भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१४८* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जन्मादि दृश्य-प्रपञ्च आभासित हो रहा है। वहीं निर्मल आकाशकी भाँति स्वच्छ तुम्हारे चित्तमें यह विस्तृत व्यवहार-भ्रम स्फुरित हुआ है । 'यह मेरा जन्म हुआ । इक्ष्वाकुवंश ही मेरा कुल है । पूर्वकालमें मेरे ये पितामह आदि इस नामवाले हुए थे। मैं पैदा हुआ । जब मैं दस वर्षका बालक था, तभी मेरे पिता इस राज्यपर मेरा अभिषेक करके स्वयं परिव्राजक होकर वनको चले गये । तदनन्तर मैंने दिग्विजय करके अपने राज्यको निष्कण्टक बनाया । फिर इन मन्त्रियों तथा पुरवासियोंके साथ पृथ्वीका पालन करता रहा हूँ। यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान तथा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते मेरी आयुके सत्तर वर्ष व्यतीत हो चुके । इस समय इस शत्रु-सेनाने मुझपर आक्रमण किया और उसके साथ मेरा भयंकर युद्ध हुआ । युद्ध करके मैं अपने घर लौट आया हूँ और यहाँ पूर्ववत् स्थित हूँ । ये दोनों देवियाँ मेरे घर पधारी हैं और मैं इनका पूजन कर रहा हूँ; क्योंकि पूजित होनेपर देवता मनोऽभिलषित पदार्थ प्रदान करते हैं। जैसे सूर्यकी प्रभा मुकुलित कमलको विकसित कर देती है, उसी तरह इन दोनोंमेंसे इस एक देवीने मुझे यहाँ ऐसा ज्ञान प्रदान किया है, जो पूर्वजन्मकी स्मृतिको जगानेवाला है। अब मैं कृतकृत्य हो गया हूँ और मेरे सभी संशय नष्ट हो गये हैं। मैं शान्ति-लाभ करूँगा, परम निर्वाणको प्राप्त होऊँगा और केवल सुखरूप होकर स्थित होऊँगा'—इस प्रकार तुम्हारी यह भ्रान्ति, जो बहुसंख्यक संदेहोंसे युक्त, नाना प्रकारके आचार-विचारोंसे सम्पन्न और लोकान्तर-में गमन करनेवाली है, विस्तारको प्राप्त हुई है । पहले जिस मुहूर्तमें तुम मृत्युको प्राप्त हुए थे, उसी समय यह प्रतिभा अपने-आप तुम्हारे हृदयमें आविर्भूत हुई थी। जैसे नदीका प्रवाह उठे हुए एक आवर्तको त्यागकर तुरंत ही दूसरा धारण कर लेता है, उसी प्रकार चित्त-प्रवाह भी एक कल्पना-सृष्टिका त्याग करके दूसरी कल्पना-सृष्टि करता रहता है । जैसे आवर्त कभी दूसरे आवर्तसे संयुक्त होकर और कभी पृथक् ही प्रवृत्त होता है, उसी तरह यह सृष्टि भी कभी दूसरीसे सम्बन्धित और कभी स्वतन्त्र ही बढ़ती रहती है । उस मृत्युक्षणमें चिद्भानुस्वरूप तुम्हारी प्रतिभा में प्रतिभासित असत्-रूप यह जगज्जाल उसी तरह उपस्थित हुआ है, जैसे स्वप्नके एक ही मुहूर्तके अंदर सैकड़ों वर्षोंका भ्रम होता है । वास्तवमें तो न तुम कभी पैदा हुए हो और न कभी तुम्हारी मृत्यु ही हुई है । तुम तो शुद्ध विज्ञान-स्वरूप हो और अपने शान्त आत्मामें स्थित हो । यह सारा प्रपञ्च तुम्हें दृश्य-सा प्रतीत हो रहा है । वस्तुतः तुम कुछ नहीं देख रहे हो, बल्कि निर्मल महामणि तथा भासमान सूर्य आदिके समान तुम अपने आत्मामें अपने-आप नित्य सर्वात्मभावसे प्रदीप्त हो रहे हो । वस्तुतः न यह भूतल सत् है, न प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला यह त्रिदृश्य-देह ही सत् है और न ये पर्वत, ग्राम, तुम्हारे शत्रु-मित्र तथा हमलोग ही सत् हैं।

राजन् ! जिन्हें ज्ञातव्य वस्तुओका ज्ञान हो चुका है तथा जो एकमात्र शुद्ध बोधस्वरूप हैं, ऐसे पुरुषोंके मनमें यह कोई भी सांसारिक पदार्थ सत् नहीं है । भला, जिसका आत्मा शुद्ध ज्ञानसे सम्पन्न है, उसे जगत्की भ्रान्ति' कहाँसे हो सकती है। जैसे रस्सीका ज्ञान हो जानेपर जब उसमें सर्पका भ्रम मिट जाता है, तब पुनः उसमें सर्पकी भ्रान्ति नहीं होती, उसी तरह जगत्-भ्रमके अद्भावका पूर्ण ज्ञान हो जानेपर फिर उसकी सत्ता कहाँसे टिक सकेगी। मृगमरीचिकाका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर पुनः उसमें जलबुद्धि कैसे हो सकती है । उसी तरह स्वप्नावस्थामें घटित हुआ अपना मरण जाग्रदवस्थामें अपने स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर कैसे सत्य हो सकता है ? शरत्कालीन निर्मल आकाशकी शोभाके समान जिसका हृदय स्वच्छ, निर्मल और अत्यन्त विस्तृत है, उस शुद्ध तत्त्ववेत्ता पुरुषकी बुद्धिमें 'अहम्' और 'जगत्'-