भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उत्पत्ति-प्रकरण] * युद्धका वर्णन तथा उभयपक्षको सहायता देनेवाले जनपदों और स्थानोंका उल्लेख * १४१

तरङ्गके समान जान पड़ते थे। बाणरूपी जलकी धारासे घनीभूत हुए सैन्यरूपी मेघोंने वहाँके भूतल और आकाशको आच्छादित करके एक-सा कर दिया था। दोनों विशाल सैनारूपी महासागरोंकी क्षोभजनित टक्करसे वहाँ लोगोंमें भाग दौड़ मच गयी। जैसे समुद्रके गर्भमें स्थित पर्वत जलीय सर्पोंसे व्याप्त होता है, उसी प्रकार एक दूसरे दलका दलन करनेमें लगे हुए और प्रलयकालमें उठे हुए-से अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा वह समराङ्गण व्याप्त हो रहा था। शूल, खङ्ग, चक्र, बाण, शक्ति, गदा, मुशुण्डि और प्रास आदि सैकड़ों चमकीले आयुध परस्पर टकराते, काटते और अद्भुत ध्वनि उत्पन्न करते हुए दसों दिशाओंमें घूम-घूमकर प्रलयकालीन प्रचण्ड वायुके झोंकेसे टूटकर आकाशमें चक्कर काटते हुए वृक्ष आदि पदार्थोंकी चेष्टा धारण करते थे। (सर्ग ३२-३५)


युद्धका वर्णन तथा उभयपक्षको सहायता देनेवाले विभिन्न जनपदों और स्थानोंका उल्लेख

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! दोनों सेनाओंमें जो महान् धर्मनिष्ठ, सुशील, ओजस्वी, धैर्यशाली, शुद्ध, कुलकमल और युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले शूरवीर थे, उनमें परस्पर द्वन्द्वयुद्ध होने लगा। वे मेघोंके समान गर्जना करते हुए एक दूसरेको निगल जानेके लिये उत्सुक हो दो नदियोंके वेगयुक्त प्रवाहोंके समान एक दूसरेसे भिड़ते और टकराते थे। चक्रधारी योद्धा चक्रधारियोंसे उलझ गये। धनुर्धर वीर धनुर्धरोंसे भिड़ गये। खड्गसे युद्ध करनेवाले सैनिक खड्गधारियोंसे जूझने लगे। भाले-वाले भालेवालोंसे, मुद्गरधारी मुद्गरधारियोंसे, गदाधारी गदाधारियोंसे, शक्तिसे युद्ध करनेवाले शक्तिधारी योद्धाओं-से, छुरेवाले छुरेवालोंसे, त्रिशूलधारी त्रिशूलधारियोंसे और लोहेकी जंजीरोंका जालीदार कोट पहननेवाले योद्धा अपने-जैसे ही विपक्षी योद्धाओंसे इस तरह वेगपूर्वक युद्ध करने लगे, मानो प्रलयकालके विक्षुब्ध महासागरोंकी तरङ्गें आपसमें टकरा रही हों। वह युद्धाकाशरूपी महासागर वहाँ अद्भुत शोभा पा रहा था। क्षोभपूर्वक चलाये गये चक्रसमूह उसमें भँवरके समान जान पड़ते थे। वहाँ बहनेवाली वायुमें बाणरूपी जलके कण व्याप्त हो रहे थे और आयुधरूपी मगर उसमें सब ओर विचर रहे थे। विद्या, बुद्धि, बल, शौर्य, अस्त्र-शस्त्र, अश्व, रथ और धनुष—ये युद्धके दिव्य आठ साधन जिनके पास मौजूद थे, ऐसे सैन्यसमूह दो पक्ष होनेके कारण आधे-आधे भागसे दोनों पक्षोंमें बँटकर क्रोधपूर्वक युद्धके लिये खड़े थे। वे दोनों नरेश विदूरथ और सिन्धुराज भी तदनुसार ही स्थित थे।

रघुनन्दन ! मध्यदेशको आदि (मुख्य) स्थान मानकर वहींसे दिशाकी गणना करनेपर लीलाके पति महाराज पद्म (जो वर्तमान जन्ममें विदूरथ थे) के पक्षमें उनकी सहायताके लिये पूर्व दिशासे जिस-जिस जनपदके लोग आये थे, उन सबके नाम बताता हूँ, सुनो ! पूर्व दिशामें स्थित जो कोसल, काशि, मगध, मिथिला, उत्कल, मेकल, कर्कर, मुद्र, संग्राम-शौण्डक, मुख्य, हिम, रुद्रमुख्य, ताम्रलिप्त, प्राग्ज्योतिष, अधमुख, अम्बष्ठ, पुरुपादक, वर्णकोष्ठ, सविश्रोत्र, आममीनाशन, व्याघ्रवक्त्र, किरात, सौवीर और एकपादक—ये चौबीस जनपद हैं। इनके निवासी योद्धा राजाकी सहायताके लिये आये थे। इनके सिवा पूर्व दिशामें जो माल्यवान्, शिवि, आक्षन, वृषल, ध्वज, पद्म तथा उदयगिरि नामक सात पर्वत हैं, वहाँके निवासी भी राजा पद्मके पक्षमें पधारे थे।*


* यहाँ जो देशोंके नाम आये हैं, वे पुराणों तथा महाभारत आदिमें उल्लिखित नामोंसे कुछ-कुछ भिन्नता रखते हैं। कितने ही प्रसिद्ध नाम छूट गये हैं और नये नाम आ गये हैं, जो कभी सुने नहीं गये । इनके लिये जो दिशा निर्धारित की गयी है उसमें भी बड़ा मतभेद है। जैसे वङ्गदेशको पूर्वमें न बताकर पूर्व और दक्षिण दिशाओंके बीचमें