संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * युद्धका उपसंहार, राजा विदूरथके शयनागारमें लीला और सरस्वतीका प्रवेश * ३८५
पश्चिमोत्तर दिशामें पर्वतीय प्रदेशके भीतर वेणुपति और नरपति नामक देश हैं, जहाँ अनेक प्रकारके उत्सव होते रहते हैं। इनके सिवा जो फल्गुणक, माण्डव्य, अनेकनेत्रक, पुरुकुन्द, पार, भानुमण्डल, भावन, वन्हिल, नलिन, दीर्घ—जहाँके निवासियोंके केश, अङ्ग और भुजाएँ दीर्घ (बड़ी) होती हैं, रङ्ग, स्तानिक, गुरुह और लुह नामवाले देश हैं (उनके निवासी भी सिन्धुराजकी ओरसे आये थे)। तदनन्तर अनुपम स्त्रीराष्ट्र है, जहाँके लोग गाय-बैल और अपनी संतान-तकको खा जाते हैं। (इन सब स्थानोंके निवासी उस युद्धमें सम्मिलित हुए थे।)
उत्तर दिशामें जो हिमवान्, क्रौञ्च, मधुमान्, कैलास, वसुमान् और मेरु पर्वत हैं तथा इन सबके आस-पास जो शाखापर्वत हैं, उनपर जो लोग निवास करते हैं (वे सब योद्धा सिन्धुराजकी ओरसे युद्ध करनेके लिये आये थे)। इनके सिवा मद्र, वारेव, यौधेय, मालव, शूरसेनिक, राजन्य, अर्जुनातनय, त्रिगर्त, एकपाद, क्षुद्र, आमबल, खस्तवासी, अबल, प्रखल, शाक, क्षेमधूर्ति, दशधान, गावसन्य, दद, हन्यसन, धनद, सरक, वटधान, अन्तरद्वीप, गन्धार, अवन्ति, सुर, तक्षशिला, वीठव, गोधनी, पुष्करावर्त देशके रहनेवाले, यशोवती, नाभिमती, तीक्ष्णा, काव्या, काष्ठमण्डल, सुरमूर्तिपुर, रतिकादर्श, अन्तरादर्श, पिङ्गल, पाण्ड्य्य, शङ्कुर, यातुधानक, मानव, नाङ्गन, हेमताल, खसमुण्ड—इन देशोंके निवासी भी उस युद्धमें सिन्धुराजकी ओरसे आये थे। (उपर्युक्त देश पर्वतसे नीचे हैं, इनसे ऊपरकी ओर) पूर्वोक्त हिमवान्, वसुमान्, क्रौञ्च और कैलास नामक पर्वत हैं। उनसे आगे बढ़नेपर आठ हजार योजनतककी भूमि जनपदोंसे रहित है।
पूर्वोत्तर दिशामें जो जनपद हैं, क्रमशः उनके नाम सुनो—कालुत, ब्रह्मपुत्र, कुणिद, खदिन, मालव, रन्ध्रराज्य, वन, राष्ट्र, केडवस्त, सिंहपुत्र, वामन, सावाकत, चापलवह, कामिर, दरद, अभिसारद, जार्वाक, पलोल, कुवि, कौतुक, किरात, यामुपात और दीन नामक जनपद हैं (इन सबके निवासी युद्धके लिये आये थे)। इससे आगे ईशानकोणमें सुवर्णमयी भूमि है। उससे आगे अत्यन्त शोभाशाली देवस्थलीय उपवनकी भूमि है। तत्पश्चात् गन्धर्वराज विश्वावसुका उत्तम मन्दिर है। उससे आगे कैलासभूमि है। उससे भी आगे मञ्जुवन नामक पर्वत है, जहाँकी भूमि विद्याधरों और देवताओंके विमानके समान है। (सर्ग ३६)
युद्धका उपसंहार, राजा विदूरथके शयनागारमें गवाक्षरन्ध्रसे लीला और सरस्वतीका प्रवेश तथा सूक्ष्म चिन्मय शरीरकी सर्वत्र गमनशक्तिका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! कितना कहा जाय, वासुकी (शेषनाग) भी अपनी दो हजार जिह्वाओंसे यदि आकुलतापूर्वक (शीघ्रतासे) बताना चाहें तो वे भी इस श्रेष्ठ संग्रामका पूर्णतया वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हो सकते।
इस प्रकार वहाँ बड़ा घमासान युद्ध हो रहा था। विजयी वीर भुजाओंपर ताल ठोक रहे थे और पराजित योद्धा भयसे हाहाकार कर रहे थे। इन दोनों प्रकारके शब्दोंसे वह युद्धस्थल गूँज उठा था। धूलिरूपी अन्धकारसे आच्छादित हुए सूर्यदेव वृद्ध (मन्दगामी या अस्तोन्मुख) से प्रतीत होने लगे। योद्धाओंके रुधिरके प्रवाहको रोकने या ढकनेवाले कठोर कवचके भीतरसे खून टपक रहा था।
तदनन्तर उभयपक्षके सेनापतियोंने मन्त्रियोंके साथ विचार करके एक-दूसरेके पास दूत भेजे और यह संदेश कहलाया कि अब युद्ध बंद किया जाय। उस युद्धस्थलमें विशेष परिश्रमके कारण सभीके यन्त्र, शस्त्रास्त्र और पराक्रम मन्द पड गये थे। अतः उस समय सब लोगोंने युद्ध बंद करनेकी बात हृदयसे स्वीकार की। तत्पश्चात् विशाल रथके ऊँचे ध्वजके पास ही स्थापित हुए लंबे बाँसके खंभेपर दोनों सेनाओंका एक-एक योद्धा उसी