संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
युक्त वाणीद्वारा सरस्वतीके यों कहनेपर बुद्धिमान् राजा विदूरथने इस प्रकार कहा।
विदूरथ बोले—देवि! मुझ साधारण मनुष्यका भी यदि किसी याचकको दर्शन हो जाय तो वह निष्फल नहीं जाता; फिर आप तो महान् फल प्रदान करनेवाली हैं, आपका दर्शन व्यर्थ कैसे हो सकता है। देवि! जैसे स्वप्न देखता हुआ मनुष्य उस स्वप्नको छोड़कर दूसरा स्वप्न देखने लगता है, उसी तरह मैं अपनी इस देहका परित्याग करके यहाँ दूसरे लोकको जाऊँगा। माता! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप मुझ शरणागतको करुणापूर्ण दृष्टिसे देखिये और शीघ्र ही मेरी प्रार्थित वस्तु प्रदान कीजिये। मा! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि मैं जिस लोकमें जाऊँ, वही लोक मेरे इस मन्त्री और इस कुमारी कन्याको भी प्राप्त हो।
श्रीसरस्वतीजीने कहा—पूर्वजन्मके चक्रवर्ती सम्राट्! तुम्हें विदित होना चाहिये कि हमलोगोंने कभी भी याचकोंकी कामनाका निराकरण कर दिया हो—ऐसा नहीं देखा गया। अतः आओ और लीलाकी भक्ति और भाग्यके अनुरूप पदार्थोंकी समृद्धिसे सुन्दर इस राज्यका निर्भय होकर उपभोग करो।
राजन्! इस समय इस भीषण संग्राममें तुम्हारी मृत्यु निश्चित है और तुम्हे तुम्हारा प्राचीन राज्य प्राप्त होगा। यह सब प्रत्यक्ष तुम्हारी आँखोंके सामने ही होगा। कुमारी कन्याको, मन्त्रीको और तुमको शवरूप शरीर प्राप्त करके उस प्राचीन नगरमें आना होगा। अब हम दोनों जैसे आयी थीं, वैसे ही लौट जा रही हैं; परंतु कुमारी कन्याको, मन्त्रीको और तुम्हें मृत्युको प्राप्त होकर वायुरूपसे अर्थात् सूक्ष्मदेहसे उस प्रदेशमे आना चाहिये।
देवी सरस्वती और राजा दोनों मधुरभाषी थे। उनमें परस्पर वार्तालाप हो ही रहा था, तबतक राजमहलके ऊर्ध्वभागमें बैठकर नगरकी देखभाल करनेवाला मनुष्य भयभीत हो राजाके पास आकर कहने लगा—'देव! ज्वार-भाटासे संयुक्त महासागरकी भाँति बाण, चक्र, खड्ग, गदा और परिघकी वर्षा करनेवाली एक विशाल शत्रु-सेना आ पहुँची है। वह अत्यन्त उत्साहसे सम्पन्न है और प्रलयकालकी वायुसे उड़ाये गये कुल-पर्वतोंकी शिलाओंके समान भयंकर गदा, शक्ति और भुशुण्डियोंकी वर्षा कर रही है। साथ ही इस पर्वताकार नगरमें आग लग गयी है, जिसने चारों दिशाओको व्याप्त कर लिया है। वह चट-चट शब्दके साथ इस उत्तम नगरीको जलाती हुई नष्ट-भ्रष्ट कर रही है।'
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम! वह पुरुष सभीत होकर राजासे यों कह ही रहा था, तबतक बाहर कठोर शब्दोंसे युक्त महान् कोलाहल होने लगा जो अपने भीषण शब्दसे सारी दिशाओंमें व्याप्त हो रहा था। वह कोलाहल बलपूर्वक कानतक खींचकर बाणोंकी वर्षा करनेवाले धनुषोंकी टंकारसे तथा जिनकी स्त्री और बच्चे जल गये थे, उन पुरवासियोंके महान् हाहाकारसे, जलती हुई लपटोंके परिस्पन्दनसे उत्पन्न चट-चट एवं टूटकर गिरते हुए अङ्गारोंके शब्दसे व्याप्त था। तब सरस्वती और लीला—दोनो देवियोंने एवं मन्त्री और राजा विदूरथने उस घोर रात्रिके समय राजमहलके झरोखेसे झाँककर उस विशाल नगरकी ओर दृष्टिपात किया, जो तुमुल नादसे गूँज रहा था। उस समय वह नगर प्रलयाग्निसे विक्षुब्ध हुए महासागरके सदृश वेगवाले तथा भयंकर अस्त्ररूपी तरङ्गोंसे व्याप्त शत्रु-सैन्यसे खचाखच भरा था और प्रलयकालीन अग्निकी ज्वालासे पिघलते हुए मेरुपर्वतके सदृश कान्तिमान् एवं गगनचुम्बी महान् ज्वाला-समूहोंसे भस्म हो रहा था। उस नगरको लूटते समय लुटेरे दूसरोंको डराने-धमकानेके लिये महान् मेघकी गर्जनाके समान डाँट बता रहे