संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * युद्धका उपसंहार, विदूरथके शयनागारमें लीला और सरस्वतीका प्रवेश * १४५
अधखिले कमलके भीतर प्रविष्ट हुई हों।
श्रीरामजीने पूछा—विद्वान् वक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो ! यह इतना बड़ा स्थूलशरीर तन्तुके समान सूक्ष्म छेदकी राहसे किस प्रकार उस घरमें प्रविष्ट हुआ ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिस पुरुषने पहले दीर्घकालसे यह अनुभव किया हो कि 'मै स्थूल शरीर नहीं हूँ, शुद्ध चिन्मय आत्मा हूँ, अतः सभी स्थानोंमें जा सकता हूँ' वह पीछे चलकर स्थूलदेहकी अवरोध आदि क्रियाओंसे कैसे युक्त हो सकता है ? क्योंकि वह उसी चेतनका अंश है, जो सर्वत्र जानेमें समर्थ है। जिसकी आकृति स्वप्नगत पुरुष या संकल्पकल्पित पुरुषके समान है, आकाशमात्र ही जिसका आकार है अर्थात् जो वास्तवमें स्थूल आकारसे रहित है, उसे कौन कैसे रोक सकता है। जीव जहाँ मरता है, उसी स्थानको शीघ्र देखता है और वहीं उसे अनेक भुवनोंसे युक्त यह विस्तृत प्रपञ्च इसी रूपमें स्थित-सा दिखायी देता है। आगन्तुक गेह आदिसे आत्मवान् हुआ-सा यह चेतन आकाशरूपी जीव देह आदिको ही आत्मा समझकर निर्मल चिन्मय आकाशमें ही 'यह मैं हूँ, यह जगत् है' इस आकाशरूप (शून्य) भ्रमका अनुभव करता है। इस जगद्रूपी भ्रममें देवताओं, अमरावती आदि श्रेष्ठ नगरों, मेरु आदि पर्वतों, सूर्य, चन्द्रमा और तारासमूहके कारण अपूर्व सौन्दर्य प्रतीत होता है। इस भ्रमरूपी वृक्षके खोखलेमें जरा, मृत्यु, व्याकुलता तथा नाना प्रकारकी आधि-व्याधियाँ ठूँस-ठूँसकर भरी हुई हैं। इसमें अपने अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति और अनिष्ट वस्तुके निवारणके लिये स्थूल-सूक्ष्म, चर-अचर सभी प्राणी उद्योगशील हैं तथा यह भ्रमरूपी प्रपञ्च समुद्र, पर्वत, नदी, उनके अधिपति, दिन, रात, कल्प, क्षण और प्रलय—इन सबसे युक्त है। इस प्रकार यद्यपि यह विश्व दीवालकी तरह स्थूल एवं स्थिर दिखायी देता है, तथापि मनन—मनके संकल्पके सिवा और कुछ नहीं है। मनन करनेपर यह चल (अस्थिर) ही सिद्ध होता है। तुम इस समय मनमें अपने अनुभवके अनुसार इसके स्वरूपपर विचार करो। जो ही चेतन आकाशरूप परमात्मा है, वही मननरूप कहा गया है और जो ही चेतन आकाशरूप परमात्मा है, वही परमपद है। चेतन आकाशस्वरूप परमात्माका अभूत (असत्य अथवा अनादि) मायाकाशमें या सूक्ष्म भूतोंके कार्यरूप चित्ताकाशमें जो स्फुरण है, वही नाम और रूपसे नाना भावको प्राप्त होनेवाला जगत् कहा जाता है। लीला और सरस्वती दोनों निष्पाप देवियों परमात्माके तुल्य विशुद्ध एवं चिदाकाशमय शरीरसे युक्त थीं; इसलिये वे सर्वत्र जा सकती थीं। उनके लिये कहीं भी प्रवेश करनेमें कोई बाधा नहीं थी। वे चिदाकाशमें जहाँ-जहाँ अपनेको प्रकट करनेकी इच्छा करती थीं, वहाँ-वहाँ सदा ही अपनी रुचि और अभिलाषाके अनुसार प्रकट हो जाती थीं। इसलिये राजा विदूरथके घरमें उन दोनोंका जाना सम्भव हुआ। चिन्मय आकाश सर्वत्र विद्यमान है, उसमें जिसे आतिवाहिक कहते हैं, वह चिदाकाशमय सूक्ष्मशरीर सर्वत्र विचरण कर सकता है; क्योंकि वह यथार्थ ज्ञानस्वरूप, धारणात्मक एवं मननरूप है। तुम्हीं बताओ, उस सूक्ष्मदेहको कौन, कैसे और किस लिये रोक सकता है !
(सर्ग ३७—४०)