भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१५४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


प्रकार चढ़ा, जैसे ध्रुव उच्चतम स्थानको आरूढ़ हुए हों।

ऊँचे चढ़े हुए उन योद्धाओंने सम्पूर्ण दिशाओंमें उसी प्रकार श्वेत वस्त्र हिलाया, जैसे रात्रि शुभ्र किरणोंसे सुशोभित पूर्ण चन्द्रमाको समस्त दिशाओंमें घुमाती है। वस्त्र हिलाकर उन्होंने यह सूचना दी कि 'अब युद्ध बंद करो।'

इसके बाद जैसे प्रलयके अन्तमें तत्कालीन एकार्णवसे जलका प्रवाह चारों दिशाओंमें निकलने लगता है, उसी प्रकार उस युद्धस्थलसे दोनों सेनाएँ बाहर जाने लगीं। सारी रणभूमि मुर्दोंके ढेरसे पट गयी थी। जहाँ-तहाँ खूनकी नदियाँ बह रही थीं और सब ओर घायल योद्धाओंके चीत्कार सुनायी पड़ते थे। वह रणभूमि मृत्युके उद्यानकी भाँति जान पड़ती थी। वहाँ मरकर गिरे हुए असंख्य घोड़ों, हाथियों, मनुष्यों, राजाओं, सारथि-सहित रथों और कटी हुई ऊँटोंकी गर्दनोंसे जो रक्तका प्रवाह सब ओर फैल रहा था, उससे एक सुन्दर नदी प्रवाहित हो चली थी। खूनसे भीगे हुए अस्त्र-शस्त्र ही वहाँ जलसे सींची हुई हरी-भरी लताओंके समान जान पड़ते थे। वह रणोद्यान प्रलयकालमें पर्वतोंसहित विध्वस्त


हुए सम्पूर्ण जगत्की भाँति दृष्टिगोचर हो रहा था।

(सूर्यास्तके पश्चात्) आकाश, पर्वत उसके निकुञ्ज और उसकी गुफाके भीतर फैलकर पिण्डके समान एकत्र हुए घने अन्धकारका समूह काले मेघोंकी घटाके समान वहाँ सब ओर छा गया था। चञ्चल भूतोंके वेगसे व्याकुल हुआ वह रणक्षेत्र प्रलयकालकी वायुसे कम्पित लोकों और उनके उपकरणोंसे युक्त ब्रह्माण्डके समान जान पड़ता था।

तदनन्तर जब सर्वत्र नीरवता छा गयी, अन्धकारका संचार हो गया, सम्पूर्ण दिशाओंके लोगोंकी आँखें निद्रासे बंद हो गयीं, उस समय उदारहृदय लीला-पति कुछ खिन्नचित्त-से होकर चन्द्रमाके मध्यभागके सदृश मनोहर तथा शीतल कमरोंवाले अपने सुन्दर महलमें पूर्ण चन्द्रमाके समान आकारवाली और बर्फके समान शीतल श्वेत शय्यापर अपने नेत्र-कमलोंको बंद करके सो गये और दो ही घड़ीमें उन्हें गहरी नींद आ गयी।

तत्पश्चात् वे दोनों ललनाएँ उस युद्धस्थलके आकाशको छोड़कर उस राजमहलमें खिड़कियोंके छेदोंसे उसी प्रकार घुस गयीं, जैसे वायुकी दो रेखाएँ इसी छोटे रन्ध्रमार्गसे