे ही योद्धाओंके शरीरसे निकलकर बहनेवाली खूनकी नदीके लिये मार्ग थीं। सैनिकोंकी दौड़-धूपसे इतनी धूल उड़ी कि वहाँ सब ओर कुहरा-सा छा गया। धारावाहिकरूपसे बरसते हुए अस्त्र-शस्त्र चमचमाहट पैदा करते थे। उस सेनारूपी समुद्रका कोलाहल एकत्र हुए सम्पूर्ण मेघोंकी क्षोभपूर्ण गर्जनाके समान प्रतीत होता था। क्षेपणास्त्रोंद्वारा फेंके गये पत्थरों और चक्रसमूहोंसे भयभीत हो आकाश-चारी पक्षी दूर भाग गये थे। कुठारोंके आघातसे योद्धाओंके मस्तक विदीर्ण हो गये थे। पूरी शक्ति लगाकर चलायी गयी शक्तियोंके समूहसे छिन्न-भिन्न होकर गिरे हुए हाथियोंकी लाशोंसे धरती पट गयी थी।

बड़े-बड़े ताड़ वृक्षोंके समान ऊँचे पुरुषोंने हाथमें कुदाल ले वनभूमि खोदकर उसे समतल कर दिया था। जहाँतक बाण फेंका जा सकता है, उससे दूने प्रदेशमें सब ओरसे लोगोंको हटा दिया गया था और पत्थरोंकी चट्टानें भी काट-छाँटकर वहाँसे दूर फेंक दी गयी थीं। नाराचरूपी श्रेष्ठ जलकी वर्षा करनेवाले वीरसमूहरूपी मतवाले मेघोंके घिर आनेसे जहाँ कबन्धरूपी मोर नाचने लगे थे तथा वेगसे चक्कर काटते हुए मदमत्त गजराजरूपी पर्वतोंसे जो आवेष्टित था, वह वेगपूर्वक चलता हुआ युद्ध वहाँ प्रलयकालका-सा दृश्य उपस्थित कर रहा था।

तदनन्तर युद्धकी इच्छा रखनेवाले राजाओं, योद्धाओं, मन्त्रियों तथा आकाशसे संग्रामका दृश्य देखनेवाले देव, गन्धर्व आदिके मुखसे वहाँ इस तरहकी बातें निकलने लगीं—'देखो, तुरंतके कटे हुए मस्तकोंके मुखरूपी गढ्ढेमें गोते लगाती हुई सफेद चीलोंसे व्याप्त हुए ये कबन्ध (धड़) समराङ्गणमें बजते हुए वाद्योंके तालपर उछल-उछलकर नाच रहे हैं।' देवताओंकी गोष्ठियोंमें परस्पर यह चर्चा चल रही थी कि 'कौन धीर पुरुष कब, कैसे और क्यों स्वर्ग आदि लोकोंमें जायेंगे?' कुछ लोग ऐसी बातें कह रहे थे—'मूढो ! आगे बढ़कर युद्ध करो। अधमरे मनुष्योंको उठा ले जाओ। नराधमो ! इन अपने ही लोगोंको पैरोंके प्रहारसे कुचल न डालो।'

जैसे सोया हुआ मनुष्य थोड़ी देरमें स्वप्न-देहको प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार युद्धमें मारा गया योद्धा मरण-कालिक मूर्छाके पश्चात् एक ही निमेषमें अपने कर्मरूपी शिल्पी (स्रष्टा) द्वारा रचित देवशरीरको प्राप्त कर लेता था। उस युद्धस्थलमें परस्पर छेदन-भेदनके लिये उठे हुए हस्त-समूहोंसे मुशुण्डि, शक्ति, शूल, खड्ग, मुसल और प्रांस नामक अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा हो रही थी। परस्पर चलाये गये युद्धहेतुक अस्त्र-शस्त्र आपसमें टकराकर चूर-चूर हो जाते थे। उन भयंकर आयुधोंके चूर्णसे हुआ वह संग्रामरूपी समुद्र बालुका-राशिसे परिपूर्ण-सा जान पड़ता था। कटकर गिरे हुए छत्र उस रणसिन्धुमें उठती हुई तरङ्गके समान प्रतीत होते थे।

युद्धमें थका हुआ कोई सैनिक अपने दूसरे साथीसे कह रहा था—'मित्र ! संग्राममें थक जानेके कारण मेरी ही तरह तुम्हारी भी लड़नेकी इच्छा शान्त हो गयी होगी; अतः मैं एक अच्छी बात बता रहा हूँ, सुनो। जलती हुई आगके समान उज्ज्वल बाण जबतक हमलोगोंके अङ्गोंके टुकड़े-टुकड़े नहीं कर डालते, तभीतक हमारे लिये निकल भागनेका अवसर है। इसलिये आओ, हम लोग शीघ्र ही यहाँसे भाग चलें; क्योंकि यह जो चौथा पहर बीत रहा है, यमराजका ही दिन है (अतः इस समय यहाँ रहनेसे प्राणोंकी रक्षा असम्भव हो जायगी)।'

रघुनन्दन ! तदनन्तर वह समर-सागर उद्धत ताण्डव नृत्य करनेवाले उन्मत्तके समान प्रतीत होने लगा। उड़ जानेके लिये उद्यत हुए तुरंगम (अश्व) ही उसमें उत्ताल