भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 750 में से

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१४२* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

पूर्व-दक्षिण दिशामें जो ये विन्ध्य आदिके निवासी हैं, वे भी आये थे। इनके अतिरिक्त चेदि, वत्स, दशार्ण, अङ्ग, वङ्ग, उपवङ्ग, कलिङ्ग, पुण्ड्र, जठर, विदर्भ, मेखल, शबराननवर्ण, कर्ण, त्रिपुर, पूरक, कण्टकस्थल, पृथग्-दीपक, कोमल, कर्णन्ध्र, चोलिक, चार्मण्यवत (चर्मण्वती नदीके तटवर्ती), काकक, हेमकुण्ड, श्मश्रुधर, बलिग्रीव, महाग्रीव, किष्किन्ध और नालिकेरी—इन देशोंके निवासी वीर भी लीला-पतिकी सहायतामें आये थे।

रघुनन्दन ! दक्षिण दिशामें जिन-जिन देशोंके नरेश लीला-पतिके सहायक थे, उनके नाम इस प्रकार हैं—विन्ध्य, कुसुमापीड, महेन्द्र, दर्दुर, मलय और सूर्यवान्—इन छः पर्वतोंके आस-पास जो समृद्धिशाली गणतन्त्र राज्य थे, वहाँके सैनिक भी वहाँ पधारे थे। इनके सिवा अवन्ती और शाम्बवती नामसे विख्यात देश, दशपुर, कयाचक्रार, ईषिक, आतुर, कच्छप, वनवासोपगिरि, भद्रगिरि, नागर, दण्डक, गणराष्ट्र (गणतन्त्रराज्य), नृराष्ट्र (जनतन्त्र राज्य), साह्र, शैव, ऋष्यमूक, कर्कोट, वनबिम्बल, पम्पानिवासी, कैरक, कर्कवीरक, स्वेरिक, यासिक, धर्मपत्तन, पङ्गिक, काशिक, तृण-खल्हल, याद, ताम्रपर्णक, गोनर्द, कनक, दीनपत्तन, मामक, ताम्रीक, दम्बर, आकीर्णक, सहकार, ऐणक, वैतुण्डक, तुम्बवनाल, अजिनद्वीप, कर्णिक, कर्णिकाम, शिबि, कोङ्कण, चित्रकूट, कर्णाट, मण्टवटक, महाकटकिंक, आन्ध्र, कोलगिरि, अवन्तिक, निवेरिक, चण्डायत, देवनक, क्रौञ्च, वाह, शिलाक्षारोद, भोनन्द, मर्दन, मलय और


बताया है। सौवीर देश पश्चिममें है, तथापि इसे पूर्वदिशाके अन्तर्गत बताया गया है। माल्यवान् पर्वत दक्षिण दिशामें है; किंतु इसे पूर्व दिशामें बताया गया है—इत्यादि। यद्यपि इस तरह देशों और दिशाओंके नाममें वैपरीत्य देखा जाता है, तथापि यह वर्णन किसी दूसरे ब्रह्माण्डका है; इसलिये इस ब्रह्माण्डके भारतवर्षकी स्थितिसे कुछ भिन्नता भी मिले तो दोषकी बात नहीं; क्योंकि ब्रह्माण्डभेदसे देशों और दिशाओंकी स्थितिमें कुछ भेद होना असम्भव नहीं है।

चित्रकूट शिखरके वासी मनुष्य तथा लङ्काके राक्षसगण भी उस युद्धमें सम्मिलित हुए थे।

अब पश्चिम-दक्षिण दिशाके देश बताये जाते हैं (जहाँके निवासी लीला-पतिके सहायक थे)—महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, सिन्धु, सौवीर, शूद्र, आभीर, द्रविड़, कीकट, सिद्धखण्ड, कालिरुह, हेमगिरि, रैवतक पर्वत, जयकच्छ, मयवर, जहाँ यवन जातिके लोग रहते थे, बाह्लीक,' मार्गणावन्त, घूम्र, तुम्बक, लाजगण, उक्त दिशाके पर्वतवासी, समुद्रतटवर्ती तथा तोकनियुत नामक स्थानके निवासी—ये सब लीला-पतिकी सहायतामें आये थे।

रघुनन्दन ! जो लोग लीला-पतिके विपक्षमें आये थे। उनके इन जनपदोंका वर्णन सुनो। पश्चिम दिशामें जो ये ऊँचे और बड़े-बड़े पर्वत हैं, पहले उनके नाम बताये जाते हैं—गिरिराज मणिमान्, कुरार्पणगिरि, वन, अर्कह, मेघभव, चक्रवान् और अस्ताचल—इन सबके निवासी उक्त नरेशके विपक्षमें आये थे। इनके अतिरिक्त जो काश नामक गणों और ब्राह्मणसमूहोंका अन्त करने-वाले हैं, वे पञ्चजन नामक गणतन्त्र राज्यके सैनिक भी युद्धके लिये आये थे। इसी प्रकार भारक्षतय, पारक, शान्तिक, शैव्य, आरमत्काय, अच्छ, अगुरुत्व, अनियम, हैहय, सुह्मगाय, ताजिक, हूणक, दक्षिण कतक और उत्तर कतक देशोंके पार्श्वभागमें स्थित कर्क देश, गिरिपूर्ण और अव्रज—इन सब देशोंके निवासी म्लेच्छ जातिके अन्तर्गत हैं; क्योंकि इन्होंने धर्मकी मर्यादाका सर्वथा त्याग कर दिया है। (ये सभी राजा विदूरथके विपक्षमें आये थे।) तदनन्तर दो सौ योजनतककी भूमि जनपदोंसे रहित है। तत्पश्चात् महेन्द्र पर्वत है, जिसकी भूमिमें मोती और मणियोंकी अधिकता है। उसके बाद अश्वगिरि है, जो सैकड़ों पर्वतोंसे युक्त है। उससे आगे भयंकर महासागर है, जिसके तटपर पारियात्र नामक पर्वत है। (इन सब स्थानोंके निवासी सिन्धुराज-की ओरसे युद्ध करने आये थे।)

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