संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
राजा पद्मके भवनमें सरस्वती और लीलाका प्रवेश और राजाद्वारा उनका पूजन, मन्त्रीद्वारा राजाका जन्मवृत्तान्त-वर्णन, राजा विदूरथ और सरस्वती देवीकी बातचीत, वसिष्ठजीद्वारा अज्ञानावस्थामें जगत् और स्वप्नकी सत्यताका वर्णन, सरस्वतीद्वारा विदूरथको वरप्रदान, नगरपर शत्रुका आक्रमण और नगरकी दुरवस्थाका कथन, भयभीत हुई राजमहिषीका राजाकी शरणमें आना, लीलाको दूसरे वररूप राजा पद्मकी प्राप्ति
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! उन दोनों देवियोंके प्रवेश करनेपर राजा पद्मके भवनका भीतरी भाग उज्ज्वल छटासे सुशोभित हो गया, मानो वहाँ दो चन्द्रमा उदय हो गये हों। उसमें मन्दार पुष्पका स्पर्श करके आयी हुई शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु चलने लगी। उन देवियोंके प्रभावसे राजाके अतिरिक्त अन्य स्त्री-पुरुष निद्राके वशीभूत हो गये, परंतु चन्द्रद्रवके समान शीतल उन दोनोंके शरीरके प्रभा-पुञ्जसे आह्लादित होकर राजा पद्मकी निद्रा भङ्ग हो गयी, मानो उसपर अमृत छिड़क दिया गया हो। उठते ही उसने दो दिव्य नारियोंको देखा, जो दो आसनोंपर विराजमान थीं। उन्हें देखकर ऐसा लगता था मानो मेरुपर्वतके दो शिखरोंपर दो चन्द्रमण्डल उदित हो गये हों। यह देखकर राजाका मन विस्मयाविष्ट हो गया, फिर क्षणभर मन-ही-मन विचार करके वह अपनी शय्यासे उठ पड़ा—ठीक उसी तरह, जैसे चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णु शेषशय्यासे उठते हैं। तत्पश्चात् उसने सोते समय अस्त-व्यस्त हुए अपने माला, हार और अधोवस्त्रको यथास्थान ठीक किया। फिर सिरहाने रक्खी हुई फूलोंकी डलियामेंसे मालीकी तरह स्वयं ही अत्यन्त खिले हुए पुष्पोंसे अपनी अञ्जलि भर ली और भूमिपर ही पद्मासन लगाकर वह नम्रतापूर्वक देवियोंसे कहने लगा—'देवियो ! आप दोनों जन्म, दुःखमय जीवन और त्रिविध तापरूपी धोपका शमन करनेके लिये चाँदनीके समान तथा बाह्य और आन्तरिक अज्ञानान्धकारका विनाश करनेके लिये सूर्यकी प्रभाके तुल्य हैं। आपकी जय हो।' यों कहकर राजाने उन देवियोंके चरणोंपर पुष्पाञ्जलि समर्पित की। तदनन्तर देवी सरस्वतीने लीलासे राजाका जन्म-वृत्तान्त वर्णन करनेके लिये पार्श्वमें सो पड़े हुए मन्त्रीको अपने संकल्पसे जगाया। जागनेपर मन्त्रीने उन दोनो दिव्य नारियोंको देखकर उन्हें प्रणाम किया और उनके चरणोंमें पुष्पाञ्जलि समर्पित करके विनयपूर्वक वह उनके आगे खडा हो गया। तब देवीने राजासे पूछा—'राजन् ! तुम कौन हो ? किसके पुत्र हो ? और यहाँ कब पैदा हुए हो ?' ऐसा प्रश्न सुनकर मन्त्रीने उत्तर देना आरम्भ किया—
'देवियो ! यह आपलोगोका ही कृपा-प्रसाद है, जो मैं आपके समक्ष भी बोलनेमें समर्थ हो सका हूँ; अतः अब आप मेरे स्वामीका जन्म-वृत्तान्त सुनिये। प्राचीन काल-