भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 182

उत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा पद्मके भवनमें सरस्वती और लीलाका प्रवेश तथा राजाद्वारा उनका पूजन * १४७


में एक कुन्दरथ नामके राजा हो गये हैं, जो इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न हुए थे। वे परम शोभाशाली थे। उनके नेत्र कमलके समान सुन्दर थे। उन्होंने अपनी भुजाओंकी छायासे सारे भूमण्डलको आच्छादित कर लिया था। उन्हीं नरेशके भद्ररथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसके मुखकी कान्ति चन्द्रमाके समान थी। उन भद्ररथके विश्वरथ, विश्वरथके बृहद्रथ, बृहद्रथके सिन्धुरथ, सिन्धुरथके शैलरथ, शैलरथके कामरथ, कामरथके महारथ, महारथके विष्णुरथ और विष्णुरथके पुत्र नमोरथ हुए। ये हमारे राजा उन्हीं महाराज नमोरथके पुत्र हैं। ये अपने पिताके महान् पुण्यपुञ्जोंके फलस्वरूप क्षीरसागरसे उत्पन्न हुए चन्द्रमाकी भाँति प्रकट हुए हैं। जैसे पार्वतीजीसे गुहकी उत्पत्ति हुई थी, उसी प्रकार ये अपनी माता सुमित्राके गर्भसे दूसरे स्कन्दकी भाँति पैदा हुए हैं। इनकी आकृति पूर्णचन्द्रमाके समान निर्मल है इन्होंने अपने अमृत-तुल्य गुणोंसे जनताको भलीभाँति तृप्त कर दिया है। ये विदूरथ नामसे विख्यात हैं। जब इनकी अवस्था दस ही वर्षकी थी, तभी इनके पिता इन्हें राज्यभार सौंपकर वनवासी हो गये थे। ये तभीसे इस भूमण्डलका धर्मपूर्वक पालन कर रहे हैं। आज पुण्यरूपी वृक्षके फलित होनेपर आप दोनों देवियोंका यहाँ शुभागमन हुआ है; क्योंकि दीर्घ तप आदि सैकड़ो क्लेश उठानेपर भी आपका दर्शन मिलना कठिन है। इस प्रकार विदूरथ नामसे प्रसिद्ध ये महीपाल आज आपके दर्शन-प्रदानरूप प्रसादसे परम पवित्र हो गये।'

यों कहकर जब मन्त्री चुप हो गया तथा भूपाल भूतलपर पद्मासन लगाकर हाथ जोड़े सिर नीचा किये बैठे रहे, उसी समय सरस्वती देवीने 'राजन् ! तुम विवेकद्वारा स्वयं ही अपने पूर्वजन्मका स्मरण करो' यों कहकर उनके मस्तकपर अपना हाथ फेरा। देवी सरस्वतीके करस्पर्शसे राजा पद्म (विदूरथ) का हृदयान्धकार एवं माया—सबके सब नष्ट हो गये। उनका हृदय अत्यन्त विकसित हो गया। उन्हें अपने पूर्वजन्मका वृत्तान्त इस प्रकार स्मरण हो आया, जैसे वह उनके अन्तःकरणमें स्फुरित होता हुआ-सा स्थित था। फिर लीलाके कर्तव्यके साथ-साथ शरीर और एकच्छत्र राज्यके त्याग, सरस्वतीके वृत्तान्त, लीलाकी विशेष उन्नति और आत्मकथाको जानकर राजा समुद्रमें गोते लगाते हुएकी तरह विस्मयमें पड़ गया। वह मन-ही-मन कहने लगा—'खेद है, सारे संसारमें यह माया ही व्याप्त है। इस समय इन देवियोंकी कृपासे मुझे इसका पूर्ण ज्ञान हुआ है।'

राजाने पूछा—देवियो ! मुझे जो अपने अनेक कार्योंका, परदादाका तथा अपनी बचपन एवं युवावस्थाका और मित्र तथा बन्धु-बान्धवोंका स्मरण हो रहा है, इसका क्या कारण है ?

श्रीसरस्वती देवीने कहा—राजन् ! मृत्युरूपी महामोहमयी मूर्च्छाके अनन्तर उसी मुहूर्त्तमें गिरिग्रामनिवासी उस ब्राह्मणके घरके भीतर आकाशमें ही स्थित गृहके मध्यभागमें जो मण्डप है, उसीके अन्दर तुम्हारा यह