संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा पद्मके भवनमें सरस्वती और लीलाका प्रवेश तथा राजाद्वारा उनका पूजन * १४९
की प्रतीति तुच्छ शब्दार्थकी द्योतक है। यह वास्तविक नहीं है, केवल वाचिक व्यवहारमात्र है।
महर्षिके यों कथा कहते-कहते दिन समाप्त हो गया। भगवान् भास्कर अस्ताचलकी ओर प्रस्थित हो गये और मुनि-मण्डली महर्षिको नमस्कार करके सायंकालिक विधि सम्पन्न करनेके लिये स्नानार्थ चली गयी। रात्रि बीतनेपर सूर्योदय होते-होते पुनः मुनिमण्डली एक साथ सभामें उपस्थित हुई।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! जिसकी बुद्धिमें ज्ञानका उदय नहीं हुआ है तथा जिसकी परमात्मतत्त्वमें दृढ़ स्थिति नहीं है, अतएव जो मोहग्रस्त है, उसके लिये यह जगत् असत् होते हुए भी सत्-सा प्रतीत होता है। जैसे मरुस्थलमें सूर्यका ताप ही मृगोंके लिये जलकी भ्रान्तिका कारण होता है, उसी तरह ही मृगोंके लिये जलकी भ्रान्तिका जगत् सत्य-सा भासित होता है। जैसे प्राणीकी स्वप्न-मृत्यु जो बिल्कुल असत्य है, फिर भी सत्य-सी प्रतीत होकर शोक-रुदन आदि कार्य करा देती है, उसी तरह जिनकी बुद्धि मोहाच्छन्न है, उन पुरुषोंके लिये यह जगत् शोकप्रद होता है। जो कटक-कुण्डल आदिमें व्याप्त सुवर्णके ज्ञानसे अनभिज्ञ है, उसको जैसे स्वर्ण-निर्मित कड़ेमें कड़ेका ही ज्ञान होता है, उसमें उसकी थोड़ी भी स्वर्णबुद्धि नहीं होती, उसी प्रकार अज्ञानीकी यह नगर, गृह, पर्वत, गजराज आदिसे प्रकाशित होनेवाली दृश्य-दृष्टि ही है, दूसरी—परमार्थ-दृष्टि नहीं है।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! यदि केवल मायास्वरूप स्वप्नमें कल्पित स्वप्नपुरुष सत्य न भी हों तो क्या दोष होगा ? यह बतलाइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! स्वप्नमें देखे गये नगरनिवासी वस्तुतः सत्य नहीं हैं—इस विषयमें मैं तुम्हें प्रत्यक्ष प्रमाण बतलाता हूँ, सुनो; अन्य प्रमाणोंके जाननेकी आवश्यकता नहीं है। सृष्टिके आदिमें स्वयम्भू ब्रह्मा स्वयं ही स्वप्न-तुल्य अनुभवसे सम्पन्न दिखायी देते हैं, अतः उनके सङ्कल्पसे उत्पन्न हुआ यह विश्व भी स्वप्न-सदृश ही है। इस प्रकार यह विश्व भी स्वप्न है। उसमें जैसे मेरी दृष्टिमें तुम सत्य हो, उसी तरह अन्य लोग भी तुम्हारी और मेरी दृष्टिसे सत्य हैं एवं अन्य मनुष्योंकी भी अपने-अपने अनुभवके अनुसार स्वप्नके विषयमें सत्यता सिद्ध है। यदि ये नगरनिवासी स्वप्नमें सत्य न हों तो इस स्वप्नाकार जाग्रदवस्थामें भी वे मेरे लिये थोड़ा भी सत्य न सिद्ध होंगे। इसलिये तुम्हारी दृष्टिमें जैसे मैं सत्यात्मा हूँ, उसी तरह मेरी दृष्टिमें सब सत्य हैं; क्योंकि स्वप्न-तुल्य संसारमें पदार्थोंकी परस्पर सिद्धिके लिये ऐसी नीति है। इस महान् स्वप्नरूपी संसारमें जैसे तुम्हारी दृष्टिमें मैं सत्य हूँ और मेरी दृष्टिमें तुम सत्य हो, उसी तरह सभी सत्य हैं—यही सारे स्वप्नोंमें न्याय है। इस प्रकार यह सब स्वप्न और जाग्रद्रूप प्रपञ्च वास्तवमें सत्य नहीं हैं, परंतु सत्य-सा प्रतीत होता है और स्वप्न-स्त्री-प्रसङ्गकी भाँति मिथ्या ही जीवोंको मोहित करता है। सभी वस्तुएँ देहके बाहर तथा भीतर सर्वत्र विद्यमान हैं। ज्ञानवृत्ति जिसे जैसा जानती है, उसे उसी तरह स्वयं ही देखती है। जैसे कोशमें जो धन मौजूद रहता है, उसे उसका द्रष्टा प्राप्त करता है, उसी तरह चेतनाकाशरूप परमात्मामें सब कुछ स्थित है और वही परमात्मा उसका अनुभव करता है। अस्तु,
तदनन्तर देवी सरस्वतीने विदूरथको ज्ञानामृतके सिञ्चनसे विवेकरूपी सुन्दर अङ्कुरसे संयुक्त करके उनसे इस प्रकार कहा—'राजन् ! यह पूर्वोक्त तत्त्वज्ञान मैंने लीलाकी प्रसन्नताके लिये तुमसे वर्णन किया है। लीलाने भी जगन्मिथ्यात्वकी दृष्टान्तभूत तुम्हारी दृष्टियाँ देख ली हैं; अतः तुम्हारा कल्याण हो, अब हम दोनों जाना चाहती हैं।'
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! मधुर अक्षरोंसे